​'बिहारी बाबू बना हुआ है भारतीय मीडिया'

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इस समय जैसे आपका मीडिया बिहारी बाबू बना हुआ है उसी तरह हमारे पाकिस्तान का मीडिया लाहौरी मुंडा बना हुआ है.

आपके यहां जितनी चिल्ली-पुकार, गालम गलौच, लंबे-लंबे वादे और बड़े-बड़े जलसे पूरे एक राज्य के चुनाव में होते हैं इतने तो हमारे यहां एक सीट के चुनाव में हो जाते हैं.

बिहार का पूरा चुनाव एक तरफ़ और हमारे लाहौर के नेशनल एसेंबली के हल्क़ा 122 (संसदीय क्षेत्र) का हल्ला-गुल्ला एक तरफ़.

अब आप यहींं देखिए कि नरेंद्र मोदी ने पूरे बिहार में अब तक आख़िर कितने जलसों में भाषणीय करतब दिखाए होंगे.

30,40,50... बस? इतने जलसे तो हमारे इमरान ख़ान साहब ने बस लाहौर में किए हैं.

कहां पहुंचा पाकिस्तान?

आप तो इस पर भिन्ना रहे हैं कि पूरा मोदी मंत्रालय इस वक़्त सिर्फ़ बिहार में जुटा पड़ा है जैसे एक राज्य का चुनाव न हो, देश की ज़िंदगी और मौत का सवाल हो.

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मगर हमारे यहां तो लाहौर की एक सीट जीतने के लिए नवाज़ शरीफ़ का पूरा मंत्रालय और उनके छोटे भाई साहब पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के सब अफ़सर और ख़ानदान वाले सिर्फ़ हल्क़ा 122 में कई दिनों तक ख़ेमा गाड़े बैठे रहे.

अग़र इमरान ख़ान ने दाता गंजबख़्श के दरबार में फूल चढ़ाए तो नवाज़ शरीफ़ ने हज़रत मियां मीर की क़ब्र पर हाज़िरी दी.

जैसे हार गए तो पाकिस्तान ख़त्म हो जाएगा और जीत गए तो पाकिस्तान चांद पर पहुंच जाएगा.

मालूम नहीं आपके यहां ये रिवाज है कि नहीं कि जो हार जाए वो बेईमानी और धांधली का शोर मचाता है मगर हमारे यहां तो हारने और जीतने वाले दोनों ही धांधली का शोर मचाते हैं ताकि एक की आवाज़ दूसरे के ग़ुलग़ुले में दब जाए.

चुनाव आयोग

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सुना है आपके यहां चुनाव आयोग की बड़ी दहशत है. हर पार्टी और उम्मीदवार इससे कांपता है. मगर ये जमहूरियत तो न हुई, ये तो तानाशाही हुई.

इससे ज़्यादा जमहूरियत तो हमारे यहां है जहां चुनाव लड़ने वाले और इलेक्शन कमीशन अपने काम से काम रखते हैं.

चुनाव आयोग का काम आचार संहिता यानी कोड ऑफ़ कंडक्ट यानी ज़ाब्ते इख़लाक़ जारी करना है और उम्मीदवार का काम उसकी धज्जियां उड़ाना.

अब इसी से अंदाज़ा लगा लें कि कोई उम्मीदवार क़ौमी एसेंबली के चुनाव में 15 लाख रुपये से ज़्यादा का ख़र्चा नहीं कर सकता.

मगर इस 15 लाख में इतनी बरकत है कि टीवी चैनल्स पर एक के बाद एक विज्ञापन, जलसे, जुलूस, ट्रांसपोर्ट, वर्कर्स का खानपान और बिरादरियों को सुविधाएं और तोहफ़े देने का सब काम इसी 15 लाख रुपये में हो जाता है.

और चुनाव आयोग उम्मीदवार को इस सुघड़ापे पर 'वेल डन जेंटेलमेन' भी कहता है.

क्या आपके यहां भी 15 लाख रुपये में 15 करोड़ का ख़र्चा हो सकता है? नहीं ना, फिर हमसे सीखिए ये चमत्कार, आख़िर हमसाया हमसाये के ही तो काम आता है.

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