मैसूर के दशहरा में मिलिए 'नए राजा' से

यदुवीर कृष्णदत्त वोडेयार

मैसूर का दशहरा सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है.

छह सौ सालों से ज़्यादा पुरानी परंपरा वाले इस ऐतिहासिक आयोजन में इस बार ख़ास है मैसूर के महाराजा यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वोडेयार का पहली पर सिंहासन पर बैठना.

इस मौक़े पर राजपरिवार से जुड़े बहुत सारे लोग मौजूद थे.

बाइस वर्षीय यदुवीर गोपालराज अर्स का इसी साल 28 मई को मैसूर के महाराजा के रूप में राज्याभिषेक किया गया था. वो अगले नौ दिनों तक सिंहासन पर बैठेंगे.

दशहरा उत्सव की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि साल 2008 में कर्नाटक राज्य की सरकार ने इसे 'राज्योत्सव' (नाद हब्बा) का दर्जा दे दिया. यह उत्सव शानो शौकत से भरा हुआ होता है.

इस पर्व को वाडियार राजवंश के शासक कृष्णराज वाडियार ने दशहरे का नाम दिया.

मैसूर के दशहरे का इतिहास मैसूर नगर के इतिहास से जुड़ा है, जो मध्य काल के दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के समय से शुरू होता है.

विजयादशमी के पर्व पर मैसूर का राज दरबार आम लोगों के लिए खोल दिया जाता है. भव्य जुलूस निकाला जाता है.

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