जब भारतीयों ने कराया पाकिस्तानी लड़की का इलाज

  • 13 अक्तूबर 2015
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Image caption सबा ने बीमार पड़ने तक अपने स्कूल में हमेशा टॉप किया.

मुंबई में सोमवार को जिस समय कुछ शिवसैनिक एक पाकिस्तानी नेता की किताब के विमोचन के विरोध में सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर पेंट पोत रहे थे उसी समय मुंबई में ही एक पाकिस्तानी लड़की कई महीनों में पहली बार अपने पैरों पर खड़ी होकर अपने देश जाने की तैयारी कर रही थी.

15 साल की सबा अहमद को विल्संस डिसीज़ है. ये एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर के अलग-अलग अंगों में तांबा जमा होने लगता है. इसके बाद मरीज़ का वो अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है.

सबा स्ट्रेचर पर मुंबई आई थीं. सबा की मां नाज़िया को पाकिस्तान में लोगों ने कहा था कि वो मुंबई में लोगों को न बताएं कि वो पाकिस्तानी हैं वर्ना उनसे अच्छा बर्ताव नहीं होगा.

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फिर उनका अनुभव कैसा रहा?

नाज़िया कहती हैं, ''बहुत प्यार देने वाले लोग हैं. महसूस नहीं हुआ कि किसी और देश में हूं. ऐसा ही लगा कि पाकिस्तान में हूं. यहां तक कि लोग सबा के लिए छिपा कर खाना लाते थे. कभी-कभी मैं रो भी पड़ती थी.''

दवाओं का साइड इफ़ेक्ट

सबा के बीमार पड़ने के बाद पाकिस्तान में उन्हें बेहतर इलाज नहीं मिल पाया. दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट हुआ सो अलग. लेकिन सबा के मौसेरे भाई-बहनों को भी यही बीमारी थी और उनका इलाज भी भारत में ही हुआ था.

उन्हें भारत ले जाने की सलाह दी गई.

इसके बाद सबा को अप्रैल में पहली बार भारत लाया गया. लेकिन नाज़िया के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो इलाज ख़र्च उठा सकें. ऐसे में उन्हें मदद मिली ब्लू बेल्स नाम के एनजीओ की संस्थापक शाबिया वालिया से.

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Image caption शाबिया ने सबा की मदद के लिए पैसे जुटाए.

शाबिया बताती हैं, ''अप्रैल में मेरे पास एक व्हाट्सऐप मैसेज आया था. मैंने उस लड़की की फ़ोटो देखी. वो अस्पताल में भी स्माइल कर रही थी. उसके बाद मैंने उस नंबर पर कॉल किया.''

फ़ोन कॉल का इंतज़ार

वो आगे कहती हैं, ''नाज़िया ने मुझे बताया कि वो अस्सी हज़ार रुपये लेकर मुंबई आई थीं और उनका दो लाख का बिल हो गया है और उन्हें पैसों की ज़रूरत है. मैंने 30-35 हज़ार जमा किए और उनसे मिलने गई. तब से एक रिश्ता बन गया और अप्रैल से जून के बीच हमने उनकी सात लाख की मदद की.''

सबा का इलाज करने वाली जसलोक अस्पताल की डॉक्टर आभा नगराल बताती हैं, ''सबा का इलाज पूरी ज़िंदगी चलेगा. एक बार स्टेबल हो जाए तो दवाइयां जारी रखनी होंगी.''

सबा के इलाज का सबसे मुश्किल पक्ष है महंगी दवाई. नाज़िया कहती हैं कि दवा की एक बोतल एक लाख सत्तर हज़ार रुपये की मिलती है.

दवाई के लिए कुछ पैसे ब्लू बेल्स ने दिए हैं. अब कुछ विदेशी संगठनों से भी मदद का भरोसा मिला है.

शाबिया को रोज़ मदद की पेशकश के लिए फ़ोन आते हैं लेकिन उन्हें अब कराची से उस फ़ोन कॉल का इंतज़ार है जब ख़ुद सबा उनसे बात करें.

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