'उम्र 105 साल', पर कभी ट्रेन नहीं देखी

  • 17 अक्तूबर 2015
बसंत चौधरी

आज़ादी के बाद जितने भी चुनाव हुए हैं, इन्होंने उन सब में हिस्सा लिया है. चाहे वो लोकसभा के चुनाव हों या फिर राज्य विधानसभा चुनाव.

बिहार में बोध गया के बसंत चौधरी की उम्र अब लगभग 105 साल की हो गई है. वो इस पूरे इलाक़े में सबसे ज़्यादा उम्रदराज़ हैं.

वो कहते हैं, "कितनी उम्र सोचते हैं, मेरी होगी? 105 साल के हैं हम. हमरी उम्र का कोई और नहीं. सब जा चुके हैं. जितने भी बूढ़े हैं सब हमसे काफ़ी छोटे हैं."

बोधगया के हथियार गाँव के रहने वाले बसंत चौधरी को सिर्फ़ इतना याद है कि कभी देश ग़ुलाम था.

आज़ादी मिली, यह भी उन्हें याद है. इन्हें जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी याद हैं. मगर ढलती उम्र ने उनकी याददाश्त को काफी कमज़ोर कर दिया है.

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पांच बेटों, 9 पोतों और 17 पड़पोतों के घर के मुखिया, बसंत अब अपना वक़्त गाँव की चौपाल में ही बिताते हैं.

वो कहते हैं, "पोते लाकर छोड़ देते हैं. फिर ले जाते हैं. वो मुझे कहीं जाने नहीं देते."

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कितने चुनाव देखे और पता नहीं कितने नेता देखे. तो क्या उनकी ज़िन्दगी में चुनावों से कोई फ़र्क पड़ा है?

इस सवाल पर वो कहने लगे, "कोई फ़ायदा नहीं हुआ भाई. कोई फ़ायदा नहीं हुआ, अपना पेट भरे के ख़ातिर आते हैं. ग़रीब का पेट भरे के लिए नहीं. खाय वाला खा जाते हैं और ग़रीब आदमी भूखे मरते हैं."

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बसंत को मलाल है कि उन्हें वृद्धावस्था पेंशन सिर्फ़ दो साल पहले से ही मिल रही है और इतने सालों तक उन्होंने पेंशन के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटे, "झूठ नहीं बोलेंगे बाबू.....एक साल दू हज़ार रुपया मिला. फिर एक साल दू हज़ार मिला."

वैसे बसंत हमेशा अपना वोट डालते आए हैं. पहले वो अपनी सोच समझ से वोट डालते थे. मगर जैसे जैसे उम्र हावी होने लगी उनको राजनीति की बहुत ज़्यादा जानकारी अब नहीं रहती.

वो कहते हैं, "अब तो बेटा और पोता लोग जहां बोलता है, वहां वोट डाल देते हैं."

ट्रेन तक नहीं देखी

105 साल की उम्र होने के बावजूद बस एक आध बार उन्होंने गया शहर को देखा था. वो भी कई दशकों पहले.

इसके अलावा बसंत कभी किसी शहर नहीं गए. ना तो उन्होंने कभी ट्रेन देखी और ना ही कभी बस में ही चढ़े.

वो बताते हैं, "गया गए थे एक बार. मगर कुच्छो याद नहीं है. बस तो देखे हैं. ई रोडवा से जात हैं ना. मगर कभी बस में चढ़े नहीं हैं. और ट्रेन तो हम देखबे नहीं किए. कभी गाँव छोड़कर गए ही नहीं."

बसंत हर बार वोट डालते हैं लेकिन उन्हें लगता है कि उनकी ज़िंदगी में इससे कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है.

फिर भी वो वोट डालना अपना फ़र्ज़ समझते हैं.

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