बार में इस बार थिरकेंगी दूसरी लड़कियाँ

  • 16 अक्तूबर 2015
मुंबई डांस बार

मैं मुंबई के बीयर बारों के अपने अनुभवों की बात करूँगा तो आपका पहला सवाल यही होगा कि "आपका बीयर बारों से क्या नाता है?"

अठारह साल पहले की बात है जब मैं एक 'बार एंड रेस्टोरेंट' में खाना खाने गया था जहाँ से ये सिलसिला शुरू हुआ. अंधेरे में डूबी अजीब-सी रंगीन ज़िंदगी की एक झलक दिखी, खुश दिखने वाली लड़कियों में अथाह दुख-दर्द छिपा था.

2005 में मैंने अपने उपन्यास 'सोनमछली' में इसी को पकड़ने की कोशिश की, इसके बाद डांस बार मेरी नज़रों से ओझल नहीं हुए, ख़ास तौर पर पाबंदी के बाद से, मैं हमेशा जानकारी जुटाता रहा हूँ.

पाबंदी लगने के बाद सरकार ने शिकंजा कसा, पुलिस ने छापे मारे, लड़कियों की गिरफ़्तारी हुई, उन्हें प्रोटेक्शन फ्रॉम इम्मॉरल ट्रैफ़िकिंग एक्ट के तहत कथित सुधारगृहों में भेजा जाने लगा, बार मालिकों को जेल जाना पड़ा, जुर्माना भरना पड़ा.

काफ़ी हद तक सुनियोजित कारोबार पूरी तरह तितर-बितर हो गया. भारत के कोने-कोने से आई ग़रीब परिवारों की अर्धशिक्षित लड़कियों की रोज़ी-रोटी रातोंरात छिन गई, इनमें से ज़्यादातर को सिवाय देह व्यापार के कोई और रास्ता न मिला, कई लड़कियों ने आत्महत्या तक की.

जो जिस्मफ़रोशी से बचना चाहती थीं, उन्हें भी कोई इज़्ज़त की ज़िंदगी नहीं मिली. इम्मॉरल ट्रैफ़िकिंग रोकने के नाम पर जो कार्रवाई की गई उसका असर ये हुआ है कि इन लड़कियों की ट्रैफ़िकिंग करने वाले दलाल उन्हें खाड़ी के देशों में ले जाने लगे.

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अपने देश से दूर, दुबई और क़तर के होटलों में उन पर क्या-क्या गुज़री होगी आप सोच सकते हैं. होटल मालिकों और दलालों का हिस्सा चुकाने के बाद उनके हाथ बहुत कम रकम आती, विदेश जाने के ख़र्चे के नाम पर उन पर भारी कर्ज़ चढ़ गया और बेचने के लिए उनके पास सिर्फ़ एक ही चीज़ बची.

ऐसी एक लड़की ने मुझे हिसाब समझाया, "अक्सर तीन महीने का कांट्रैक्ट होता है, पैसे एडवांस मिलते हैं लेकिन उसके बाद वे हमारी कमाई से पाँच गुना वसूल करते हैं, अगर तीन लाख रूपए मिले तो अपनी कमाई से पंद्रह लाख चुकाने होते हैं, ज़्यादातर लड़कियों को रकम चुकाने के लिए जिस्मफ़रोशी का सहारा लेना पड़ता है."

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एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने के दौरान, डांस बारों के बंद होने के बाद उस धंधे से जुड़ी लड़कियों से ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों से भी काफ़ी बातचीत हुई.

डांस बार बंद होने के बाद भी कई बारों में लड़कियाँ रहीं लेकिन उन्हें नाचने की इजाज़त नहीं थी, लोग बीयर पीते हुए उन्हें घूरते रहते लेकिन जितने पैसे डांस करने पर मिलते थे, वो खड़े रहने के लिए नहीं मिल सकते थे.

पाबंदी के बावजूद ढेर सारे बार चलते रहे, पुलिस के छापे पड़ते रहे, कुछ वक़्त बार बंद रहते, फिर ले-देकर खुल जाते. पुलिस को पाबंदी लागू कराने के नाम पर आसान कमाई का रास्ता मिल गया था.

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ताज़ा फ़ैसले के बाद

अब सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से पाबंदी हट जाएगी लेकिन जिन लड़कियों की ज़िंदगी पटरी से उतर गई उनका कुछ भला नहीं होगा क्योंकि उनकी उम्र ढल चुकी है, उनकी जगह कमसिन लड़कियाँ ले लेंगी.

मेरे मन में अक्सर यही सवाल आता है कि नई पीढ़ी की जो लड़कियाँ इस पेशे में उतरेंगी क्या उनकी ज़िंदगी पहले वाली लड़कियों से बेहतर होगी?

ऐसी कोई उम्मीद रखना शायद ख़ामख़याली होगी. क्या श्लील है और क्या अश्लील, इसकी व्याख्या पांडु हवालदार ही करेगा, नैतिकता के ठेकेदार अपनी दुकान चलाते रहेंगे, इन सबको सबसे आसान शिकार वही लगेगा जो सबसे कमज़ोर है, वो ये लड़कियाँ हैं.

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अगर आप कभी बीयर बार में जाएँ तो जगमगाती रोशनी, चमकीले कपड़ों में थिरकती लड़कियों को नैतिकता के चश्मे से नहीं, मानवता के चश्मे से देखने की कोशिश करिएगा, शायद अलग तस्वीर दिखे.

(भारतेंदु विमल बीबीसी के पूर्व प्रसारक हैं, इन दिनों कभी लंदन और कभी मुंबई में रहते हैं)

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