एक एकड़ ज़मीन फिर भी भिखारी

  • 23 अक्तूबर 2015
हनुमंती

पता नहीं भारत में वैष्णव जन कहां रहते हैं. जहां भी रहते हों, हंचिनाल गांव नहीं पहुँच पाए हैं.

अगर पहुँच पाते तो शायद हनुमंती से ज़रूर मिलते और शायद हनुमंती के दुख दूर करने के लिए कुछ करते भी. दो अक्टूबर की तारीख थी और मुझे वैष्णव जन याद आ रहे थे.

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अकाल यात्रा के दौरान मैं कर्नाटक के यादगीर ज़िले के हंचिनाल गाँव पहुँचा.

घूमते-घूमते जब मैं हनुमंती के पास पहुँचा तो देखा कि वो गांव के एक किनारे पर बने कूड़े के एक ढेर के दरवाज़े पर बैठी थीं. सिमटी हुई काया, झुकी हुई रीढ़, झुर्रियों से भरा उदास चेहरा. उन्हें बहुत कम सुनाई और दिखाई पड़ता है.

चीथड़ा ज़िंदगी

एक शताब्दी के झंझावात झेल चुकी हनुमंती की काया से इसकी उम्मीद रखना भी अत्याचार लगता है.

उनके ऊपर बुरी तरह टूटा-फूटा छप्पर बरसाती के चीथड़ों में लिपटा था. दरवाज़े पर कूड़े का ढेर. अंदर झांका तो मुझे कुछ कपड़ों का गूदड़, तुड़े-मुड़े अल्युमिनियम के कुछ बर्तन और पुरानी प्लास्टिक की बोतलें और डिब्बे दिखे.

जब हनुमंती को नींद आती है तो वह धीरे से खिसककर अंदर चली जाती हैं. उठ-चल नहीं सकतीं. आपको यक़ीन करना होगा कि यही उनका घर है. जी हां, आज़ाद भारत बस उन्हें यही दे पाया है.

उनके पड़ोसी कहते हैं कि इस साल बारिश होती तो शायद हनुमंती के दिन बहुर जाते, मगर ऐसा नहीं हुआ. ऊपर से हनुमंती पर क़ुदरत का भी कहर कम नहीं.

हनुमंती को हिंदी समझ आती है पर बोल नहीं सकतीं. कन्नड़ में उन्होंने जो जवाब दिया उसका सार मुझे एक पत्रकार ने समझाया.

''सब मर गए हैं''

हनुमंती कहती हैं, ''मैं अकेली हूं, बच्चा नहीं है कोई भी. जो कुछ मिलता है वो है वृद्धावस्था पेंशन है. सब लोग मर गए हैं. मैं अपने मातापिता की अकेली लड़की हूं. मेरा कोई भाई नहीं बहन नहीं. मां नहीं बाप नहीं.''

उनके पति येंगप्पा की कई साल पहले मौत हो चुकी है.

आपको शायद यक़ीन न होगा, हनुमंती एक एकड़ ज़मीन की मालकिन हैं. मगर फिर भी भिखारी क्योंकि दो साल से खेती पूरी तरह सूखी पड़ी है. उन्होंने ज़मीन बँटाई पर दी थी, पर इस एक एकड़ से उन्हें पांच साल से कुछ नसीब नहीं हुआ है.

सिर्फ़ 400 रुपए!

उनका एकमात्र सहारा है उन्हें मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन, महीने के 400 रुपए. हां बस उतने जितने में आप दिल्ली के मामूली होटल में एक वक़्त का भोजन करते हैं.

सरकारी आंकड़े और पैमाने हंचिनाल को अभी अकालग्रस्त नहीं कह सकते, यह तो तय है. सिर्फ़ दो-तीन साल से खेती लायक बारिश न होना शायद इसका सुबूत भी नहीं.

मगर मुझे लगा कि गांव अकाल की दस्तक महसूस कर रहा है. और ये दस्तक अगर कोई सबसे ज़ोर से सुन रहा है तो वो हैं हनुमंती.

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