मारे गए 'आरटीआई सिपाहियों' को मिला इंसाफ़?

आरटीआई कार्यकर्ता (फ़ाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट Other

सूचना का अधिकार यानी आरटीआई को लागू हुए दस साल हो गए हैं. यह 12 अक्तूबर 2005 को लागू हुआ था.

बीते दस वर्षों में आम लोगों के बीच इस क़ानून की लोकप्रियता काफी बढ़ी है और एक अनुमान के मुताबिक हर साल लाखों की संख्या में आरटीआई आवेदन डाले जाते हैं.

पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए इस क़ानून ने भ्रष्टाचार को अपना हक़ मानने वालों को बेचैन भी किया है.

इस दौरान आरटीआई का इस्तेमाल करने वाले कार्यकर्ताओं की हत्याएं भी हुई हैं.

पढ़ें विस्तार से

पुष्पेंद्र हत्याकांड

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आरटीआई कार्यकर्ता पुष्पेंद्र की 21 सितंबर 2015 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में व्यस्ततम इलाके कपूर कंपनी चौराहे पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

पुष्पेंद्र महिला कल्याण विभाग में छह साल तक संविदा पर बतौर कंप्यूटर ऑपरेटर काम कर चुके थे. पुष्पेन्द्र को नौकरी से निकाल दिया गया था.

पुष्पेंद्र ने आरटीआई के माध्यम से विभाग से संबंधित जानकारियां मांगी थी.

मुरादाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नितिन तिवारी ने बीबीसी को बताया कि हत्या में शामिल सभी 9 लोगों को पकड़ लिया गया है.

क्लर्क मुकुट और चुन्नीलाल के अलावा हत्या को अंजाम देने वाले शूटर शहज़ाद को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

अमित जेठवा हत्याकांड

जुलाई 2010 में जेठवा की गुजरात हाईकोर्ट परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. पुलिस ने इस मामले में जेठवा पर कथित तौर पर गोली चलाने वाले शैलेष पंड्या और शिवा समेत कुल छह लोगों को गिरफ़्तार किया था.

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Image caption अमित जेठवा की वर्ष 2010 में गुजरात हाईकोर्ट परिसर में हत्या कर दी गई थी

जेठवा ने जूनागढ़ ज़िले में गीर के जंगलों में चल रहे अवैध खनन के ख़िलाफ़ गुजरात हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की थी. जेठवा ने गीर नेचर यूथ क्लब की भी स्थापना की थी, जिसका कामकाज अब उनके पिता भीखाभाई देखते हैं.

उन्होंने चिंकारा शिकार मामले में अभिनेता सलमान ख़ान के ख़िलाफ़ भी ज़बर्दस्त अभियान चलाया था, जिसमें सलमान ख़ान को पाँच साल की सज़ा हुई थी.

जेठवा ने फ़िल्म ‘लगान’ में चिंकारा हिरण के इस्तेमाल के मामले में अभिनेता आमिर ख़ान को क्लीन चिट देने के भुज ज़िला अदालत के फ़ैसले को भी ऊपरी अदालत में चुनौती दी थी.

जेठवा हत्याकांड में गुजरात पुलिस पर जाँच में ढिलाई बरतने के आरोपों के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले की जाँच सीबीआई से कराने के आदेश दिए थे.

सीबीआई ने इस मामले में अभियुक्त पूर्व भाजपा सांसद जूनागढ़ दीनू सोलंकी के भतीजे शिवा को गिरफ़्तार किया था.

शिवा ने 2013 में जेल में रहते हुए भाजपा उम्मीदवार के रूप में स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ा और विजयी रहे. पिछले साल उन्हें अदालत ने ज़मानत पर रिहा भी कर दिया.

सतीश शेट्टी

सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर कई भूमि घोटालों को उजागर करने वाले सतीश शेट्टी की 13 जनवरी 2010 को पुणे के करीब हत्या कर दी गई थी.

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Image caption आरटीआई कार्यकर्ता सतीश शेट्टी के हत्यारों का अब तक पता नहीं चल सका है

पुणे से 40 किलोमीटर दूर तालेगांव में शेट्टी को चार-पाँच लोगों ने उस वक़्त छुरा घोंपकर मार डाला था, जब वो सुबह की सैर पर निकले थे.

साढ़े पाँच साल बाद भी आज तक उनके हत्यारों का पता नहीं चल सका है. मामले में पुलिस से लेकर ठेकेदारों तक पर संदेह जताया गया.

पिछले वर्ष दिसंबर में सीबीआई ने यह फाइल बंद करने के लिए न्यायालय में अर्जी दी थी. लेकिन शेट्टी परिवार ने इसे चुनौती दी और उच्च न्यायालय ने इस मामले की फिर से जांच करने के आदेश दिए.

शेट्टी ने वर्ष 2009 में आरोप लगाया था कि पुणे-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर आईआरबी कंपनी ने अवैध तरीके से जमीन हथिया ली है. बाद में मामले के तूल पकड़ने पर कंपनी को अपना प्रस्तावित टाउनशिप प्रोजेक्ट रद्द करना पड़ा था.

ललित मेहता

सूचना अधिकार कार्यकर्ता ललित मेहता की हत्या 14 मई 2008 को झारखंड में पलामू की कांडा घाटी के जंगलो में की गई थी.

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15 मई की सुबह उनकी लाश मिलने पर पुलिस ने इसे अज्ञात शव के रूप में दर्ज किया था. बाद में चप्पलों और शर्ट से उनकी पहचान हुई.

उन दिनों वे जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज़ के साथ मनरेगा के सोशल ऑडिट से जुड़े हुए थे. पेशे से सिविल इंजीनियर ललित की हत्या का मामला मामला काफी चर्चा में रहा था.

तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने इसकी सीबीआई जांच की अनुमति दी.

उसी दौरान नक्सलियों के एक संगठन ने पर्चा जारी कर घोषणा की कि वे ललित मेहता के हत्यारों को जानते हैं और उन्हें अपनी अदालत में सजा देंगे. इसके छह महीने बाद जनवरी 2009 में इस हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त राजू सिंह की लाश पुलिस ने रांची में बरामद की.

तब यह समझा गया था कि नक्सलियों ने उन्हें मार डाला.

राम कुमार ठाकुर

बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले की रत्नौली पंचायत के सामजिक कार्यकर्ता और पेशे से वकील रहे राम कुमार ठाकुर आरटीआई के माध्यम से मनरेगा में घपले की सच्चाई उजागर करना चाहते थे.

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लेकिन, मार्च 2013 में उनकी हत्या कर दी गई. समूचे प्रकरण की जांच पुलिस से सीआईडी तक पहुँचने में करीब साल भर लग गया.

अभियुक्त अब तक नहीं पकडे गए हैं. तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मामले की जांच शीघ्र कराने को लेकर पत्र भी लिखा था, लेकिन इस संबंध में कुछ नहीं हो पाया.

बिहार में आरटीआई से जुड़े अब तक कम से कम नौ कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है.

संभुराम विश्नोई

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Image caption संभुराम ने अपने गांव में मनरेगा में भ्रष्टाचार को उजागर किया था

राजस्थान में जोधपुर ज़िले की फलौदी तहसील के संभुराम विश्नोई पर लोहे के सरियों और लाठियों से हमला किया गया था, 7 अक्टूबर 2013 को उनकी मौत हो गई.

संभुराम के भाई भँवरलाल ने बीबीसी को बताया “संभु और उनके तीन साथियों ने सूचना के अधिकार के माध्यम से जैसलाँ के सरपंच सोढाराम द्वारा मनरेगा और सजल स्कीमों में किए गए भ्रष्टाचार को उजागर किया था.”

उनका आरोप है कि सरकारी जांच में फ़र्ज़ीवाड़ा साबित होने पर बौखलाए सरपंच ने संभुराम पर जानलेवा हमला करवाया.

इस मामले में छह लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई थी. सरपंच का बेटा, भाई और भतीजा अभी जेल में हैं, जबकि सरपंच जमानत पर रिहा हो गए हैं. मामला अभी सत्र न्यायालय में चल रहा है.

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