अमरीका की अफ़ग़ान नीति की हार या जीत?

  • 18 अक्तूबर 2015
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अफ़ग़ानिस्तान में वर्ष 2016 के बाद भी अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने के अमरीकी फैसले और भारत-अफ़ग़ानिस्तान के 'गठजोड़' की पाकिस्तान के उर्दू अखबारों में ख़ूब चर्चा है.

अमरीकी फ़ौज नहीं लौटेगी अफ़ग़ानिस्तान से

रोजनामा ‘वक़्त’ लिखता है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सैन्य मौजूदगी बनाए रखने का एलान करते हुए कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी युद्धक मिशन तो ख़त्म हो गया है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान और वहां की जनता से किए वादे बरक़रार हैं.

अख़बार के मुताबिक़ अमरीकी सेना मानती है कि तालिबान की बढ़ती हुई कार्रवाइयों को देखते हुए अफ़ग़ान फ़ौज को मदद की ज़रूरत है.

अख़बार की राय है कि अफ़ग़ानिस्तान में साल 2016 के बाद भी अपने लगभग 5,500 सैनिक रखने के अमरीकी फ़ैसले से पाकिस्तान को नफ़ा होगा या नुक़सान, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि पाकिस्तान अपनी रणनीति कितनी समझदारी से तय करता है.

'अमन की आस'

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रोज़नामा 'दुनिया' लिखता है कि हाल ही में कुंदूज़ शहर पर तालिबान के हमले से साफ़ हो गया है कि 'अमरीका और उसके सहयोगी 14 साल बाद भी अपने अभियान में नाकाम रहे हैं.'

लक्ष्य हासिल कर कुंदूज़ से हटे: तालिबान

अख़बार लिखता है कि 'अमरीका की शिकस्त का अंदाज़ा तो तभी हो गया था जब अमरीका तालिबान से बातचीत की भीख मांग रहा था.'

बहरहाल, अख़बार की राय है कि अफ़ग़ानिस्तान में बीते तीन दशकों से जारी उथल पुथल ने पाकिस्तान को बहुत प्रभावित किया है और इसीलिए वो चाहता है कि उसके पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान में जल्द से अमन क़ायम हो.

अख़बार लिखता है कि अफ़ग़ानिस्तान को ये बात दिमाग़ से निकालनी होगी कि पाकिस्तान काबुल में अपनी पसंद के किसी गुट को सत्ता में बिठाना चाहता है.

वहीं ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि अमरीकी में शांति जंग से नहीं बल्कि वार्ता से ही मुमकिन है.

'भारत से बलूचिस्तान की मुहिम'

‘नवाए वक़्त’ में भारत पर आरोप लगाते हुए पाकिस्तानी विदेश सचिव के इस बयान का ज़िक्र है कि पारुली नाम का एक अफ़ग़ान नागरिक भारत में बैठकर बलूचिस्तान की आज़ादी की मुहिम चला रहा है.

अख़बार की राय है कि भारत और अफ़ग़ानिस्तान दोनों की सरज़मीन पाकिस्तान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो रही है और इसी भारत-अफ़ग़ानिस्तान गठजोड़ को विश्व समुदाय के आगे बेनकाब करने की ज़रूरत है.

अख़बार कहता है कि अगर ये आदमी इतना ख़तरनाक है तो इसे पाकिस्तान को सौंपने की मांग की जानी चाहिए.

‘जंग’ लिखता है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान से लेकर बलूचिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर कराची तक कोई ऐसा इलाका नहीं, जहां भारत की दखलंदाजी के सबूत पाकिस्तान के पास मौजूद न हों.

अख़बार ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज के हवाले से लिखा है कि पाकिस्तान के पास अब इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने उठाने के अलावा कोई चारा नहीं है.

वहीं ‘जसारत’ ने भारत में कुछ हालिया घटनाओं को लेकर सांप्रदायिकता पर जारी बहस के सिलसिले में संपादकीय लिखा है- 'मोदी बेबस हैं या ये सब उनके इशारा पर हो रहा है?'

तल्ख टिप्पणी करते हुए अख़बार लिखता है कि मोदी ने गोमांस की अफ़वाह पर एक व्यक्ति की हत्या, मुंबई में ग़ुलाम अली का कंसर्ट रद्द किए जाने और पूर्व पाक विदेश मंत्री कसूरी के मेज़बान का मुंह काला करने की घटनाओं पर अफ़सोस जताया है, लेकिन ये आग उन्हीं की भड़काई हुई है.

‘बचा है भाईचारा’

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रुख़ भारत का करें तो यहां भी यही बहस जारी है.

‘हमारा समाज’ लिखता है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद से देश के हालात ख़राब हुए हैं, जिससे लोग काफ़ी सहमे नज़र आ रहे हैं.

अख़बार लिखता है कि मोदी को देश के हालात बदलने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि इससे न सिर्फ़ एनडीए पर लोगों का भरोसा दोबारा क़ायम होगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय राजनीति की साख और क़द में इज़ाफ़ा होगा.

वहीं, ‘सियासी तक़दीर’ लिखता है कि माहौल बिगाड़ने की तमाम कोशिशों के बावजूद हिंदू और मुसलमानों के बीच भाईचारा बचा हुआ है.

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Image caption गौमांस की अफ़वाह की वजह से दादरी में भीड़ ने अख़लाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.

अख़बार कहता है कि जिस बिसाहड़ा गांव में एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए क़त्ल कर दिया गया कि उसके फ्रिज में बीफ़ था, वहीं गांव के सभी लोगों ने बदनामी के दाग़ धोने के लिए मुस्लिम बच्चियों की शादी का ख़र्चा उठाया.

अख़बार लिखता है कि इसी घटना के विरोध में बड़े-बड़े साहित्यकार अपने अवॉर्ड लौटा रहे हैं.

इसी सिलसिले में अख़बार ने पुणे की एक हिंदू महिला का दिल एक मस्लिम युवक को लगाने की घटना समेत कई ऐसी घटनाओं का भी ज़िक्र किया जो दोनों समुदायों के भाईचारे का प्रतीक हैं.

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