'सूखा इंसान की बनाई आपदा है'

  • 19 अक्तूबर 2015

(पारंपरिक बीजों के संरक्षण में जुटे पेशे से एडवोकेट अवीक साहा ने संवेदना यात्रा के दौरान कर्नाटक से हरियाणा तक सूखाग्रस्त इलाक़ों की यात्रा की है. इन इलाक़ों में हाइब्रिड बीजों के इस्तेमाल से वह काफ़ी चिंतित हैं.)

सूखा यात्रा में हमने खेत छोड़कर कहीं सूखा नहीं देखा. मेरा अनुमान है कि यह क़ुदरती नहीं बल्कि इंसान की बनाई आपदा है. यानी बारिश के हिसाब से जो हम सूखे की परिभाषा करते हैं, वह ठीक नहीं. हमें कई जगह वो फ़सलें मिलीं, जिनमें बहुत ज़्यादा पानी लगता है.

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जिन-जिन जगहों पर हम गए और किसानों से पूछा कि 40-50 साल पहले आप क्या उगाते थे तो लगभग सभी का कहना था कि उनकी फ़सल कभी-कभार ही बरसात से प्रभावित होती थी, वरना पर्यावरण के मुताबिक़ होती थी.

मैं इस सूखे को मनुष्य का बनाया मानता हूँ.

पौधा अपने पर्यावरण में विकसित होता है और उसके साथ सामंजस्य बना लेता है. हमारे पास 50 वर्ष पहले तक बीज थे. लेकिन हमने लंबे-चौड़े प्रचार के साथ किसान को समझाया कि तुम्हारी फ़सल अगर आठ कुंतल होती है, तो हमारे बीज से 16 कुंतल होगी.

लेकिन हमने किसान को दो बातें नहीं बताईं. पहली यह कि अब बीज तुम्हें हमसे ही खरीदना होगा. दूसरे, इसे तुम्हें ज़्यादा पानी, ज़्यादा खाद, ज़्यादा पेस्टिसाइड देना होगा.

मेरा मानना है कि अगर हम पुराने बीज को नहीं बचा सके, तो हर साल सूखा चलता रहेगा.

कीटनाशक यह नहीं चुनता कि वह खेत में किसे मारेगा. हालांकि विज्ञापन में बताया जाता है कि यह कीटनाशक इस कीट को मारता है मगर विज्ञापन यह नहीं बताता कि ये खेत के दूसरे प्राणियों को भी मारता है.

जब खेत के सभी प्राणी मर जाते हैं तो मिट्टी मिट्टी नहीं रहती, बालू हो जाती है. बीज की मदद करने वाले प्राणी नाइट्रोजन-पोटेशियम जैसे तत्वों को पकाकर फ़सल को बढ़ाने में मदद करते हैं. वो खेत के बावर्ची हैं जिन्हें हमने कीटनाशकों से मार दिया है.

असल में केमिकल खाद से पेड़ को नुक़सान नहीं होता, ज़मीन को होता है. वह पेड़ के लिए नहीं लेकिन खेत के दूसरे प्राणियों के लिए विष है. जो किसान पहले साल एक एकड़ में दो किलो यूरिया डालता था, वह 10 साल बाद 50 किलो डालता है तो धीरे-धीरे वह यूरिया का खेत बन जाता है.

जब कीटनाशक से सभी प्राणी मर जाते हैं, तो उनका भोजन चक्र गड़बड़ा जाता है और फिर कीट बढ़ने लगते हैं. तब कंपनी कहती है कि अच्छा अब यह कीटनाशक इस्तेमाल करें.

धीरे-धीरे खेत के सारे प्राणी मर जाते हैं. यह मानना कि हमें सिर्फ़ फ़सल से मतलब है और बाक़ी बेकार चीज़ें हैं तो धीरे-धीरे किसान का खेत बंजर होने की ओर बढ़ता है.

कुल मिलाकर अब खेत फ़ैक्ट्री बन चुका है, जिसमें बिजली-पानी चला गया तो खेती बंद हो जाती है.

बीटी एक प्राणी है जो मिट्टी में रहता है और पेड़-पौधों को बचाने में मदद करता है. उसे मिट्टी से निकालकर कंपनी ने स्प्रे बनाया, जिसके इस्तेमाल से कीट-पतंग कम लगते थे. पहले हम उपज खरीदकर लाते थे, तो उसे धो लेते थे और वह साफ़ हो जाता था.

अब कंपनी ने बीटी का जींस बीज में डालने के बारे में सोचा ताकि पूरा पेड़ ही कीटरोधी बन जाए. वह हो भी जाता है लेकिन उस पेड़ का जब आप फल जैसे बीटी बैंगन खा रहे होते हैं तो विष खा रहे होते हैं.

इसके अध्ययन के लिए एक इंसान की ज़िंदगी जितना वक़्त चाहिए. इसलिए ऐसे हाइब्रिड बीज प्रकृति से इतने संसाधन खींच रहे हैं कि आप देते-देते थक जाते हैं. फिर हम सरकार और राजनीति को कोसने लगते हैं.

दुनिया का सबसे कामयाब हर्बीसाइड है राउंडअप, जो मोंसेंटो बनाती है. राउंडअप बीज और राउंडअप रेडी का इस्तेमाल हर जगह हो रहा है. राउंडअप और उसके डेरिवेटिव सूखाग्रस्त इलाक़ों में हर जगह इस्तेमाल होते मिले हैं.

1970 में यह कंपनी एजेंट ऑरेंज नाम का केमिकल बनाती थी, जिसका इस्तेमाल वियतनाम युद्ध में अमरीकी सेना ने किया. एजेंट ऑरेंज हर तरह के पेड़ों को जला देता था. इससे सेना को दुश्मनों को देखने में मदद मिलती थी.

एजेंट ऑरेंज जिस कंपाउंड से बना है उसी का एक डेरिवेटिव है ग्लाइफ़ोसिट. राउंडअप हर्बीसाइड का अहम हिस्सा यही डेरिवेटिव है. जिससे हम पूरा जंगल खत्म कर सकते थे, उसे अब अपने खेत में लगा रहे हैं ताकि उसके अलावा कुछ और न बचे.

मोंसेंटो कीटनाशक राउंडअप के साथ ही राउंडअप रेडी नाम से बीज बेचती है. तो एक ही कंपनी दोनों चीज़ें एकसाथ देती है बीज भी और कीट मारने का सामान भी. यह एक तरह का कुचक्र है, जिसमें किसान फंस गया है. उसने अपने सभी पारंपरिक बीज फेंक दिए हैं.

हमें संवेदना यात्रा के दौरान कई ऐसे बीज मिले जिनका अभी तक कंपनियां हाइब्रिड बीज नहीं बना पाईं हैं. जिस दिन वो पीली ज्वार या तिल का हाइब्रिड बीज बना लेंगी, वो भी नहीं मिलेंगे. इसलिए हम इनका संरक्षण कर रहे हैं.

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