सूखे को नहीं पता मराठा और दलित का भेद

सूखा, मराठवाड़ा

मराठवाड़ा में उस्मानाबाद ज़िले के गांव गोजवाड़ा में आपको सूखे की वजह से दरकी हुई ज़मीन मिलेगी तो दरके हुए इंसानी रिश्ते भी मिलेंगे.

सूखे की स्थिति का आकलन करने के लिए की गई संवेदना यात्रा के संयोजक योगेंद्र यादव के साथ जब हम उस्मानाबाद ज़िले के इस गांव में घुसे तो इतना तो साफ़ था कि अगर मराठों को खेतों में पानी चाहिए तो दलितों को भी पानी की ज़रूरत है.

फिर भी दलितों को अपनी या सरकारी ज़मीन पर खेती की इजाज़त नहीं.

'अकाल यात्रा' के दूसरे रिपोर्ताज यहां पढ़ें.

गोजवाड़ा गांव में मराठों और दलितों का अनुपात 80 और 20 का है. ज़्यादातर दलितों के पास अपनी ज़मीन नहीं है और वह सवर्णों के खेत में मज़दूरी करते हैं. अगर पेट भरने के लिए वह ख़ाली पड़ी सरकारी (गायरान) ज़मीन पर खेती करते हैं तो झगड़े होते हैं.

गांव के अशोक वासुदेव तोड़कर बताते हैं कि दलित 1976 से गायरान ज़मीन खेती के लिए मांग रहे हैं. मगर कभी प्रशासन के एक आदेश में उन्हें इजाज़त मिलती है तो दूसरे में छीन ली जाती है.

अशोक कहते हैं, "दो साल से सूखा है तो कुछ लोग मुंबई या दूसरे शहरों में चले गए हैं. पीने के पानी की बड़ी समस्या है. दलित बस्ती में सिर्फ़ एक बोर है और उसमें पानी नहीं निकलता क्योंकि वो 500 फ़ीट की गहराई पर है."

"हमें गांव के हाथ-पांव जोड़कर सवर्णों के खेतों से पानी लाना पड़ता है. हमारे बच्चे-बेटियों को दो-ढाई किलोमीटर जाकर पानी सिर पर रखकर लाना पड़ता है."

असल में बारिश न होने से जो सूखा पड़ा उसमें रही-सही खेती भी चली गई है.

महादेव विट्ठल उन कुछ दलितों में हैं जिनके पास थोड़ी सी खेती है. उन्होंने मुंबई में मज़दूरी करके कमाए पैसे से गांव में 30 गुंटा ज़मीन ली थी, लेकिन उसमें भी परिवार का ख़र्च नहीं चलता. तब उन्होंने सरकारी ज़मीन पर खेती शुरू की पर उसमें गांववालों ने जानवर छोड़ दिए.

वह बताते हैं, "क्या करें, ग़रीब हैं. अब बारिश नहीं हुई तो अनाज भी नहीं. अब दूसरों के खेतों में मज़दूरी करनी पड़ती है. औरतों को सवा सौ रुपए और मर्दों को 150-200 रुपए तक मिलते हैं. जब तुम्हारी खेती में हमारा जानवर चला गया तो मारपीट करते हैं और जब हमारी खेती में तुम्हारा आ गया तो कैसे करेंगे. गांव के आगे कैसे करेंगे. अगर एक दो आदमी को मार दिया तो क्या करेंगे. ग़रीब डरपोक हैं ना. ग़रीब का कोई दाद फिराद नहीं."

महादेव पर क़र्ज़ भी है जिसकी वजह से कुछ महीने पहले उनके एक बेटे ने ख़ुदकुशी कर ली थी.

वह साफ़ कहते हैं, "गांव नहीं चाहता कि मेरी खेती रहे. अगर मेरी खेती होगी तो उनका काम कौन करेगा."

दलित बस्ती की महिलाएं भी कहती हैं कि सूखे से बेशक मराठा समाज भी परेशान है पर उनकी दिक़्क़तें दोगुनी हैं.

अश्विन भारतगोड़े के पति मज़दूरी करते हैं. वह बताती हैं, "मज़दूरी करके अपना ख़र्च चलाते हैं. मैं और पति दोनों मज़दूरी के लिए जाते हैं. मुझे 100 रुपए और आदमी को 150 रुपए मिलते हैं. लेकिन हर दिन काम नहीं मिलता. मेरे बच्चों को घर के बुज़ुर्ग देखते हैं."

इसी दलित समाज की ज्योति मिट्ठुलोंडे पहली लड़की हैं, जो ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं और पढ़ने के लिए वाशी में मौजूद कॉलेज जाती हैं. उन्हें इसके लिए अपने पति और परिवार से पूरा समर्थन हासिल है.

जब मैंने पूछा कि वह क्यों पढ़ रही हैं तो उनका कहना था, "पढ़ने के बाद अपने समाज के लिए कुछ करूंगी. मैं अपने समाज को आगे बढाना चाहती हूं. पानी की समस्या है. यहां के लोगों के घर पर छत नहीं है, खेत नहीं है, काम भी कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता. हम अपनी मांगें उठाएंगे."

और ज्योति ने बीए में विषय लिए हैं – राजनीति शास्त्र और इतिहास. मैंने पूछा कि यही विषय क्यों, तो बोलीं- इनसे जानकारी मिलती है.

तो मराठा लोग दलितों के बारे में क्या सोचते हैं? यह जानने के लिए मैंने देवीचंद थोरबोले से बात की. देवीचंद वैसे 5 एकड़ खेत के किसान हैं लेकिन बारिश नहीं हुई तो उनकी खेती भी सूख गई है. अब वह ड्राइवर बन गए हैं.

वह कहते हैं, "मेरा कहना है कि इन्हें (दलितों को) दो-दो चार-चार एकड़ ज़मीन मिलनी चाहिए लेकिन मैं बाक़ी लोगों की ओर से नहीं कह सकता. क्योंकि सब तरह के लोग गांव में रहते हैं."

असल में दलित दो मोर्चों पर एकसाथ जूझ रहे हैं. मगर उनके सामने सवाल है कि वह पहले सूखे से लड़ें या गांववालों से, क्योंकि सूखा तो दोनों का ही दुश्मन है.

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