सूखे को गंभीरता से नहीं ले रहीं सरकारें: गांधी

महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी रेवाड़ी पहुंची संवेदना यात्रा में सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव के साथ शामिल हुए.

इस दौरान बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था, ''दक्षिण से उत्तर तक सूखा पड़ा है जो इस बार काफ़ी सख्त है. जैसा मुझे पता चला है कि 1996 से इस इलाक़े में (रेवाड़ी में) ठीक से पानी नहीं पड़ा है. उस पर यहां की ज़मीन का पानी खारा है."

वो कहते हैं, "देशभर में इस बार 40 फ़ीसदी तक बारिश कम हुई है. हम जो लोग शहर में रहते हैं वो सिर्फ़ ऐसे नहीं चलते रहने दे सकते हैं. हमें सोचना चाहिए कि देश पर ऐसा कुछ बीत रहा है.''

उनका कहना था, ''देश भर की सरकारें भी सूखे को उस गंभीरता से नहीं ले रही, जैसे लेना चाहिए. सियासी मामले हमारा सोचने का सारा वक़्त ले लेते हैं. मीडिया भी बीसीसीआई चुनाव जैसी बातों में 24 घंटे मसरूफ़ रहता है.''

उनकी शिकायत है कि सूखे के बारे में पर्यावरणवादियों के सिवा कोई नहीं सोच रहा है.

महात्मा गांधी किस नज़र से इस समस्या को देखते और क्या सुझाव देते?

इस पर गोपालकृष्ण गांधी का कहना था, ''गांधी जी ने पर्यावरण और इकोलॉजी का नाम नहीं लिया था पर वह काफ़ी दूरदर्शी थे. आज उनकी विरासत की बात नहीं बल्कि कॉमन सेंस की बात है. हमारा कॉमन सेंस बता रहा है कि क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग सबसे बड़ी समस्या हैं.''

उनका कहना है, ''जब तक हम तकनीक और प्रशासनिक स्तर पर ध्यान नहीं देंगे तो मौजूदा और आने वाली पीढ़ियां सूखे के दुष्प्रभावों से नहीं बच पाएंगी. पानी की समस्या भविष्य में और बड़ी हो जाएगी तो उससे जूझने के लिए हमारी सरकारें क्या कर रही हैं, यह बड़ा सवाल है.''

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