अफ़्रीकी माल और बाज़ार पर भारत की नज़र

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अफ़्रीका को अगले दशक के लिए वैश्विक आर्थिक वृद्धि के इंजन के तौर पर देखा जा रहा है.

कहा जा रहा है कि अफ़्रीका अपनी प्रचुर प्राकृतिक संपदा और विविधताभरी आबादी के बूते पूरे महाद्वीप को एक ऐसे इंजन में तब्दील कर देगा जिससे उसकी अर्थव्यवस्था चीन, ब्राज़ील और भारत से कहीं अधिक रफ़्तार से आगे बढ़ेगी.

बीते दशक में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में औसतन 7.4 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई है, जबकि अफ़्रीका इस मामले में 5.7 प्रतिशत की विकास दर से बढ़ा है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का पूर्वानुमान है कि वर्ष 2012 से वर्ष 2017 के बीच विश्व की सर्वाधिक तेज़ी से बढ़ती 10 अर्थव्यवस्थाओं में से छह अफ़्रीकी देशों की होंगी.

भारत और अफ़्रीका में मध्यवर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है जहां शहरीकरण के साथ आमदनी और कनेक्टिविटी भी बढ़ी है जिसने अप्रत्याशित आर्थिक गतिविधियों को जन्म दिया है जो धरती के इन दोनों ही हिस्सों को आगे बढ़ाने में मदद कर रही हैं.

भारतीय और अफ़्रीकी कारोबार उतना ही पुराना है जितना इतिहास. इस बात के काफ़ी सबूत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता के अरब सागर के रास्ते अफ़्रीकी देशों से कारोबारी संबंध थे.

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अरब के सौदागर भारत और अफ़्रीका के बाज़ारों में जाते थे और इसी बहाने उनके बीच सेवाओं के आदान-प्रदान के साथ-साथ लोगों का भी आना-जाना होता था.

क़ुदरत ने भी मॉनसून के ज़रिए इस कारोबार को फलने-फूलने में भरपूर मदद की.

भारतीय व्यापारियों ने इसका लाभ उठाने में फुर्ती दिखाते हुए सोना, हाथी दांत और क़ीमती पत्थरों की तलाश में अफ़्रीका का रुख़ किया.

पूर्वी अफ़्रीका में मिलने वाले ख़ास तरह के बांस और लकड़ियां अपनी ख़ूबियों की वजह से इमारतों को बनाने में इस्तेमाल किए गए जिन्हें भारत में काफ़ी पसंद किया गया.

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अफ़्रीका ने भारतीय आबादी को भी आकर्षित किया, हालांकि कुछ को जबरन वहां भेजा गया. लेकिन वो भी अब अफ़्रीका का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं जो वहां कारोबार, सरकार और अन्य क्षेत्रों में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं.

अफ़्रीका के साथ भारत का आधुनिक युग में मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार तुलनात्मक रूप से देर से शुरू हुआ, लेकिन इसके बावजूद रफ़्तार पकड़ने में देर नहीं लगी.

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वर्ष 1995 में दोनों के बीच जहां एक अरब डॉलर का कारोबार हुआ जो वर्ष 2008 में बढ़कर 35 अरब डॉलर पर पहुंच गया.

इसके बाद अगले तीन वर्ष में द्विपक्षीय व्यापार ने 45 अरब डॉलर की नई ऊंचाई को छुआ. वर्ष 2015 में ये 70 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है.

अफ़्रीका के 54 में से 40 देशों के साथ भारत कारोबारी लाभ की स्थिति में है जहां उसका आयात कम और निर्यात अधिक है.

अफ़्रीका के साथ भारत कई चीज़ों का व्यापार करता है और भारत से अफ़्रीका को निर्यात होने वाले लगभग हर उत्पाद के साथ कुछ तकनीकी पक्ष भी जुड़ा हुआ है.

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भारत ने अफ़्रीका से मौजूदा वर्ष में कुल 447.5 अरब डॉलर का आयात किया है जिसमें 116.4 अरब डॉलर का तेल और 34.4 अरब डॉलर का सोना शामिल है.

क्षेत्रफल और आबादी के हिसाब से अफ़्रीका दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है. वर्ष 2015 में अफ़्रीका की अनुमानित आबादी 1.166 अरब है.

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ख़ास बात ये है कि अफ़्रीका की आबादी बीते तीन दशकों में दोगुनी से भी अधिक हो गई है जिसकी वजह से यहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है. आधी से अधिक आबादी 25 साल से कम उम्र की है.

भारत भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है जिसे अफ़्रीका से काफ़ी माल की ज़रूरत है और उस माल की क़ीमत चुकाने के लिए अफ़्रीकी बाज़ार पर भी भारत की नज़र है.

इस तरह अफ़्रीका में भारत के लिए आर्थिक संभावनाएं कूट-कूटकर भरी हैं और इसी वजह से भारत उसके साथ आर्थिक संबंध बढ़ा रहा है.

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वैश्विक परिदृश्य में बात करें तो भारत अपने लिए अधिक महत्वपूर्ण भूमिका तलाश रहा है. ऐसे में भारत, अफ़्रीका के उन 54 देशों से अलहदा नहीं रह सकता जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य भी हैं.

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