यूपी की कहानी बिहार में दोहरा सकेंगे शाह?

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बात इसी वर्ष 21 जून की है जब पटना के मोईनुल-हक़ स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए एक गुजराती शख़्स दो मुस्लिम योग ट्रेनरों से सबक़ ले रहे थे.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह अपने हर सार्वजनिक कार्यक्रम को ख़ुद तय करते हैं और उन्होंने जून में ही इशारा कर दिया था कि बिहार विधान सभा चुनाव पर फ़ैसले वही लेंगे.

2014 के आम चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा के झंडे गाड़ने वाले अमित शाह की रणभूमि फ़िलहाल बिहार है.

चंद महीने पहले जब वे प्रदेश भाजपा के लोगों से मिलने पहुंचे तो उन्होंने पार्टी के मीडिया प्रभारी से पूछा, "आपके पास प्रदेश के कितने मीडिया वालों के नंबर हैं?"

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जवाब सुनते ही अमित शाह बोल बैठे, "इतने से काम नहीं चलेगा. सभी के नंबर जुटाओ और प्रतिदिन सबसे बात होती रहनी चाहिए".

पटना के भाजपा कार्यालय में पिछले एक महीने से रोज़ क़रीब पांच सौ लोगों का नाश्ता, लंच और डिनर बनाने के लिए हलवाई जुटे रहते हैं और ये 'रौनक़' अमित शाह के सक्रिय होने के चलते ही है.

इस बीच अमित शाह ने बिहार में वो सब दोहराने की कोशिश की है जो उन्होंने उत्तर प्रदेश में किया था.

पिछले पांच महीने से प्रदेश भाजपा के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को बेहतर बूथ मैनेजमेंट के आदेश मिलते रहे हैं जो कि यूपी में भी हुआ था.

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राजधानी पटना में ही भाजपा के कम से कम चार चुनावी वॉर रूम दिन-रात सक्रिय हैं और किसी एक के भीतर जाने की कोशिश का मतलब मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा है.

पार्टी कार्यालय और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के घर के अलावा पटना के एसपी वर्मा रोड पर भाजपा सांसद आरके सिन्हा के बेटे अपने घर पर एक वॉर रूम के ज़रिए सीधे अमित शाह को रिपोर्ट करते हैं.

उत्तर प्रदेश में भी अमित शाह ने यही किया था और सुनील बंसल समेत भाजपा संगठन के लोग दिन रात डाटा जुटाने में लगे रहते थे.

अमित शाह का अंदाज़ भी वही पुराना है. प्रदेश और स्थानीय नेताओं को इस बात की भनक भी नहीं होती कि वॉर रूम में काम किस चीज़ पर हो रहा है.

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अक्तूबर 2010 से लेकर सितंबर 2012 तक जब सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अमित शाह को गुजरात से बाहर रहने के लिए कहा था तब उन्होंने किसी से कहा था, "वैसे तो अपने प्रदेश से दूर रहना कष्टदायी होता है लेकिन पार्टी में जेपी नड्डा, धर्मेन्द्र प्रधान और भूपेंद्र यादव जैसे मित्र मेरा बहुत ध्यान रखते हैं."

अब ये महज़ इत्तेफ़ाक़ से ज़्यादा है कि यही तीनों भाजपा नेता अमित शाह के लिए पिछले दो महीनों से बिहार में काम कर रहे हैं और भूपेंद्र यादव तो पार्टी कार्यालय में सुबह आठ बजे से लेकर रात दस बजे तक वॉर रूम संभालते हैं.

2014 आम चुनाव के पहले भाजपा का उत्तर प्रदेश में वही हाल था जो बिहार विधान सभा चुनाव के पहले था.

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यानि सभी शीर्ष नेता एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे. अमित शाह ने यहाँ डेरा डालते ही सभी को सख़्त आदेश दिए, "पार्टी के लिए काम कीजिए अपने लिए नहीं. बाद में फ़ैसले होंगे किसे क्या मिलेगा".

जानकार बताते हैं कि अमित शाह ने बिहार चुनावों की कमान संभालते ही उन जातियों पर ध्यान केंद्रित डरना शुरू किया जो लालू यादव और नीतीश कुमार की फ़हरिस्त में नीचे आते थे.

रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा तो पहले से साथ थे जीतन राम मांझी को मिलाकर अमित शाह ने बिहार के जातीय समीकरणों पर काम किया है.

अमित शाह की हर चुनावी रणनीति पर गुजरात की छाप साफ़ दिखती है और भाजपा के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि भाजपा ने इन चुनावों में पैसे को पानी की तरह बहा रखा है.

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सूरत और अहमदाबाद से भी कई बड़े बिज़नेसमैन बिहार का दौरा कर चुके हैं और अगर भाजपा पार्टी कार्यालय के सामने चौबीसों घंटे खड़ी रहने वाली एसयूवी गाडियों पर नज़र दौड़ाइए तो लगेगा प्रदेश में नीतीश की जदयू का नहीं भाजपा का ही शासन है.

कुछ ऐसा ही उत्तर प्रदेश में भी दिखा था.

शायद इसीलिए अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा के प्रचार के लिए 10 हेलिकॉप्टर रोज़ सेवा में रहते हैं जबकि नीतीश के पास दो और लालू के पास प्रचार के लिए एक ही हेलीकॉप्टर है.

लेकिन कई वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश का दौर दूसरा था और यहाँ अमित शाह ने कुछ ग़लतियां भी की हैं.

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पीटीआई के ब्यूरो चीफ़ संजय सिन्हा का मानना है कि बिहार विधान सभा चुनाव में स्थानीय नेताओं को महत्व न दिया जाना भाजपा के ख़िलाफ़ जा सकता है.

जबकि टेलीग्राफ़ अख़बार के नलिन वर्मा के अनुसार, "भाजपा के सामने बड़ी चुनौती थी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की. दिल्ली में मुँह की खाने के बाद पार्टी न तो हिम्मत जुटा सकी और बिहार के जातीय समीकरणों को देखते हुए न ही वो ये करने की भूल करना चाहती थी. अब सवाल ये है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए वोट देने वाला बिहार का मतदाता अपने मुख्यमंत्री के लिए किसे वोट दे?"

अमित शाह के समक्ष पिछले दो महीनों में चुनौतियाँ भी सिर्फ़ स्थानीय नहीं रहीं है.

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दादरी में बीफ़ को लेकर हुए 'हत्या कांड' और बाद में जनरल वीके सिंह के बयान पर तो बिहार में भाजपा के सहयोगी दलों ने पार्टी से सफ़ाई मांग ली.

जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर एक विवादित बयान दिया था तब अमित शाह पटना के मौर्या होटल में डेरा डाले हुए थे.

अगले दिन सुबह आठ बजे वे अपने कमरे से फ़ोन पर प्रदेश भाजपा के सभी बड़े नेताओं को दहाड़-दहाड़ के बता रहे थे, "हम आरक्षण का पूरा समर्थन करते हैं और सभी को यही बात दोहरानी है".

ये अमित शाह के काम करने का तरीक़ा है जिसे बिहार का मतदाता पसंद करेगा या नकारेगा, इसका पता जल्द लगने वाला है.

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