हासिल क्या हुआ ज़करबर्ग को.. और आपको?

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फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग ने कल दिल्ली में आयोजित पहले टाउन हॉल सभा में कहा कि भारत में 10 फ़ीसदी लोग ही फ़ेसबुक से जुड़े हैं और बाक़ी 90 फ़ीसदी को इंटरनेट से जोड़ने के लिए वे भारत आए हैं.

उनसे पहला सवाल यही पूछा गया था कि वे भारत बार-बार क्यों आ रहे हैं?

टाउन हॉल ऐसे आयोजन हैं जहां विश्व के नेता जनता के प्रश्नों का जवाब देते हैं.

उन्होंने कहा कि दुनिया में चार अरब लोग अब भी इंटरनेट से नहीं जुड़े हैं और उनमें से एक अरब भारत में हैं इसलिए यदि उनका उद्देश्य सारी दुनिया को इंटरनेट से जोड़ना है तो यह काम भारत के बग़ैर नहीं किया जा सकता, जब ये लोग इंटरनेट से जुड़ेंगे तो व्यापार भी देंगे.

बुधवार को आईआईटी दिल्ली में ख़ासी भीड़ थी और इस चर्चा से कई घंटों पहले से लोग लाइन में लगे हुए थे.

दुनिया में कम ही ऐसे नेता होंगे जिनको सुनने के लिए आज के शिक्षित युवा इतनी लम्बी लाइन में खड़े होंगे.

मार्क ज़करबर्ग युवा हैं और उन्होंने वो कर दिखाया है जो बहुत अधिक उम्र के बहुत योग्य नेता भी नहीं कर पाए हैं, इसलिए उनसे आशा तो बनती है इसलिए मैं भी उनको सुनने गया.

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उन्होंने कहा कि आज जिन लोगों के पास इंटरनेट नहीं है उनमें से कुछ के पास सिग्नल की समस्या है, वे जहाँ रहते हैं वहां इंटरनेट ही उपलब्ध नहीं है तो कुछ के इलाक़ों में इंटरनेट तो है पर वे इसका ख़र्च वहन नहीं कर सकते और कुछ के पास इंटरनेट और पैसे दोनों हैं पर उनको यह नहीं पता कि इंटरनेट से जुड़ने से उनको क्या फ़ायदा होगा.

वे इन तीनों मुद्दों पर काम करना चाहते हैं.

फ़ेसबुक ने हाल में इंटरनेट डाट ओर्ग नाम की एक संस्था शुरू की है जिसमें वे सैटेलाइट आदि की मदद से उन इलाक़ों में मुफ़्त इंटरनेट की सुविधा प्रदान कर रहे हैं जहां इंटरनेट उपलब्ध नहीं है. पर इस सुविधा में कुछ ही वेबसाइट्स खुलती हैं सभी नहीं.

दुनिया में प्रबुद्ध लोग इस सुविधा का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि यह सुविधा नेट न्यूट्रेलिटी या सभी को इंटरनेट पर बराबर अधिकार की सुविधा का उल्लंघन करता है.

सभी की यह समझ है कि मूलत: यह टाउन हॉल उस विरोध को कम करने की दिशा में एक प्रयास है.

मार्क ज़करबर्ग ने कहा कि वे नेट न्यूट्रेलिटी के सौ फ़ीसदी समर्थक हैं पर दुनिया के बाक़ी बचे लोगों को इंटरनेट से जोड़ना एक ख़र्चीला काम है और इस काम का वे लोग विरोध कर रहे हैं जो ख़ुद इंटरनेट से जुड़े हैं.

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मैं मार्क ज़करबर्ग के इस मुहिम का समर्थक हूँ. बराबरी एक अच्छा सिद्धांत है पर जब दुनिया के बहुसंख्य लोगों के पास इंटरनेट नहीं है तब उन्हें इंटरनेट के थोड़े से हिस्से का भी स्वाद चखाने का यह प्रयास सराहनीय है.

दुनिया में जो लोग ख़ुद सुपर हाईवे में रहते हैं और उससे नीचे नहीं आना चाहते उनका बराबरी की दुहाई देकर पगडंडी बनाने के प्रयास का विरोध करना दोगलापन लगता है.

ज़करबर्ग ने आगे कहा कि वे बेआवाज़ को आवाज़ देना चाहते हैं पर आश्चर्यजनक रूप से उनके रोड मैप में आवाज़ को कोई स्थान नहीं है.

उन्होंने कहा कि उनकी संस्था इंटरनेट डाट ओर्ग अभी लोगों को मुफ़्त में टेक्स्ट की सुविधा दे रही है और भारत में 10 लाख और दुनिया में डेढ़ करोड़ लोग इसकी मदद से एक साल में इंटरनेट से जुड़े हैं.

इसके बाद वे फोटो और वीडियो की ओर आगे बढ़ेंगे, उन्होंने आवाज़ का कोई ज़िक्र नहीं किया.

इस सोच में मुझे एक बड़ी ख़ामी नज़र आती है.

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दुनिया का बड़ा हिस्सा आज भी बोलने और सुनने में अधिक सहज महसूस करता है लिखने, चित्र खींचने और वीडियो बनाने में नहीं.

ज़्यादातर लोगों के पास अब भी चित्र खींचने और वीडियो बनाने वाले यंत्र नहीं हैं पर बहुतों के पास बोलने के लिए बेसिक मोबाइल फ़ोन हैं और वे अपनी मातृभाषा में अपनी बात कह सकते हैं.

आवाज़ पर आधारित बेसिक मोबाइल को इंटरनेट से जोड़कर ग़रीब का फ़ेसबुक और गूगल बनाया जा सकता है जिसे ज़करबर्ग अगर चाहें तो बना सकते हैं. ज़करबर्ग ने बुधवार को एक ऐसा वीडियो बनाने पर भी बात की जिसे देखकर आप घटना में शामिल रहने का अनुभव पा सकेंगे.

दुनिया को उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए पर ज़करबर्ग यदि सच में सारी दुनिया को जोड़ने का सपना देखते हैं तो उनको आवाज़ पर भी ध्यान देना चाहिए.

ज़करबर्ग से कल अधिकतर सवाल उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में किये गए और उन्होंने एक विज़नरी नेता की तरह जवाब दिए.

उन्होंने कहा कि मीडिया एक व्यक्ति को ही हमेशा आगे करता है जबकि कोई भी बड़ा काम हमेशा सम्मिलित प्रयास होता है. फ़ेसबुक एक व्यक्ति ने नहीं बनाया पर जो भी नाम उन्होंने लिए उसमे एक भी भारतीय नहीं था. उन्होंने कहा, ''आप इन्हें नहीं जानते क्योंकि मीडिया एक ही हीरो चुनता है पर इन सब के बग़ैर फ़ेसबुक नहीं बन सकता था. कुछ बड़ा काम करने के लिए 4-6 लोगों का समूह होना ज़रूरी है.''

उन्होंने कहा कि अधिकतर लोग कंपनी बनाने के लिए कंपनी बनाते हैं और असफल होते है.

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उनके अनुसार ज़रुरत है उस काम को करने की जिसके बारे में आप फ़िक्र करते हैं. उन्होंने कहा कि काम करते रहिये कंपनी अपने आप बन जाएगी.

उन्होंने कहा, “मेरी ही तरह बहुत से लोगों ने यह नहीं सोचा था कि वे जो काम कर रहे हैं वह इतना बड़ा हो जाएगा, वे सिर्फ़ अपना काम करते रहे और इतिहास बनता गया.”

ज़करबर्ग एक अच्छे वक्ता हैं और अच्छे व्यापारी भी. अब समय ही बताएगा कि सिर्फ़ व्यापार ही उनकी प्राथमिकता है या एक बेहतर दुनिया बनाने में वे और योगदान देना चाहते हैं.

उन्होंने कहा कि बेहतर दुनिया बनाने के लिए व्यापार भी ज़रूरी है और मेरी समझ है कि उनको इसके लिए बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट देना चाहिए.

(लेखक मध्य भारत के आदिवासी इलाक़ों में मोबाइल फ़ोन पर सामुदायिक रेडियो का प्रयोग सीजीनेट स्वर से जुड़ें हैं)

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