साइकिल ने दी लड़कियों के सपनों को उड़ान

  • 31 अक्तूबर 2015
बिहार साइकिल

लोकसभा चुनाव के दौरान मैंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की साइकिल योजना का जायज़ा लिया था. कुछ तकनीकी परेशानियों को छोड़कर सभी ने इस योजना की तारीफ़ की थी.

स्कूल प्रबंधन ने भी माना था कि लड़कियों में गज़ब का भरोसा आया है और वे अपने को लड़कों के समकक्ष समझने लगी हैं.

नीतीश कुमार सरकार ने भी अपनी उपलब्धियों में साइकिल योजना को ख़ास अहमियत दी है.

साल भर से ज़्यादा समय के बाद एक बार फिर मैं कुछ इलाक़ों में उन स्कूली छात्राओं से मिला, जो साइकिल से स्वतंत्रता का नया अनुभव कर रही हैं. हालांकि कई बार उन्हें परेशानियों का सामना भी करना पड़ा है.

चलिए इन लड़कियों की ज़ुबानी ही जानते हैं साइकिल से जुड़े उनके अनुभव.

अंजनी कुमारी

मुझे 2103 में साइकिल मिली थी. पिछले दो साल से मैं साइकिल चला रही हूँ. जब हमारे पास साइकिल नहीं थी, तो हमें पैदल स्कूल जाना पड़ता था.

अब कहीं भी जाना होता है, तो तुरंत साइकिल निकालो और पहुंच जाओ. साइकिल हम लोगों के लिए काफ़ी आरामदायक है.

लड़कों को जब हम पहले साइकिल चलाते देखते थे, तो हमें भी बहुत मन करता था. जब से साइकिल मिली है, हमें ये लगने लगा है कि हम भी लड़कों से कम नहीं हैं. अब पढ़ाई में भी काफ़ी आत्मविश्वास आया है.

साइकिल चलाना सीखने में काफ़ी परेशानी हुई. कई बार हम लोग गिर जाते थे. एक परेशानी ये भी है कि कई बार साइकिल रास्ते में ख़राब हो जाती है तो साइकिल लेकर पैदल आना होता है.

एक बार एक्सीडेंट हो गया था और रास्ते में कोई नहीं था. फिर हम लोगों को अपने टीचर को बुलाना पड़ा. ऐसा तो कई बार होता है.

मिनता कुमारी

जब पहले कोचिंग जाना पड़ता था, तो हम लोगों को लगता था कि कोचिंग तो दूर है. लड़के लोग तो साइकिल से चले जाते थे, लेकिन हमें काफ़ी परेशानी होती थी.

हम चाहकर भी कोचिंग नहीं जा पाते थे और गांव में ही कोचिंग करते थे, जिससे पढ़ाई कमज़ोर हो जाती थी.

प्रियंका कुमारी

Image caption प्रियंका और आकृति कुमारी

फ़ायदा ये होता है कि हम कम समय में स्कूल पहुंच जाते हैं. कोई काम भी होता है तो ख़ुद साइकिल से चले जाते हैं.

दिक्कत यह है रास्ते में साइकिल के पंचर होने से लंबा सफ़र पैदल तय करना पड़ता है. कई बार दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं.

कई बार गांव के लोग ये भी कहते हैं कि ये लड़कियां साइकिल से पढ़ने थोड़े ही जाती हैं, ये तो मज़े करने जाती हैं.

पूजा कुमारी

पहले हम लोग सोचते थे कि कैसे दूर जाकर पढ़ेंगे. इसलिए अच्छी पढ़ाई नहीं हो पाती थी.

जूली कुमारी

अगर हमारे पास साइकिल है, तो किसी भी काम के लिए सोचना नहीं पड़ता. गांव में पढ़ाई अच्छी नहीं होती है और अच्छी पढ़ाई के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है.

पहले लड़कों को तो कोई परेशानी नहीं थी लेकिन हमें होती थी. लेकिन अब हमारे पास भी साइकिल है.

हालांकि साइकिल मिलने के बाद भी हमें ये सुनना पड़ता है कि लड़की साइकिल से इतनी दूर कैसे जाएगी, उसके साथ कुछ हो सकता है.

सरिता कुमारी

साइकिल रहने से कोई भी काम आसानी से हो सकता है. साइकिल नहीं रहने पर कुछ दूर जाने में भी परेशानी थी और घर वाले जाने भी नहीं देते थे. अब ऐसा नहीं हैं.

आकृति कुमारी

Image caption जूली और मानसी

कहीं भी जाना होता है, तो झट से साइकिल निकालिए और फट से पहुंच जाइए.

मानसी कुमारी

साइकिल से आते समय अकेले रहने पर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ भी हो सकती है.

मेरी एक दोस्त के साथ ऐसा ही हुआ था. लेकिन हमलोग हिम्मत से ऐसे लोगों का सामना भी करते हैं.

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