'आउटडेटेड पढ़ाई से कैसे मिलेगी नौकरी?'

महेंद्र शेखावत

सोमवार की एक सुबह मुंबई के एक उपनगर में स्टेशन के बाहर महेंद्र सिंह शेखावत काम का इंतज़ार कर रहे हैं.

महेंद्र सिंह निर्माण मज़दूर हैं और उन्हें ठेकेदार का इंतज़ार है. महेंद्र सेरेमिक टाइल्स लगाने वाले हेल्पर के रूप में काम करते हैं और एक दिन का लगभग 400 रुपया कमा लेते हैं.

वे बताते हैं, "मुझे कभी कोई प्रशिक्षण नहीं मिला. हमें कोई बताने वाला नहीं था. काम करने के दौरान ही हमने देखा और सीखा."

"अगर मुझे निर्माण क्षेत्र का कोई हुनर आ जाए तो मैं ज़्यादा कमाने लगूंगा, मेरा काम ज़्यादा स्थाई होगा और भविष्य सुरक्षित हो जाएगा. लेकिन हमें पता ही नहीं कि हमारी मदद कौन कर सकता है."

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महेंद्र उन लाखों भारतीयों में से हैं जो देश की अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमशक्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा हैं. इनमें से ज़्यादातर को कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला है.

महेंद्र जैसों की मुश्किल कम करने के लिए और युवाओं की बेरोज़गारी ख़त्म करने के लिए, जो इस समय 12.9 प्रतिशत है, नरेंद्र मोदी सरकार ने हाल ही में 'स्किल इंडिया मिशन' शुरू किया है.

'स्किल इंडिया मिशन' के पहले साल में सरकार का लक्ष्य 24 लाख युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देना है.

मुंबई के नर्सी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ (एनएमआईएमएस) से फ़ार्मेसी की पढ़ाई कर रहीं 22 वर्षीया प्रतिमा जैन को अपना पाठ्यक्रम आउटडेडेट लगता है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "औद्योगिक विकास और तकनीक में बदलाव के मुकाबले शैक्षणिक सुधार और अपग्रेड की रफ़्तार काफ़ी कम है."

"ज़्यादातर कॉलेजों में अब भी विद्यार्थियों और उद्योग पेशेवरों के बीच संवाद की कमी है."

"एक विद्यार्थी होने के नाते कैरियर के बारे में फ़ैसला लेना आसान हो जाता (अगर) आपको यह पता होता कि उद्योग के सफल लोगों ने कौन सा रास्ता अपनाया था."

भारतीय नियोक्ता अक्सर शिकायत करते हैं कि कुशल श्रमिकों का अभाव है. इसका अर्थ यह हुआ कि नौकरी के दौरान प्रशिक्षण देने पर उन्हें समय, पैसा और मेहनत लगानी पड़ती है.

सिप्रा इंजीनियर्स के प्रबंध निदेशक वंदन शाह कहते हैं, "हमारे जैसे बहुत से हैं जो लोगों को काम पर रखना चाहते हैं लेकिन हमें सही कर्मचारी नहीं मिलते."

उनकी कंपनी के महाराष्ट्र में तीन सयंत्र हैं जो कार पुर्ज़े और औद्योगिक ज़रूरत का सामान बनाते हैं. 500 कर्मचारियों वाली कंपनी का टर्नओवर 1.17 अरब रुपये है.

वो कहते हैं, "बहुत से लोग नौकरी करना चाहते हैं लेकिन वो कुशल नहीं हैं."

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"मुझे नहीं लगता कि एक उद्योग के रूप में हम अपनी श्रमशक्ति को प्रशिक्षित करने के लिए पर्याप्त काम कर रहे हैं-इसलिए बदलाव की ज़रूरत है."

"हमें युवा स्नातक मिलते हैं, ख़ासतौर पर इंजीनियर, जो तेज़ी से आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन फ़ैक्ट्री में अपने हाथ काले किए बिना. इसकी वजह से वह तेज़ी से नौकरियां बदलते हैं. यह बहुत ज़रूरी है कि वे सही समय पर अपना नज़रिया दुरुस्त करें."

उनका कहना है कि भारत में ज़्यादा व्यावसायिक केंद्र होने चाहिए और उद्योग, सरकार और शिक्षण संस्थाओं की ओर से निवेश भी, ताकि उच्च शिक्षा को ज़्यादा बाज़ार केंद्रित बनाया जा सके.

मुंबई स्थित एक एचआर कंसल्टेंसी कंपनी, शिलपुत्सी, की बॉस पुर्वी सेठ कहती हैं कि कई बार जो कंपनियां चाहती हैं, श्रम बाज़ार में उपलब्ध प्रतिभा में अंतर होता है.

वो कहती हैं, "यह व्यक्तियों के अलावा कंपनियों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो हुनर के इस अंतर को कम करें."

"लोगों के लिए ये जानना महत्वपूर्ण है कि कहां उनके हुनर का कोई मतलब नहीं है और कंपनियों को अन्य-कामों का प्रशिक्षण और काम में बदलाव को प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है."

आईटी प्रशिक्षण देने वाली कंपनी एप्टेक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी निनाद कार्पे कहते हैं कि भारत में श्रम बाज़ार की कई समस्याएं हैं जैसे कि बेरोज़गारी, रोज़गार न मिलने की आशंका और भारी जनसंख्या.

"ये सब दिक्कतें एक साथ दूर नहीं की जा सकतीं लेकिन अगर हम इन तीनों पर नज़र डालें तो नौकरी न मिलने की आशंका से निपटा जा सकता है."

कार्पे की कंपनी ने दुनिया भर में 70 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया है. वो मानते हैं कि भारत में हुनर की कमी की एक बड़ी वजह अच्छी गुणवत्ता की शैक्षिक व्यवस्था का अभाव है.

वह कहते हैं कि एक हल यह है कि उद्योग ज़्यादा शिक्षण संस्थानों के साथ जुड़ें और ज़्यादा इंटर्नशिप करवाएं.

"बहुत से देशों में विद्यार्थी एक स्तर तक व्यावसायिक प्रशिक्षण लेते हैं और इंटर्नशिप करते हैं. भारत में ऐसा करने वालों की संख्या एक अंक में है."

यह बड़ी समस्या है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की 48.70 करोड़ की श्रमशक्ति में से 5 प्रतिशत से भी कम को काम का औपचारिक प्रशिक्षण मिला है. अन्य औद्योगीकृत देशों में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत है.

भारत सरकार का कहना है कि स्किल इंडिया मिशन का लक्ष्य प्रायोगिक व्यावसायिक हुनर का प्रशिक्षण और बेहतर शिक्षा देना है. साथ ही प्रशिक्षण पूरा करने वालों को इनाम के रूप में पैसा भी दिया जाना है.

शिलपुत्सी की पुर्वी कहती हैं, "इसे लागू करना और प्रशिक्षण की गुणवत्ता एक चुनौती है. अगर इन दोनों को सर्वोच्च स्तर तक बनाए रखने के उपाय किए जाते हैं तो यह प्रशिक्षित प्रतिभा के लिए शानदार स्रोत बनेगा."

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हुनर के मेल न खाने के अलावा बहुत से भारतीय युवाओं की उम्मीद उच्च शिक्षा ख़त्म करते ही सफलता पाने की है और वे अपनी टेक कंपनियां शुरू कर उद्यमी बन रहे हैं. वित्त मंत्रालय के अनुसार, इससे भारत स्टार्ट अप के लिए दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश बन रहा है.

हालांकि एप्टेक के निनाद कार्पे की चेतावनी है कि भारत जिस समस्या का सामना कर रहा है वह अंततः इसकी आर्थिक क्षमता को प्रभावित करेगा.

भारत की कंपनियों के संदर्भ में वे कहते हैं, "अगर हम युवा भारतीयों की उम्मीदें पूरी नहीं कर पाए हैं तो हम अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने में नाकाम हैं. हमें सबसे अच्छी प्रतिभा नहीं मिलेगी."

उनके मुताबिक़ कंपनियों को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जो उम्मीदों और वास्तविकता के बीच की खाई को पाटे.

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