बिहारः 10वीं बार भी चलेगा 'राम' का जादू

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बिहार सरकार में मंत्री रमई राम का विधानसभा चुनावों में जीत का रिकाॅर्ड बहुत ‘ऊंचा’ है.

बोंचहा सुरक्षित सीट से जदयू उम्मीदवार रमई राम अब तक 9 बार विधायक चुने गए हैं. वे 1980 से लगातर इस क्षेत्र से विधायक चुने जा रहे हैं.

मुजफ्फरपुर ज़िले की इस सीट से मैदान में डटे रमई बिहार के प्रमुख दलित नेता हैं. इस बार उनका मुकाबला लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा के अनिल कुमार ‘साधू’ और निर्दलीय उम्मीदवार बेबी कुमारी से है.

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लोजपा उम्मीदवार अनिल केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के वही दामाद हैं जो पार्टी और अपने ससुराल पर उपेक्षा और कई दूसरे आरोप लगाते हुए समाचार चैनल के कैमरों के सामने रो पड़े थे.

हालांकि बाद में उन्होंने माफी मांग कर पार्टी में वापसी की और टिकट पाने में भी कामयाब रहे.

मुज़फ्फरपुर शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित बोंचहा प्रखंड में चुनावी आबो-हवा का जायज़ा लेते हुए जो पहली बात समझ में आती हैं वो यह कि यहां से 'एनडीए के एक नहीं दो उम्मीदवार' हैं.

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दरअसल यहां के लोग बताते हैं कि बेबी कुमारी को लोजपा ने पहले उम्मीदवार बनाने की घोषणा की थी. लेकिन बाद में उनका टिकट काट कर पार्टी ने अनिल को उम्मीदवार बना दिया.

बोंचहा प्रखंड अस्पताल के पास मिले संजय कुमार बताते हैं, "टिकट कटने के बाद बेबी ने निर्दलीय पर्चा भरा. साथ ही उन्होंने यह भी घोषण कर दी कि जीतने के बाद वह भाजपा का ही समर्थन करेंगी."

इसके बाद इलाके के लोगों के मुताबिक भाजपा की पूरी ताकत अपने गठबंधन के उम्मीदवार के बजाय बेबी के साथ दिख रही है.

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Image caption रमई राम

एनएच-57 के ठीक बगल में कर्णपुर गांव के पासवान टोला के विजय बताते हैं, "बीते दिनों रामविलास पासवान ने इलाके में एक बैठक की थी. इसमें उन्होंने इस बात को लेकर नाराजगी जताई थी कि भाजपा के स्थानीय नेता अनिल का साथ नहीं दे रहे हैं."

इन सबके बीच बोंचहा का अंकगणित विकास की ख्वाहिशों और सामाजिक समीकरणों पर टिका दिखता है.

विकास के लिए हरेक के मायने जहां अलग-अलग हैं, तो वहीं कुछ लोग इशारों में तो कुछ खुलकर जाति-बिरादरी की बात करते हैं.

इलाके में दलितों में दुसाध, मुसहर और ऐसी ही जातियों के वोट निर्णायक माने जाते हैं. राजनीतिक पंडितों के मुताबिक अभी बिहार में रामविलास पासवान के कारण दुसाध जाति और जीतनराम मांझी के कारण मुसहर समुदाय का झुकाव एनडीए की तरफ है.

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लेकिन बेबी कुमारी के कारण एनडीए के समर्थक वर्ग में टूट-फूट दिखाई देती है. वहीं रमई राम जिस समुदाय से आते हें वह उनके साथ मजबूती से खड़ा दिखाई दे रहा है.

जैसा कि सविता देवी बताती हैं, "हमें रमई से कोई शिकायत नही हैं. जात है, जात पर जाएंगे हम लोग. सारा दुनिया जात पर चला गया तो हम लोग भी चले जाएंगे तो क्या होगा."

जहां एक ओर सामाजिक समीकरण रमई के पक्ष में दिखते हैं तो लंबे समय से विधायक-मंत्री होने से जुड़ी अपेक्षाएं पूरी नहीं होना उनके खिलाफ जाता हुआ दिखता है.

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Image caption इलाके में विकास न होने के चलते लोगों में नाराज़गी

बिजली और सड़क की स्थिति में सुधार की बात तो लोग मानतेे हैं कि लेकिन ये उपलब्धियां सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनियमितता, शिक्षा के क्षेत्र में बदहाली जैसी समस्याओं के सामने छोटी पड़ती दिखती हैं.

जैसा कि बोंचहा बाजार में बातचीत के दौरान राजकिशोर महतो कहते हैं, "45 साल से रमई बस वादा ही कर रहे हैं. उनसे जनता खुश नहीं है."

साथ ही क्षेत्र के लोग रमई का काफी उम्रदराज़ होना भी उनकी एक कमी मानते हैं. रमई अभी उम्र के आठवें दशक में हैं.

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