इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के 15 साल पूरे

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अनशन पर बैठी मणिपुर की इरोम शर्मिला को रविवार को भूख हड़ताल करते 15 साल पूरे हो गए हैं.

इन 15 वर्षों में शर्मिला के इस आंदोलन को मणिपुर से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार विशेषज्ञों तक का समर्थन मिला, लेकिन शासन-व्यवस्था में कहीं कोई फर्क नज़र नहीं आया.

मानव अधिकार की पैरवी कर रही 42 वर्षीय शर्मिला की मांग है कि मणिपुर के विभन्न हिस्सों में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ़्स्पा) को पूरी तरह हटाया जाए.

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शर्मिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चिट्ठी लिख चुकी हैं.

शर्मिला की देखभाल करने वाले डॉक्टर कई बार कह चुके हैं कि इतने लंबे समय से भोजन नहीं करने की वजह से उनकी हड्डियां बेहद कमजोर हो गई हैं और ऐसे में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ेगा.

शर्मिला के इस अनशन को मणिपुर में मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रहे लोगों की ताकत बताने वाले ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइटोंगबम ने बीबीसी से बातचीत की.

उन्होंने बताया कि आफ़्स्पा को लेकर भले ही भूख हड़ताल पर बैठी इरोम शर्मिला को अभी सफलता नहीं मिली है, लेकिन उनके इस आंदोलन ने मानवाधिकार की लड़ाई को हिंदुस्तान और दुनिया में एक बड़ा मुद्दा बना दिया है.

उन्होंने कहा, "शर्मिला के आंदोलन की वजह से आज मणिपुर के माहौल में बदलाव दिखा रहा है. उसकी आवाज़ अब सैकड़ों लोगों की आवाजों को बुलंद कर रही है."

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Image caption डॉक्टर विजयलक्ष्मी बरारा

मणिपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विषय की डॉक्टर विजयलक्ष्मी बरारा कहती हैं 15 साल का शर्मिला का आंदोलन यूं ही बेकार नहीं जाएगा.

विजयलक्ष्मी कहती हैं, "यह शर्मिला का आंदोलन ही है जिससे लोगों का नज़रिया बदला है. इफांल नगर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाया जा चुका है, उम्मीद है कि आने वाले समय में इस कानून को समूचे मणिपुर से हटा लिया जाएगा."

मणिपुर के स्थानीय पत्रकार जेम्स खंगेनबम कहते है कि शर्मिला का आंदोलन कभी कमजोर नहीं पड़ सकता.

वो कहते हैं, "मणिपुर के लोग जानते है कि अगर शर्मिला का आंदोलन नहीं होता तो इतनी ताकत के साथ मानवाधिकार की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती थी."

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Image caption स्थानीय पत्रकार जेम्स खंगेनबम

मणिपुर में अलगाववाद से निपटने के लिए राज्य में कई दशकों से सेना तैनात है, जिसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून के इस्तेमाल की छूट है.

इसके तहत सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस क़ानून की आड़ में सेना ने कई मासूमों की फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में हत्या की है.

राजधानी इंफाल के मालोम इलाके में असम राइफ्ल की गोलीबारी में मारे गए 10 मणिपुरी युवकों की मौत के बाद आज ही के दिन वर्ष 2000 में शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठी थीं.

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