अ​सहिष्णुता के ख़िलाफ़ 'प्रतिरोध' की अावाज़

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रविवार को दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब के मावलंकर सभागार में, देश के बौद्धिक जगत की कई नामचीन हस्तियों ने 'प्रतिरोध' नाम के एक कार्यक्रम में शिरकत की.

आयोजकों की ओर से सभागार के बाहर स्वागत और रजिस्ट्रेशन कर रहे युवा, शिरकत करने आ रहे लोगों को काले रंग के रिबन से बना एक बैच भी दे रहे थे.

ये बैच आयोजकों की ओर से, देश भर में, वैज्ञानिक विचारों और विवेकपूर्ण सोच के ख़िलाफ़ बढ़ती असहिष्णुता के विरोध का प्रतीक था.

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पूणे में अज्ञात लोगों द्वारा हत्या कर दिए गए तर्कवादी विद्वान नरेंद्र दाभोलकर की जयंती के अवसर पर कुछ स्वतंत्र बुद्धिजीवियों ने यह आयोजन रखा था.

हाल के दिनों में नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पांसरे और एमएस कलबुर्गी जैसे तर्कवादी विद्वानों की उनके विचारों को लेकर हत्या कर दी गई थी.

उसके बाद से कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों, फ़िल्मकारों और विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े लोगों ने विरोध जताते हुए अपने पुरस्कार लौटाए थे.

मावलंकर सभागार श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था और देश के महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों के संबोधन के बीच में बार—बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था..

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Image caption इतिहासकार इरफ़ान हबीब

कार्यक्रम में बोलते हुए वरिष्ठ इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा, ''इस वक़्त की सरकार की बागडोर आरएसएस के हाथ में है और उनके गुरू गोलवरकर ने हिटलर की तारीफ़ करते हुए कहा था कि जो जर्मनी में यहूदियों के साथ किया गया वही हमें यहां करना चाहिए.''

हाल ही में अपना साहित्य अकादमी लौटा चुके साहित्यकार अशोक बाजपेई ने कहा, ''हम सब अलग-अलग विचारधारा के लोग यहां उदार मूल्यों की रक्षा करने के लिए यहां इकट्ठा हुए हैं.''

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कार्यक्रम में बोलते हुए वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. रोमिला थापर ने पिछले दिनों मुंबई में आयोजित अपने एक कार्यक्रम के अनुभवों पर अफ़सोस जताया.

उनका कहना था, ''मुझे बार-बार पुलिस सुरक्षा लेने को कहा गया. पुलिस को इस बात को लेकर डर था कि मुझ पर स्याही या कालिख पोती जा सकती है. एक अकादमिक को पुलिस सुरक्षा में अपनी बात कहनी पड़े, लेक्चर देना पड़े. इससे ख़राब स्थिति और क्या हो सकती है?''

गुजरात दंगों को लेकर सवाल उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने भी इस मौक़े पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा, ''एक लोकतांत्रिक समाज में विरोध करने की स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण है, जब इसका हनन होता है तो इस तरह का प्रतिरोध ज़रूरी हो जाता है.''

इसके अलावा कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णा सोबती, गीता हरिहरन, एम के रैैना, कुमार प्रशांत, अपूर्वानंद और ओम थानवी के अलावा दर्जनों बुद्धिजीवियों ने अपनी बात रखते हुए देश में बढ़ती कथित असहिष्णुता पर विरोध जताया.

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इसके अलावा प्रतिरोध के इस आयोजन में युवाओं की भी काफ़ी तादात थी. कार्यक्रम में आए एक युवा छात्र बताते हैं, ''इस सरकार के आने के बाद हमने देखा है कि सांप्रदायिकता और असहिष्णुता बढ़ी है. ऐसे में हम युवाओं को इस बात का अफ़सोस है कि हमारा देश किस तरफ़ जा रहा है.''

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