संघ की चुनौती बेक़ाबू होते सहयोगी संगठन

  • 2 नवंबर 2015
उमा भारती
Image caption उग्र हिंदुत्व की समर्थक उमा भारती 2003 में मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं.

वर्ष 2003 में भाजपा नेता उमा भारती लगभग ऐसे ही हालात में मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं थी जैसे हालात में नरेंद्र मोदी पिछले साल भारत के प्रधानमंत्री पद पर पहुँचे.

उमा भारती हिंदुत्व की विचारधारा की सबसे मुखर प्रवक्ता थीं लेकिन चुनावी अभियान उन्होंने विकास के वादे पर चलाया और बड़ी चुनावी जीत हासिल की.

उनके चुनाव अभियान के दौरान कई छोटी-मोटी सांप्रदायिक घटनाएं हुईं.

उदाहरण के तौर पर विदिशा के नज़दीक गोहत्या के नाम पर दंगे की कोशिश और पश्चिमी ज़िले धार में एक विवादित धर्मस्थल के मुद्दे पर लोगों को एकजुट करना.

लेकिन ये घटनाएं नज़रअंदाज़ कर दी गईं.

उसी साल फ़रवरी में इंडियन एक्सप्रेस के लिए रिपोर्टिंग करते हुए मैंने एनडीटीवी के पत्रकार संदीप भूषण और उनके कैमरामैन रिज़वान ख़ान के साथ धार ज़िले के आदिवासी इलाक़ों का दौरा किया.

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Image caption गौरक्षक दलों का वाहनों की जाँच करना आम बात है.

मैं उस समय इंदौर के तत्कालीन मेयर और 2014 में बीजेपी के हरियाणा चुनाव अभियान का नेतृत्व करने वाले कैलाश विजयवर्गीय की शुरू की गई एक योजना को परख रहा था.

धर्म रक्षा समिति के सहयोग से चल रही इस योजना के तहत इंदौर में खुले घूमने वाली गायों को 121 रुपए की क़ीमत पर आदिवासियों और शहर के नज़दीक रहने वाले लोगों को बेचा जा रहा था.

लेकिन फिर ये ख़बरें आने लगीं कि इंदौर की सड़कों पर पॉलीथीन और कूड़ा खाने वाली इन गायों को जब इनके नए मालिकों ने नियमित भोजन देना शुरू किया तो उनकी मौतें होने लगीं.

एक पशु अधिकारी ने हमें बताया कि पेट में भरी पॉलीथीन इनके लिए घातक सिद्ध हो रही है. हमने इस पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए लोगों से बात कर नोट्स बनाए और वीडियो शूट किए.

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Image caption भारत में गायों का कूड़ा-कचरा खाना आम बात है.

हम नज़दीकी क़स्बे की ओर जा रहे थे तभी मोटरसाइकिलों पर आए युवाओं ने हमारे वाहन को रुकवा लिया. कुर्ता-पजामा और भगवा गमछाधारी ये युवा हमारे प्रति आक्रामक थे. हमारे प्रेस कार्ड का कोई असर नहीं हुआ.

जब उन्हें रिज़वान ख़ान का नाम पता चला तो वो उसे पीट-पीटकर मारने पर उतारू हो गए.

संदीप भूषण और मैंने उन्हें दूर हटाने की जद्दोजहद की. इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष अधिकारियों से हमारी पहचान पुख़्ता की.

हमें इस अवैध हिरासत से रिहा होने में एक घंटे का वक़्त लगा. हमें हुई असुविधा के लिए खेद भी प्रकट किया गया. जिन लोगों से उन्होंने बात की थी वे इंडियन एक्सप्रेस और एनडीटीवी से परिचित थे.

ख़ान की जान उस दिन बच गई. लेकिन इस साल सितंबर में उत्तर प्रदेश के दादरी के बिसाड़ा गाँव के अख़लाक़ की जान नहीं बच सकी.

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Image caption भारत में ऐसे दलों की बड़ी तादाद है जो ख़ुद को गौरक्षा के नाम पर हिंसा से पीछे नहीं हटते हैं.

अख़लाक़ के क़त्ल के दो सप्ताह बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विवादित चुप्पी तोड़ी और घटना को दुर्भाग्यपूर्ण क़रार दिया.

ये बयान ऐसा था, जिससे ऐसी घटनाओं और बयानों की आलोचना नहीं करने की अपनी अनिच्छा मोदी ने ज़ाहिर किया ही साथ में यह मोदी की बहुत मेहनत से बनाई गई विकास आधारित शासन की धारणा के विरोध में भी था.

मोदी की ज़िम्मेदारी न लेने की वजह इन घटनाओं का समर्थन नहीं बल्कि उनके अंदर का डर है.

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसी उसकी प्रभावशाली समर्थक संस्थाओं को अब उन उग्र हिंदुत्व समूहों से दरकिनार किए जाने का डर है जिन पर अब उनका नियंत्रण नहीं है.

पिछले छह महीनों में ये साफ़ हो गया है कि नरेंद्र मोदी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सांस्कृतिक एजेंडा भी अपनी सरकार के सुशासन जितना ही अहम है.

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लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से संकेत मिलता है कि आरएसएस का अब उन ताक़तों पर नियंत्रण नहीं है जिन्हें उसने खुला छोड़ रखा है. अख़लाक़ का क़त्ल इन घटनाओं में से एक है.

इस अपराध के लिए गिरफ़्तार कई लोगों के संबंध स्थानीय भाजपा नेता से हैं.

घटना के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा और मुजफ़्फ़रनगर दंगों के अभियुक्त संगीत सोम जैसे भाजपा नेताओं ने गांव का दौरा किया और भीड़ की कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की.

ये भीड़ कहीं से अचानक नहीं आई है. रिपोर्टों के मुताबिक़ समाधान सेना नाम की एक संस्था इलाक़े में कई महीनों से सक्रिय थी. सेना के नेता ने आरएसएस के साथ अपने संबंधों का दावा भी किया था.

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Image caption अख़लाक़ अहमद की गोमांस खाने की अफ़वाह पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी.

दूसरी घटना पत्रकार और पूर्व भाजपा नेता सुधींद्र कुलकर्णी पर हुआ सार्वजनिक हमला थी. पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख़ुर्शीद कसूरी की किताब का विमोचन आयोजित करने पर शिवसेना ने उनके मुंह पर कालिख पोत दी.

शिवसेना पाकिस्तान से संबंधों का हमेशा विरोध करती रही है. लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा से गठबंधन के बावजूद ये हमला होना आश्चर्यजनक है. जब मोदी ने घटना से दूरी बनाई तो शिवसेना ने उन पर भी हमला बोला.

शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि दुनिया मोदी को अहमदाबाद और गोधरा से जानती है और हम भी उनका इसी के लिए सम्मान करते हैं. उन्होंने कहा, "अगर वही मोदी पाकिस्तान कलाकार ग़ुलाम अली के मुंबई में कंसर्ट रद्द किए जाने और ख़ुर्शीद कसूरी के विरोध को दुर्भाग्यपूर्ण कह रहे हैं तो यह हम सबके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है."

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Image caption शिवसैनिकों ने सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर कालिख पोत दी थी.

शिवसेना के हमले बेहद आक्रमक रहे हैं. ऐसा लगता है कि शिवसेना ने फ़ैसला कर लिया है कि बीजेपी और आरएसएस से ज़्यादा आक्रामक होकर ही वह अपने हितों की रक्षा कर सकती है.

लेकिन तीसरी घटना को ऐसे संगठन से जोड़ा जा रहा है जिसके काम स्वीकार्य रूढ़िवादी मान्यताओं से प्रभावित लगते हैं.

तीस अगस्त की सुबह लेखक एमएम कलबुर्गी की कर्नाटक के धारवाड़ ज़िले में उनके घर में हत्या कर दी गई. जाँच में उसी सनातन संस्था का नाम आया जिसे दो साल पहले तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से जोड़ा गया था.

इन हत्याओं से ये सुनिश्चित हो गया कि सनाथन संस्था ने महाराष्ट्र और गोवा के बाहर भी पहचान बना ली है. ये संस्था 90 के दशक से ही सक्रिय रही है.

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Image caption कलबुर्गी अपने लेखों में हिंदुत्व पर सवाल उठाते रहे थे.

इस संस्था के बारे में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि ये ख़ुद को एक आध्यात्मिक संस्था बताती है जो सामाजिक उत्थान, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए काम करते हुए धर्म को फिर से प्रजवल्लित करती है और धर्म की राह में बढ़ रहे लोगों की रक्षा करती है और अधर्मियों का संहार करती है.

2003 में धार में जिस हिंसक समूह से हमारा सामना हुआ था वो किसी भी रूप में मालवा के उस इलाक़े के लिए कोई नई बात नहीं था.

आरएसएस और बीजेपी की पूर्ववर्ती जनसंघ की जड़ें इस इलाक़े में मज़बूत रही हैं.

2007 में जब मैं दिल्ली आ गया और समझौता एक्सप्रेस धमाकों की पुलिस जांच पर रिपोर्टें कर रहा था तब जाँच 'अभिनव भारत' नाम के संगठन की ओर बढ़ रही थी.

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Image caption महंत असीमानंद समझौता धमाकों के अभियुक्त हैं.

वीडी सावरकर ने इस संगठन की शुरुआत 1904 में की थी और मालवा क्षेत्र में 2006 के दौरान ये फिर से उठा.

कई रिपोर्टों में ये बताया गया कि अभिनव भारत संगठन से जुड़े लोग आरएसएस के भी क़रीबी रहे हैं.

उन्होंने संघ से संबंध तो रखे लेकिन उसके आदेशों से ख़ुद को नहीं बांधा. इसके सदस्य हिंसा को ही राजनीतिक समाधान मानते थे.

बाद में जो जानकारियां सामने आईं उनसे स्पष्ट हुआ कि इस संगठन के सदस्य मुस्लिम जेहादी चरमपंथ का जवाब हिंदू चरमपंथ से देना चाहते थे.

अभिनव भारत के कई सदस्यों का चरित्र उन युवाओं से बिलकुल भी अलग नहीं था जो आरएसएस से जुड़े थे और जिनसे मेरी मुलाक़ात मालवा इलाक़े में हुई थी.

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Image caption प्रधानमंत्री मोदी नरेंद्र मोदी का कहना है कि उन्हें आरएसएस से जुड़े होने पर गर्व है.

आरएसएस जिन कामों का खुला समर्थन करती है, अभिनव भारत के कारनामे उनसे कहीं आगे थे.

बीजेपी नेतृत्व की सरकारों से हमें पता चला है कि जब धार्मिक विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती हैं तब हिंसक चरमपंथ नियंत्रण से बाहर हो जाता है और उसे प्रोत्साहन भी मिलता है.

लेकिन ऐसे उदाहरण भाजपा शासन से पहले भी मिलते रहे हैं.

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, जो सिखों के हितों की रक्षा करने का उसी तरह दावा करती है जैसे बीजेपी हिंदुओं की भावनाओं का ख़्याल रखने का दावा करती है, को 70 के दशक में जरनैल सिंह भिंडरावाले के उदय का सामना करना पड़ा.

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Image caption भिंडरावाले पंजाब में उग्र विद्रोह का चेहरा थे.

भिंडरावाले, जिसे शुरुआत में कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था, ने 80 के दशक के शुरुआती सालों में अकालियों को दरकिनार कर उन्हीं मांगों को उठाया जिन्हें अकालियों ने आनंदपुर साहिब रेज़ोल्यूशन में उठाया था.

इनके तहत उसने सिखों के लिए अपने मामलों में अधिक स्वायत्ता मांगी.

भिंडरावाले को जल्द ही उग्र सिखों का समर्थन मिल गया. अकाली इन्हें अपना समर्थक जनसमूह मानते थे. भिंडरावाले ने समूचे पंजाब में हिंसा शुरू कर दी और अकाली, जो उसके उदय का सामना नहीं कर सके, राज्य में जारी हिंसा के समर्थक बन गए.

भिंडरावाले का मुक़ाबला करने के अकालियों के प्रयास सिख राजनीति को नाटकीय रूप से कट्टरपंथ की ओर ले गए.

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Image caption ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर पर हमला कर भिंडरावाले का अंत किया था.

भारतीय सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार, जिसमें सेना ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर पर हमला करते हुए भिंडरावाले को मार दिया था, के बाद जो चरमपंथी संगठन पनपे उनमें भिंडरावाले के समय के दौरान कट्टरपंथी विचारधारा अपनाने वाले युवाओं की भरमार थी.

भले ही अब भिंडरावाले जैसा कोई व्यक्तित्व न हो लेकिन संघ के सहयोगी समूहों में इसके लिए स्थान बढ़ रहा है. बीजेपी की ताक़त बढ़ रही है लेकिन उसके पास इस स्थान को ग्रहण करने वालों से निपटने के लिए कोई रणनीति नहीं है.

महाराष्ट्र में बीजेपी की राज्य सरकार सनाथन संस्था या शिवसेना के ख़िलाफ़ बहुत कुछ नहीं कर सकती है. विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के अधिक उग्र समूहों के संबंधों के मामले में पार्टी देश के अन्य इलाक़ों में भी ऐसी ही स्थिति में है.

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Image caption शिवसेना पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उग्र प्रदर्शन करती रही है.

बीजेपी जब से केंद्र में सत्ता में आई है उसने सांस्कृतिक री-इंजीनियरिंग के प्रयासों, जिनमें 'हिंदुत्व की ओर घर वापसी' जैसे कथित धर्मपरिवर्तन, बीफ़ खाने पर प्रतिबंध और अंतरधार्मिक विवाहों का हिंसक विरोध शामिल है, को मौन या फिर स्पष्ट समर्थन ही दिया है.

और इसी पृष्ठभूमि में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जैसे वो मुद्दे बरक़रार हैं जिनका इस्तेमाल बीजेपी अपने राजनीतिक उद्देश्य पूरा करने के लिए करती रही है.

1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद से बीजेपी और आरएसएस कट्टरवादी हिंदुत्व संगठनों से यह कहकर दूरी बनाते रहे हैं कि गठबंधन में सरकार चला रही पार्टी उन मुद्दों पर भी स्वतंत्र फ़ैसले नहीं ले सकती है जो उसके लिए अहम है.

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Image caption उग्र हिंदुत्व से जितना नुक़सान मोदी को होगा उससे कहीं ज़्यादा भारतीय लोकतंत्र को.

लेकिन 2014 की जीत के बाद ये बहाना मौजूद नहीं है. हाल ही में वीएचपी ने सरकार को याद दिलाया कि वह सिर्फ़ विकास के लिए ही नहीं बल्कि राम मंदिर बनाने के लिए भी चुनी गई है.

जैसे-जैसे मोदी सरकार अपने कार्यकाल को ख़त्म करने की ओर बढ़ेगी ये दबाव और बढ़ता जाएगा. इन ताक़तों का सामने से मुक़ाबला करने में असमर्थ मोदी को अब अपरिहार्य बन चुकी उकसावे की कार्रवाइयों से निपटने में भी सावधानी बरतनी होगी.

व्यक्तिगत तौर पर वे निर्णय लेकर अपने वादे पूरे करने वाले नेता की सावधानीपूर्वक बनाई गई छवि को खोने के ख़तरे में हैं. लेकिन जो नुक़सान गणतंत्र को होगा वो इससे कहीं ज़्यादा है.

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