शिक्षा व्यवस्था पर दिबाकर बैनर्जी की खुली चिट्ठी

  • 2 नवंबर 2015
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जिस स्कूल में मैं नर्सरी से 12वीं तक पढ़ा हूँ उसके कर्ताधर्ता वही लोग थे जिन्हें आज राइट विंग, हिंदुत्ववादी या आम भाषा में 'संघी' कहा जाएगा. स्कूल की शिक्षा व्यवस्था का सनातन हिंदू संस्कृति से रिश्ता बहुत गहरा था. हमें हिंदी और संस्कृत काफ़ी ज़ोर देकर पढ़ाई गई.

स्कूल का वार्षिकोत्सव गुरुवंदना से शुरू होकर वाद-विवाद, सितार, गिटार वादन, नुक्कड़ नाटक, संस्कृत काव्य पाठ, क़व्वाली और मुशायरा से गुज़र कर सरस्वती वंदना पर ख़त्म होता था. हमें सिखाया जाता था कि भारत दुनिया के उन महान समाजों में से है जिसमें सभी के लिए जगह है.

पाँचवी क्लास में ही मुझे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का अर्थ मालूम था. कड़क और एक किलो के थप्पड़ वाले संस्कृत सर की बदौलत छठी क्लास तक मैं गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान हिंदी में पढ़ा. हमारी सोंधी खुशबू वाली स्कूल डायरी में गायत्री मंत्र, संस्कृत काव्य और गीता के चुने हुए हिस्से थे जो मुझे आज भी कंठस्थ हैं.

इसके साथ-साथ हम इतिहास पढ़ते थे जिसे अब 'लेफ़्टिस्ट', 'एलीटिस्ट' और 'स्युडो-सेक्युलर' कहा जाने लगा है - जो भी उसका अर्थ हो. उसका कुछ-कुछ अब भी सच सा लगता है, और कुछ नहीं.

अंग्रेज़ी के वर्चस्व के इस ज़माने में आज हिंदी, संस्कृत और प्राचीन भारत पर मेरी (अधूरी) पकड़ देखकर मेरे दोस्त-यार इम्प्रेस हो जाते हैं. मैं अपने स्कूल का जितना भी शुक्रिया अदा करूँ कम होगा, जिसने तीन हजार सालों के मानव इतिहास को सहजता से समझने की योग्यता मुझे दी, साथ ही वक़्त के साथ चलना भी सिखाया. मैं जो भी हूँ, अपने उस स्कूल की वजह से हूँ. इसका गर्व है मुझे.

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मुझे आज तक कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मेरे स्कूल की शिक्षा ग़लत है. एक बार भी हमें ये नहीं पढ़ाया गया कि भारत से प्यार करने के लिए किसी से से नफ़रत करने की जरूरत है. इसका गर्व है मुझे.

मेरे जैसे अनगिनत भारतीय हैं जिन्हें अपने स्कूल या कॉलेज पर गर्व है.

भारत के अभिभावक, शिक्षक और छात्रगण, अब समय आ गया है ये निर्णय लेने का कि जिस दिन हमारे बच्चे पढ़ाई पूरी करके भविष्य के भारत में क़दम रखें तो उन्हें अपने स्कूल पर फख्र होगा तो किस बात का होगा? कितना बड़ा प्लेग्राउन्ड या वीआईपी पार्किंग है उसकी? या कितने लाख की फीस है उसकी? या किस फिल्मस्टार के बेटा क्लासमेट है उसका? या किस नेता का जिगरी चेयरमैन है उसका?

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या फिर अपने शिक्षकों का? हमारे संस्कृत सर, हमारी अंग्रेजी मैम, मेरे प्रिंसिपल सर और वो सभी शिक्षक जिनका हमने आदर किया, जिनसे डरे, जिन पर हम फ़िदा हुए, जिनके हम दीवाने रहे, जिनकी हमने पीठ पीछे नकल उतारी और जिन्होंने हमारे कान खींचे.

इन शिक्षकों ने हमें केवल विद्या नहीं दी, जुनून दिया सिर्फ पांच स्टेप्स में सेट थियरी पैराडॉक्स साबित करने का या बिना सांस लिए एक मिनट तक रावण के शिवस्तोत्र की आवृत्ति का. मैं जिस प्रोफ़ेशनल इंस्टीट्यूट में गया वहाँ पेड़ के नीचे बैठकर शिक्षकों ने हमें जुनून दिया छोटे भारतीय शहरों के लिए सस्ता और सेफ रिक्शा बनाने का या लोटे के अनूठे आकार पर फिदा होने का. हमें एक बार भी ये भनक नहीं पड़ी कि हम राइट हैं या लेफ्ट. मास हैं या एलीटिस्ट!

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कभी ऐसा नहीं लगा कि कुछ महान हो रहा है. कभी किसी शिक्षक ने हमें भारत से प्यार करने, देशभक्त बनने या देश की रक्षा करने के लिए नहीं कहा. लेकिन अब मालूम पड़ता है कि जब उन्होंने हमें ब्रह्मगुप्त के चतुर्भुज समीकरण, दिनकर की कविता, रस्किन बॉण्ड और मंटो की कहानियां, भारतीय मलमल की बारीक़ी, बंगाल के टेराकोटा टाइल की सुंदरता या लद्दाख में विश्व की सबसे ऊंची हवाई पट्टी के बारे में बताया और साहिर के फिल्मी गाने गाए, उन्होंने हमारे दिल में चुपके से, हमें बताए बिना देशप्रेम की वह अगन जला दी जो आज भी सुलग रही है.

उस अगन का सबूत नम्बर एक? करोड़ों भारतीय, जो आज भी भारत में हर नाइंसाफ़ी, मजबूरी, तकलीफ से जूझते हुए यहीं जी रहे हैं और जम के जी रहे हैं. सबूत नम्बर दो? वह लाखों भारतीय जो भारत के बाहर भारत के लिए तरसते हुए अपने केबल वाले से देसी चैनल के लिए रोज़ झगड़ते हैं!

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भारत की शिक्षा अपने आप में एक सीख है. हजारों वर्षों से भारत में अध्ययन-अध्यापन की बेजोड़ परंपरा रही है. इस परंपरा का केंद्र गुरु और शिष्य हैं. ये यूँ ही नहीं है कि द्रोण, कृप, कपिल, बुद्ध, महावीर, शंकर और नानक आज भी पौराणिक कथाओं और धर्मग्रंथों में हमारे बीच जीते हैं. ये आखिरकार कुछ भी हों, सबसे पहले ये शिक्षक ही थे जिन्होंने शिष्यों के एक विशाल समूह को प्रेरित किया.

हमारे बचपन के शिक्षक हमें दूसरे भारतीयों के साथ भारत में रहना सिखाते थे. वह दूसरे भारतीय भी ऐसे स्कूल-कॉलेजों से पढ़कर आए थे, जहाँ सहजता से निभाई जाने वाली भारतीयता सिखाई गई थी. हम रूड़की से पढ़कर पास होते और चेन्नई में काम करने जाते थे. पंजाबियों से भरी दिल्ली में रह रहे बंगाली लड़के का बेस्टफ्रेंड एक गुजराती लड़का बन जाता था.

किसी ऐसे राज्य में जहां कभी नहीं गए वहां के इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती होने से पहले हम एकबार भी नहीं सोचते थे. कोइ ऐसा हॉस्टल जहां एक समुदाय गिनती में भारी हो हमे कभी इतना त्रास न देता था जितना अब देता है. क्या बदल गया फिर?

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आज बहुत सारे कारनामे हो रहे हैं जिनको सही ठहराने के लिए हमारी प्राचीन परंपरा का उल्लेख किया जाता है. अगर हम केवल शिक्षा परंपरा का उल्लेख करें तो तर्क, युक्ति, सवाल जवाब, डिबेट- इनके बिना वह परंपरा गूंगी गुड़िया रह जाती है जिसके साथ केवल खेल खेला जाता हो. भारत का सबसे पुराना सिलेबस है - वाद-विवाद. भारत की सबसे पुरानी 'कोर्सबुक' वेद की रोंगटे खड़े कर देने वाली कई ऋचाएँ, बस सवाल हैं और कुछ नहीं! उपनिषद्, दर्शन, मीमांसा- कहीं भी देखें - वे गुरु और शिष्य के बीच प्रश्नोत्तर के रूप में किए गए संवाद हैं.

सही शिक्षक हमें सही राह दिखाता है. सही रास्ता वही दिखा सकता है जिसे खुद सही रास्ता दिखता हो. विश्व का सबसे प्रतिभाशाली चित्रकार व्याकरण सिखाने में फेल होगा! और देशप्रेम का पाठ फिल्ममेकिंग या गणित पढ़ाते हुए बखूबी पढ़ाया जा सकता है, बशर्ते उस गुरु को फिल्ममेकिंग या गणित से प्रेम हो!

इसके लिए देशभक्ति के अलग सिलेबस की जरूरत नहीं है क्योंकि ये सिलेबस अक्सर वही लोग बनाते हैं जिन्हे अपना उल्लू सीधा करने कि लिए आपके मासूम बच्चे की दरकार है बतौर रिक्रूट.

भारत के अभिभावकों और छात्रों, हमें दिखाने की जरूरत है कि हम अपने देश से उन लोगों के मुक़ाबले ज्यादा प्यार करते हैं जो देशप्रेम की लवस्टोरी में अकेले हीरो बन रहे हैं.

जिस भारत से हम प्यार करते हैं वह मस्त, मुस्कुराता, रंग-बिरंगा, अच्छे खाने की खुशबू से महकता, अच्छे संगीत में झूमता, शरारती लेकिन होशियार बच्चों से भरे क्लासरूम वाला भारत है. उस क्लासरूम में जहां हमारी सिखणी मां और हमारे खोजा पापा पहली बार मिले थे! वो हॉस्टल जहां नवरात्र के डांडिया रास के बाद हम सारी रात जागकर पढते थे! क्या करते - सिलेबस ही इतना प्यारा था!

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Image caption दिबाकर की फ़िल्म खोसला का घोंसला फ़िल्म में अनुपम खेर भी अभिनय कर चुके हैं.

जिस भारत से हम प्यार करते हैं वह ऐसे शिक्षकों का देश है जो तार-तार माहवार पर मीलों चलकर बच्चों को वर्णमाला सिखाते हैं, या नौजवानों को खराद मशीन चलाना या होनहार बच्चियों को पहाड़ लांघना.

जिस भारत से हम प्यार करते हैं वह ऐसे शिक्षकों, शिक्षाविदों, लेखकों, कवियों और गायकों का है जिन्होंने अपनी किताबों, गीतों, कहानियों और कविताओं के जरिए भारतीय छात्रों को दुनिया के हर कोने में पहचान दिलाई है. ये पहचान हम खो बैठे तो हमें कोई नहीं पूछेगा!

जिस भारत से हम प्यार करते हैं वह ऐसे बहुत से संस्थानों से भरा है जो छात्रों को देशप्रेम का दावा करना सिखाए बिना, बैंकिग, जेनेटिक रिसर्च, फैशन डिजाइन, सांख्यिकी में अव्वल बनाते हैं और वह छात्र देश का नाम रौशन करते हैं.

जिस भारत से हम प्यार करते हैं, उसके अभिभावकों और छात्रों को अधिकार है कि वे खुद निर्णय लें वे क्या सिलेबस पढ़ना चाहते हैं और कैसे. अगर कोई ऐसा कॉलेज या स्कूल हो जहां वे जा सकें, इसका मतलब है कि हमारी सारी गलतियों, तनावों, गरीबी और असमानता के बावजूद हम सही रास्ते पर हैं.

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आज डर ये है कि हम ये अधिकार खो देंगे. भारत के अभिभावकों और छात्रों, मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी चुप्पी तोड़ें और बोलना शुरू करें क्योंकि जब अरसे से चुप बैठा कोई बोलता है तो दुनिया सुनती है.

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