'विकास शब्द सुनकर लोग यहाँ ठहाके लगाते हैं'

  • 3 नवंबर 2015
कबीरा धाप गांव, सहरसा

बिहार के सहरसा ज़िले के डेंगराही घाट पर आज भी आम दिनों की तरह ही सिर्फ़ एक नाव ही है जो यहाँ से लोगों को उस पार कबीरा धाप गाँव लेकर जाएगी.

ज़िला मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस घाट पर पहुँचने के लिए भी दो किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ता है और वो भी कोसी नदी की गोद में.

नाव के लिए काफ़ी लंबा इंतज़ार है क्योंकि एक-एक कर लोग आते हैं और जब नाव पूरी तरह भर जाती है, तब कहीं जाकर सफ़र शुरू होता है.

इस नाव पर सब कुछ है. बकरियां, मोटरसाइकिल, साइकिल और ज़रूरत के दूसरे सामान.

नाव यहाँ के लोगों की जीवन रेखा है. मगर यह हर वक़्त उपलब्ध नहीं होती. ख़ास कर शाम के पांच बजे के बाद तो बिल्कुल ही नहीं.

जिस नाव पर मैं सवार हूं उसके मांझी रोशन कुमार कहते हैं, "पांच बजे के बाद नाव तभी चलती है जब बहुत ही आपातकाल की स्थिति हो जाए. मसलन अगर किसी की तबीयत बहुत ख़राब हो जाए. नहीं तो फिर सुबह तक का इंतज़ार के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है."

कबीरा धाप के कटेश्वर महतो बताते हैं कि आज़ादी के बाद से होते आ रहे चुनावों में यहाँ के लोग वोट तो डालते आ रहे हैं मगर इस प्रक्रिया से इन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ है क्योंकि उन्हें आजतक बुनियादी चीज़ें भी मयस्सर नहीं हो पाई हैं.

वो कहते हैं, "आज़ादी के इतने साल हो गए हैं. आजतक ना तो नदी पर पुल बना है और ना ही बिजली ही आई. लोग मंगल ग्रह पर जाने की बात कर रहे हैं और हम आदिम युग में जी रहे हैं."

इस बार विधान सभा के चुनाव की हलचल से यह इलाक़ा पूरी तरह से अछूता है. ना पोस्टर, ना झंडे, ना प्रत्याशी और ना ही कोई शोर शराबा.

गाँव में मेरी मुलाक़ात बीबीसी हिंदी रडियो के एक बहुत पुराने श्रोता केपी शर्मा से हुई जो अपने रेडियो की ट्यूनिंग करने की कोशिश कर रहे थे.

केपी शर्मा ने बताया कि कबीर धाप में बाक़ी की दुनिया से जुड़ने के लिए रेडियो ही एक सहारा है क्योंकि उनके यहाँ आजतक बिजली नहीं पहुँची है.

कबीरा धाप पहुँचने के बाद ही इंडिया और भारत का फ़र्क़ पता चल पाता है.

केपी शर्मा का कहना है, "विकास शब्द सुनकर ही लोग यहाँ पर ठहाका लगाने लगते हैं. हमें इस शब्द से कोई वास्ता रहा ही नहीं है."

हालांकि इस बार कबीर धाप के लोगों ने चुनाव के बहिष्कार का मन बना लिया है. पूरे गाँव में बस एक ही बैनर मौजूद है और वो है चुनाव के बहिष्कार का.

गाँव के लोगों का कहना है कि इस बार अभी तक उनसे वोट मांगने ना तो कोई नेता आया और ना ही किसी दल का कोई प्रतिनिधि.

गाँव के लोगों से बात करते करते सूरज ढलने लगा यानी मेरी वापसी का वक़्त. वो भी इसलिए क्योंकि अगर मुझे देर हो गई तो फिर नदी पार करने के लिए नाव नहीं मिलेगी और मुझे सुबह तक इंतज़ार करना पड़ेगा.

चलते चलते इतना तो मेरी समझ में आ गया कि सत्ता के गलियारों में अपने कंधे रगड़ने वाले लोगों ने कबीर धाप का हमेशा बहिष्कार किया है.

मगर इस बार गाँव के लोग एक होकर नेताओं का बहिष्कार कर रहे हैं. पता नहीं इनका यह रूख़ नेताओं और अधिकारियों का ध्यान अपनी तरफ़ खींच भी पाएगा या नहीं.

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