इतिहासकार शेखर पाठक ने लौटाया 'पद्म श्री'

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वैज्ञानिक विचारों और विवेकपूर्ण सोच के ख़िलाफ़ बढ़ती कथित असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कार लौटाने के सिलसिले में सोमवार को एक और नाम जुड़ गया है.

हिमालयी इतिहास और पर्यावरण के विशेषज्ञ माने जाने वाले इतिहासकार डा. शेखर पाठक ने अपना पद्मश्री सम्मान लौटाने की घोषणा की है.

उन्होंने ये घोषणा नैनीताल में, एमएम कुलबुर्गी और वीरेन डंगवाल की याद में चल रहे तीन दिवसीय फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह के दौरान की.

सुनिए: शेखर पाठक से की गई बातचीत

बढ़ती असहिष्णुता और हिमालय की उपेक्षा

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पुरस्कार लौटाने की घोषणा के बाद, डा. शेखर पाठक ने बीबीसी से बात करते हुए कहा है कि वे दाभोलकर, पनसारे या कलबुर्गी हत्याकांड, और आईसीएचआर और नेहरू मेमोरियल सरीखी महत्वपूर्ण संस्थाओं में ग़ैरवाज़िब घुसपैठ जैसी घटनाओं के विरोध में अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं.

उन्होंने कहा ''ये बेचैन करने वाली घटनाएं हैं. और इसके विरोध में जब कुछ साहित्यकारों ने पुरस्कार लौटाने शुरू किए तो सत्ता की ओर से उनकी मज़ाक उड़ानी शुरू कर दी गई है. मेरे पुरस्कार लौटाने की तात्कालिक वजह यही है.''

डा. पाठक ने अपने पुरस्कार लौटाने की एक बड़ी वजह सरकारों की ओर से हिमालय और यहां के समाज की उपेक्षा को भी बताया है, उन्होंने कहा,''ये सरकारें हिमालय और गंगा को चुनावों में तो भुनाती रही हैं लेकिन असल में उनके प्रति बहुत ही निष्ठुर हैं.''

डा. शेखर पाठक को 2007 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.

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