'कांग्रेस जो रात में करती है, भाजपा दिन में'

  • 6 नवंबर 2015
अरुंधति रॉय

बुकर पुरस्कार विजेता और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने कहा है कि पुरस्कार वापसी को लेकर अगर उन पर कॉपीकैट - नक़ल करने, का आरोप लगता है तो वो कॉपीकैट बनकर खुश हैं.

उन्होंने कहा कि संघ या बीजेपी की विचारधारा के विरोध करने का दूसरों के साथ उन्हें मौक़ा मिला और इसी कारण उन्होंने पुरस्कार लौटाया.

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बीबीसी हिंदी से बातचीत में अरुंधति ने कहा कि जब 2005 में कांग्रेस ने उन्हें पुरस्कार दिया था तो उन्होंने कहा था कि वो तो उनके ख़िलाफ़ लिखती हैं तो क्या चुप कराने के लिए पुरस्कार दिया जा रहा है और पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था.

रॉय ने कहा कि कांग्रेस दरअसल भाजपा के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि कांग्रेस जो रात में करती है, भाजपा दिन में करती है.

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आपको जो पुरस्कार मिला था उसे आपने वापस कर लिया है, आपको अवार्ड वापस करने में इतना वक्त क्यों लगा?

मैंने अपना अवार्ड इसलिए वापस किया क्योंकि ये देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा कि बहुत सालों के बाद ये दिखाई दे रहा है कि लेखक, फ़िल्मकार जो ज़्यादातर राजनीति से दूर रहते हैं, वो सामने आ रहे हैं.

एक वजह ये भी थी कि 2005 मे जब कांग्रेस का राज था, तब मैंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था, तो लोग उस वाकये का हवाला देकर इन लेखकों को निशाना बना रहे थे कि अरुंधति ने तो अवार्ड लिया ही नहीं था. आप लोगों ने तब लिया और अब वापस कर रहे हैं. मैं उन लोगों के साथ खड़ी होना चाहती थी. मैं बहुत खुश हूं कि पहले इतने सारे लोगों ने अपने पुरस्कार लौटाए और अब जाकर मैंने किया. वरना पहले बहुत बार ऐसा मैं पहले करती रही हूँ.

एक जनतांत्रिक देश में जिस व्यक्ति को 336 सीटें जनता ने दी हैं, उसके ख़िलाफ़ यदि 50 लेखक या कुछ कलाकार अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं तो इस संतुलन को देखते हुए आप लोग अल्पमत में नहीं हैं?

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लेखकों का काम बहुमत में रहना नहीं है. मैं अगर अकेली भी हूँ तब भी मैं जो सोचती हूं वो लिखूँगी, भले ही सब लोग मेरे ख़िलाफ़ हों. हम नेता नहीं हैं. मैं ये नहीं कह रही हूँ कि आप मुझे वोट दो, मेरे लिए तालियाँ बजाओ.

जब उदय प्रकाश ने लगभग दो महीने अपना पुरस्कार लौटाया, तब लेखकों की अंतर्रात्मा क्यों नहीं नहीं जगी. जो पुरस्कार लौटा रहे हैं इनमें से ज़्यादातर पहले से ही आरएसएस और मोदी की राजनीति के ख़िलाफ़ रहे हैं. उनका रुख़ तो पहले से ही साफ़ था, इसमें नया क्या है?

मैं कॉपीकैट बनकर खुश हूँ. शायद इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. बीजेपी या आरएसएस के ख़िलाफ़ होना कोई ख़राब बात नहीं है. मैं नहीं मानती कि कांग्रेस वास्तव में बीजेपी के ख़िलाफ़ है. कांग्रेस जो रात में करती है, बीजेपी दिन में करती है.

मान लो कोई संघ की विचारधारा के ख़िलाफ़ है और मुझे दूसरों के साथ एक मौक़ा मिला है, विरोध दिखाने का तो मैं तो दिखाऊँगी.

मोदी या संघ के पक्षधरों का तर्क है कि ये पहली बार नहीं हो रहा है. दलितों को जलाया जाता है, 84 के दंगे हुए तब आप लोग कहाँ थे?

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जो पहले से राजनीतिक परिदृश्य में नहीं थे, वे अपना जवाब खुद देंगे. लेकिन जहाँ तक मेरा सवाल है, तो मैं कह सकती हूँ कि जब से मैंने लिखना शुरू किया है तब से कांग्रेस के ख़िलाफ़ बहुत लिख चुकी हूँ. मुझे आप कांग्रेस-भाजपा बहस में नहीं घसीट सकते.

जब 2005 में कांग्रेस ने मुझे पुरस्कार दिया तो मैंने कहा कि मैं आप लोगों के ख़िलाफ़ लिखती हूँ तो क्या मुझे चुप कराने के लिए पुरस्कार दे रहे हैं, मैंने पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था.

15 अगस्त को मोदी ने लाल किले से कहा कि सांप्रदायिकता को 10 साल के लिए ताले में बंद कर दीजिए. कम से कम अपनी बात तो उन्होंने कही, फिर जिम्मेदारी उन पर क्यों आती है?

जब आप प्रधानमंत्री हैं तो जि़म्मेदारी तो आप पर आएगी. अभी दो ताक़तें काम कर रही हैं. विदेश से जो निवेश लाना चाहते हैं, वो कहते हैं कि माहौल सुधार लीजिए. लेकिन जो आपको वोट देते हैं वो कुछ अलग सोच रहे हैं. ऐसे में जो आप कहते हैं और जो करते हैं, दोनों अलग-अलग हो जाते हैं. दादरी की घटना हुई तो प्रधानमंत्री चुप रहे थे.

तो क्या आप ये कह रही हैं कि अगर आरएसएस हिंदू राष्ट्र का एजेंडा लागू कर रहा है, प्रधानमंत्री उसके साथ हैं या उनके बीच कुछ तनाव या खिंचाव है?

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मेरे ख़्याल से इसमें और तनाव आने वाला है. हालाँकि मैं इस मामले में एक्सपर्ट तो नहीं हूँ. लेकिन इतना तो तय है कि जिन्होंने उनको वोट दिया है और जो उद्योगपति उन्हें इस पद पर लाए हैं, उन दोनों में बहुत तनाव है.

ऐसा क्यों है कि जब दलितों पर अत्याचार होता है तो सिर्फ़ दलित संगठन बयान देते हैं. जब मुसलमानों पर अत्याचार होता है तो तथाकथित सेक्युलर ब्रिगेड उठ खड़ी होती है. क्या आपको नहीं लगता है कि दलितों पर किया जाने वाला अत्याचार, कुछ कम अत्याचार, और मुसलमानों पर अत्याचार अधिक माना जाता है?

बिल्कुल सही बात है. मैं ये मानती हूँ. मैंने इस पर काफ़ी कुछ लिखा भी है. जब कोई ऊंची जाति का हिंदू मारा जाता है, कोई दलित मारा जाता है और मुसलमान मारा जाता है तो अलग-अलग बातें होती हैं. हाल में ही दलितों के ख़िलाफ़ बहुत कुछ हुआ है, लेकिन इतना हल्ला नहीं मचा.

तब आपने पुरस्कार लौटाने का फैसला क्यों नहीं किया?

नहीं...नहीं. पुरस्कार लौटाने से क्या होता है. मैंने दलितों के बारे में भी लिखा है. और मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर भी.

कुछ दलित विद्वानों का मानना है कि 1947 में अगर हर मुसलमान पाकिस्तान चला जाता तो दलित ही निशाना बनाते. इस मान्यता में क्या कोई सच्चाई है?

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दलित तो अब भी निशाना बन रहे हैं. दलितों की समस्या को सिर्फ़ आरक्षण तक सीमित कर दिया गया है. दलितों का मामला सिर्फ़ नरसंहार तक नहीं है. जाति के बारे में सारी बहस सिर्फ चुनावों के समय होती है. कोई भी इस बारे में गंभीर बहस नहीं करता.

बिहार चुनाव जब तक है तब सभी जाति के विद्वान बन जाते हैं, जैसे ही चुनाव ख़त्म हो जाएगा, जाति पर कोई बात नहीं करेगा. दलित के बारे में बात नहीं करेंगे.

ये कोई नहीं पूछेगा कि उद्योगपति, सुप्रीम कोर्ट के जज, प्रोफेसर, एडिटर किस जाति के हैं? अख़बार किस जाति के हाथ में हैं, पूँजी किसके पास है? जाति और पूँजी एक साथ मिलकर क्या बना है?

जो रुख़ कलाकारों ने लिया है, ये क्या एक मज]बूत बहुमत वाली सरकार को हिला पाएगी या ये बहस सिर्फ़ मज़ाक़ बनकर रह जाएगी?

जब किसी को चोट लगती है तभी तो गालियां निकलती हैं, तभी मज़ाक उड़ाया जाता है. ये बहुत बड़ी बात हुई है. सबको मालूम है. इससे आगे क्या होगा पता नहीं. अवार्ड लेना-देना बहुत बड़ी बात नहीं है मेरे लिए.

अवार्ड वापस करने से माहौल तो कम से कम सियासी बना है? आप क्या मानती हैं?

मुझे लगता है, आगे से कलाकारों, लेखकों को सोच-समझकर लिखना पड़ेगा, स्टैंड लेना पड़ेगा. अवार्ड लेना या मना करना बहुत बड़ी बात हो जाएगी.

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