'संघ के संग' होने से बीजेपी में रंग आएगा?

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माना जाता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी हाल के दिनों में हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ताक़त. एक बड़े संगठन के तौर पर इसकी पैठ से शायद ही किसी को इनकार होगा.

लेकिन उत्तर प्रदेश से अलग बिहार में आरएसएस कितना कमाल दिखा पाएगी, इस पर अभी से अटकलबाज़ियों का दौर जारी है.

बीबीसी को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़, आरएसएस स्वयंसेवकों ने बिहार में घर-घर जाकर अभियान चलाया ये बताकर कि बीजेपी के बिना बिहार और हिंदुत्व का क्या होगा.

आख़िरी दौर के मतदान से पहले संघ के अभियान में फिर से तेज़ी आई. बीच में, मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान के बाद संघ बैकफुट पर था.

भागवत के बयान ने संघ को स्पष्टीकरण देने पर मजबूर कर दिया. भाजपा और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भागवत के बयान से हुए नुक़सान को संभालने की कोशिश की.

पटना में संघ के कार्यालय में मैं बिहार और झारखंड के क्षेत्रीय कार्यवाह, डॉक्टर मोहन सिंह से मिला.

मोहन सिंह कहते हैं, "सरसंघचालक जी ने जो बात कही है, वो देश के सर्वाधिक बुद्धिजीवियों को समझ में आने वाली बात है. उन्होंने अलग से कोई बात नहीं की है. बाबा साहब आंबेडकर ने भी समय-समय पर आरक्षण की व्यवस्था की समीक्षा की बात कही थी. लेकिन दूसरे लोगों ने गुमराह करने की नज़र से तोड़ने का प्रयास किया."

लेकिन संघ थोड़े ही समय बैकफ़ुट पर रहा, लेकिन बाद में कैडर को फिर से ज़ोर-शोर से काम में लगाया गया.

पीटीआई के संजय कुमार सिन्हा कहते हैं कि भागवत के बयान से भाजपा को "... नुक़सान ज़रूर हुआ. लालू यादव को बहुत बड़ा मुद्दा मिल गया. उन्हें पिछड़ों को गोलबंद करने का मौक़ा मिल गया. वे अपने हर चुनावी सभा में दो तिहाई बात आरक्षण पर करते थे."

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बिहार को लेकर संघ और अमित शाह के बीच दरार की ख़बरें भी आती रहीं.

लेकिन नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि हर शाम संघ के अधिकारियों के साथ उनकी बैठक होती है और रणनीति की समीक्षा की जाती है.

अमित शाह के मुद्दे पर मोहन सिंह कहते हैं, "भाजपा में संघ के कई लोग हैं अमित शाह भी उनमें से एक हैं. वे एक बड़े राष्ट्रीय दल के अध्यक्ष हैं. किसी को ड्यूटी थोड़े ही देना है. ये उनका नैतिक दायित्व है. उत्तर प्रदेश हो या बिहार, चुनाव में वे अपनी भूमिका निभाते हैं."

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बिहार के मामले में हालांकि संघ कभी तेज़ तो कभी सुस्त हुआ.

संघ कार्यकर्ताओं को जाति में बंटे बिहार में राष्ट्रवाद के नाम पर वोटरों को एकजुट करने में मुश्किलें आ रही हैं. उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में हिंदुत्व जगाने की कोशिशें उतनी सफल नहीं हो पाई है.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "बिहार के कुछ हिस्सों में भी सामाजिक तनाव हुए, सांप्रदायिक तनाव हुए. लेकिन यूपी की तरह नहीं हो पाया. सीमांचल में ज़रूर संघ ज़ोर-शोर से लगा हुआ है और आतंकवाद और घुसपैठ का मामला उठा रहा है."

बिहार में बनते-बिगड़ते समीकरण के बावजूद संघ के पास भाजपा को सपोर्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह कहते हैं, "मैं तो ख़ुद संघ का स्वयंसेवक हूँ, इसलिए उनके साथ मिलकर काम करने के सवाल का मैं क्या जवाब दे सकता हूँ. संघ से निकला हुआ व्यक्ति कहीं भी हो, वो हमेशा से राष्ट्रवादी ताक़तों को बनाने का काम करता है."

संजय कुमार सिन्हा के अनुसार, "आरएसएस बाहर से दिख तो नहीं आ रहा है. लेकिन भाजपा जीत का दावा कर रही है. उससे यही लगता है कि संघ पूरा सक्रिय है. उसके कैडर ने गाँव-गाँव में लोगों तक पहुँचने की कोशिश की और इसी कारण भाजपा बिहार में जीत का दम भी भर रही है."

कुछ लोग आतंकवाद, पाकिस्तान, घुसपैठ, सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण, जैसे हाल में उठे मुद्दों को भी आरएसएस से जोड़कर देख रहे हैं.

हालांकि जदयू के श्याम रजक को लगता है कि बिहार में संघ की नहीं चलेगी.

वे कहते हैं, "संघ का कैडर दिल्ली में कहाँ गया था? उनका कैडर बिहार में कहाँ काम कर रहा है? वो सब भोंपू पार्टी है. वो नीतियों से लैस नहीं है. वो मुद्दे से लैस नहीं हैं. वे लोगों के ज़हन में धार्मिकता लाते हैं. लेकिन धार्मिक लड़ाई लंबी नहीं चलती."

बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक़, हर बूथ पर संघ के 10 कार्यकर्ताओं और भाजपा के 10 कार्यकर्ताओं को ये ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे मिलकर लोगों को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए उत्साहित करने का काम करें.

मतदान से पहले संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठकें हुईं और ज़िला, विधानसभा, पंचायत और बूथ स्तर पर संघ कार्यकर्ताओं की नियुक्ति का फ़ैसला लिया गया.

इंतज़ार रविवार तक का, जब मालूम हो जाएगा कि बीजेपी और संघ की रणनीति बिहार में रंग दिखाती है, या यूपी से इतर बिहार में रंग फीका रहेगा!

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