बिहारः एक्ज़िट पोल कितने सही हैं?

  • 6 नवंबर 2015
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आमतौर पर एक्जिट पोल ये तो बता देते हैं कि किस पार्टी को कितने वोट मिल रहे हैं, लेकिन सीटों को लेकर उनका अनुमान अक्सर गलत साबित होता है.

ऐसा इसलिए क्योंकि किस दल को कितनी सीट मिलेगी, इसका अंदाजा लगाना भले नामुमकिन न हो, लेकिन मुश्किल जरूर होता है.

तो सीटों के लेकर किसी तरह का अनुमान लगाने से पहले थोड़ा सतर्क रहने की जरूरत है.

संदेह का सबसे बड़ा कारण ये है कि अलग अलग एक्जिट पोल के नतीजे काफी भिन्न हैं. अगर इनका आधार एक ही डेटा या जानकारियां होती हैं तो सांख्यिकी तौर पर इन्हें एक ही आंकड़े पर पहुंचना चाहिए.

जबकि देखा जाए तो कल एक एक्जिट पोल ने एनडीए को 98 सीटें दी तो दूसरे ने 155. इससे साफ है कि कुछ गड़बड़ तो जरूर है.

गुरुवार को एक के बाद एक सामने आए एक्जिट पोल चौंकाने वाले थे. ऐसा इसलिए क्योंकि बिहार में 57 सीटों पर हुए मतदान को खत्म हुए अभी मुश्किल से एक घंटा भी नहीं बीता था.

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अंतिम चरण में विधान सभा की करीब 25 फीसदी सीटों पर मतदान हुआ. मतदान सर्वेक्षक ये तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने अंतिम आंकड़ों तक पहुंचने से पहले क्षेत्रीय विविधता और पिछले मतदान को ध्यान में रखा.

लेकिन सच्चाई ये है कि इस तरह की जोड़तोड़ हमेशा गलत साबित हो सकती है. सांख्यिकीविद भी गलती करते हैं या कर सकते हैं.

इस मामले में मतदान सर्वेक्षकों के दो समूहों में से एक जिसकी चर्चा हम यहां कर रहे हैं, वो या तो बेईमान है या कोई गड़बड़ी कर रहा है.

इसके अलावा टीवी चैनलों सहित एजेंसियों की राजनीतिक प्रतिबद्धता भी एक्जिट पोल के दावों पर सवाल खड़े करती है.

टुडेज चाणक्या का दावा है कि एनडीए को 155 सीट मिलेगी, जो कि आधे के आंकड़े 122 से अधिक है. चाणक्या एक ऐसी एजेंसी है जो चुनावों में भाजपा को लगातार अधिक सीटें देती रही है.

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कहा जा रहा है कि इसे उस टीवी चैनल पर पेश किया जा रहा है जिसकी मालकिन भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद की बहन हैं. इस मायने में ये एक गंभीर तथ्य है.

मुझे ये भी लगता है कि मतदान सर्वेक्षक वकील की तरह दोनों पक्षों की ओर से बहस करने में निपुण होते हैं. अपनी भविष्यवाणी और चुनाव नतीजों में थोड़ा भी अंतर आ जाए तो उनका हमेशा स्पष्टीकरण तैयार रहता है.

बेहद रूढ़िवादी और पारंपरिक पत्रकार भी एक आंकड़े तक पहुंचने का खतरा मोल नहीं लेते. ये किसी पत्रकार का काम नहीं है कि वो चुनाव नतीजों के रुझान बताएं.

ऐसा करने के लिए न तो पत्रकारों के पास कोई खास संसाधन, साधन होता है और न ही कौशल.

बिहार में 243 विधान सभा चुनाव क्षेत्र में मताधिकार का प्रयोग करने वाले 3 से 4 करोड़ मतदाताओं से इलाके में जाकर मिलना और उनका मन पढ़ना मुश्किल, बल्कि लगभग नामुमकिन है.

लेकिन चूंकि इस बार बिहार चुनाव काफी सीधा सपाट रहा इसलिए इसके बारे में भविष्यवाणी करना भी आसान रहा.

इसके कुछ कारक इस तरह हैः

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    नीतीश कुमार की बिहार में अच्छी साख है. महाराष्ट्र, हरियाणा या झारखंड के विपरीत यहां इस बार सत्ता विरोधी लहर नहीं थी.
  • चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में नीतीश कुमार को अच्छा उम्मीदवार बताया गया. प्रत्येक व्यक्ति इस बात पर सहमत था कि मुख्यमंत्री के रूप में वे सबसे बेहतर विकल्प हैं. एनडीए ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार को पेश नहीं कर गलती की. महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में उनकी जीत हुई क्योंकि वहां का विपक्ष भी किसी को पेश करने में विफल रहा था.
  • विधान सभा चुनाव 2010 या आम चुनाव 2014 के विपरीत बिहार में विपक्ष ने मजबूत एकजुटता के संकेत दिए.
  • शुरुआती उम्मीदों के विपरीत सपा, बसपा, एनसीपी, एआईएमआईएम के उम्मीदवार और पप्पू यादव ज्यादा प्रभाव नहीं बना पाए.
  • बिहार चुनाव केवल दो घोड़ों की रेस में बदल गया. दोनों गठबंधन कागजी तौर पर एक जैसे मजबूत, लेकिन जमीनी स्तर अलग दिखे.
  • भाजपा के पक्ष में अगड़ी जातियों की एकजुटता उन्हीं के खिलाफ जाती मालूम हुई. प्रतिक्रियास्वरुप पिछड़ी जातियां एकजुट हुईं.
  • भाजपा ने कई गलतियां की. जैसे भाजपा ने अगड़ी जातियों को न्यूनाधिक संख्या में सीटें दी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जातिगत आरक्षण पर समीक्षा की जरूरत बताई, दो बिहारी नेताओं के लिए बुरे शब्दों का प्रयोग आदि. इन सबने अप्रत्याशित रूप से उल्टा असर पैदा किया.
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  • यहां तक कि एक साधारण मतदाता भी ये समझ रहा था कि गांव तक बिजली पहुंची है, भले ही सारे गांवों तक नहीं पहुंची हो, कि लोग पहले से अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और साइकल पर स्कूल ड्रेस पर जाती लड़कियों को देखकर आम नागरिक ने गर्व महसूस किया. इसलिए भाजपा का 'विकास' के वादे का असर उन पर खास नहीं हुआ.
  • अगड़ी जातियों के मतदाताओं ने हालात को और भी खराब कर दिया. अखबार और टीवी रिपोर्ट में अगड़ी जाति के लोग (महिलाएं अपवादस्वरुप) खुलेआम ये कहते पाए गए कि वे नीतिश-लालू की जोड़ी के खिलाफ वोट देने को दृढ़संकल्प हैं. उनका घोषित तौर पर ये कहना था कि वे नरेंद्र मोदी से प्रभावित हैं लेकिन अघोषित तौर पर उनके कहने का ये मतलब था कि इस बार 'नीच जाति' (नीची जाति) को सबक सिखाना है.
  • बिहार के पिछड़ेपन, राज्य से पलायन, अक्षमता, भ्रष्टाचार आदि का एक सुर में राग अलापने की प्रधानमंत्री की नीति ने भी इस अलगाव की भावना को मजबूत किया. तो दूसरी ओर उनकी ओर से बिहार के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान इस अंदाज में मानों वे निजी स्तर पर बिहार का भला कर रहे हैं. लालू यादव ने जो मोदी की नकल की औक नीतीश कुमार की आत्म गौरव पर सम्मानजनक प्रतिक्रिया ने लोगों के दिल अच्छ असर किया.
  • और अंत में, प्रधानमंत्री के अधूरे वादे, बढ़ती मुद्रास्फीति, केंद्र सरकार का कमतर प्रदर्शन और भाजपा के जाति और संप्रदाय के कार्ड से लोग बेअसर दिखे.
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लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच की केमिस्ट्री और गणित दोनों ने उस भाजपा की तुलना में बेहतर असर पैदा किया जो जंगलराज की बात तो करती है लेकिन 'अपराधियों और डॉन को टिकट भी देती है. जिस तरह से पार्टी और पीएम आम लोगों के उपहास का पात्र बने हैं उससे तो लग रहा है कि भाजपा विरोधी भावना गंभीर तरीके से बढ़ रही है.

मगर जैसा कि चुनाव विश्लेषकों ने चेतावनी दी है, हम सब गलत साबित हो सकते हैं. तो क्या रविवार को मतदान सर्वेक्षक सही साबित होंगे?

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