बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग में कहां रही ख़ामी?

बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत सामाजिक गठबंधन और उसके जोड़ की जीत है. यह बीजेपी और उसके प्रचार करने के तरीके की हार है.

जीवन में कई चीजें गणित के आधार पर नहीं चलती हैं. आप प्रबंधन और गणित का फ़ॉर्मूला लगाकर न तो कविता लिख सकते हैं और न ही चुनाव जीत सकते हैं. यह काम रचनात्मकता से होते हैं.

बीजेपी के अपने प्रबंधन में नरेन्द्र मोदी की रैलियां थीं, अमित शाह ने पटना में डेरा डाल दिया, लगभग हर ज़िले में एक केंद्रीय मंत्री को बैठा दिया. लेकिन इससे कार्यकर्ताओं का योगदान कम हो गया.

राजनीति एक सामाजिक विषय है, इसे विज्ञान या गणित की तरह समझना ग़लत है. राजनीति को समाज पर छोड़ देना चाहिए. इसे किसी निश्चित गणित के आधार पर नहीं चलाया जा सकता.

बिहार में विकास कोई मुद्दा नहीं रह गया था. पिछले 20-25 साल से वहां की राजनीति में विकास कोई मुद्दा रहा ही नहीं है.

इमेज कॉपीरइट sunita zade

बिहार के चुनाव जात-पात और सोशल इंजीनियरिंग के आधार पर होते रहे हैं और एकबार फिर से वही हुआ है.

बिहार के चुनावों पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान का असर भी हुआ है.

इमेज कॉपीरइट PTI

बीजेपी जनता के सामने इस बयान की व्याख्या करने में असफल रही. जबकि लालू प्रसाद यादव ने काफ़ी ऊर्जा के साथ इस बयान का पूरे राज्य में प्रचार किया. लेकिन बीजेपी के किसी नेता के पास लालू जैसी ऊर्जा नहीं दिखी.

इन चुनावों ने दिखा दिया कि प्रधानमंत्री मोदी का असर कम हो रहा है. इससे, पहले हरियाणा, महाराष्ट्र और फिर झारखंड के चुनावों में प्रधानमंत्री की कमियां दिखनी शुरू हो गई थीं.

अब बिहार के चुनाव परिणाम ने स्पष्ट कर दिया है कि बीजेपी को प्रधानमंत्री के करिश्मे के भरोसे से बाहर निकलना होगा.

पूरे बिहार चुनाव के दौरान पुरस्कार वापसी का मुद्दा भी काफ़ी चर्चा में रहा. दरअसल यह मोदी सरकार को घेरने का एक तरीका था.

इमेज कॉपीरइट Twitter

विपक्ष दाल, प्याज और असहिष्णुता जैसे मुद्दे पर सरकार को घेरने में सफल रहा. जहां तक गाय का मुद्दा है तो ये उत्तर प्रदेश की एक घटना थी जिसे बीजेपी ने शुरू नहीं किया, लेकिन अंत में यह बीजेपी के गले पड़ गई.

बीजेपी अब अपने हार की समीक्षा करेगी. इसमें शत्रुघ्न सिन्हा या और भी कई नेताओं पर भी चर्चा होगी.

लेकिन मेरा मानना है कि बीजेपी बाक़ी पार्टियों के मुक़ाबले ज़्यादा अनुशासन वाली पार्टी है. इसलिए जो भी होना होगा पार्टी के भीतर होगा, इसका बाहर कोई भी असर नहीं दिखेगा.

इमेज कॉपीरइट PTI

जहां तक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का सवाल है तो पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को लेकर कोई बहस नहीं है. इसलिए फ़िलहाल उनकी कुर्सी पर मुझे कोई ख़तरा नहीं दिखता है.

बीजेपी अगर यह सोचती है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने से उसकी सोशल इंजीनियरिंग पूरी हो गई तो यह ग़लत है.

बीजेपी केवल ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जैसी जातियों के वोट से चुनाव नहीं जीत सकती. बीजेपी को उन वर्गों में भी अपने नेता बनाने होंगे जिसका वोट उसे चाहिए. फ़िलहाल इस दिशा में बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग असफ़ल है.

(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार