दिल्ली के ट्रैफिक में फंस जाएंगी लक्ष्मी

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उत्तर भारत में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है दिवाली. लेकिन पिछले करीब एक दशक में यह एक मूर्खतापूर्ण व्यावसायिक त्यौहार में बदल गया है.

मेरे परिवार में पारंपरिक रूप से दीवाली रोशनी का त्यौहार था जब हम अपने घरों को दियों से सजाते थे, लक्ष्मी और गणेश की पूजा करते थे और सभी मिल-जुलकर खुशी से इसे मनाते थे.

हम नए कपड़े पहनते और पारंपरिक मिठाइयों पर टूट पड़ा करते थे, जिनमें से कुछ बाज़ार की होती थी और कुछ मेरी प्रतिभावान मां बनाती थीं.

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हमें कभी पटाखे नहीं मिले. बचपन में मैं जब भी अपने पिता से पटाखों के लिए पैसे मांगती तो वह कहते, "पैसों के साथ तुम भी जल सकती हो."

पटाखों पर पैसे मैंने पहली बार मां बनने के बाद ख़र्च किए, जब अपने एक साल के बेटे के लिए मैंने थोड़े से पटाखे ख़रीदे. वो उनके शोर से इतना डर गया था कि मुझे उसके साथ घर के अंदर छुपना पड़ा और इस तरह पहली बार, आखिरी बार बन गया.

लेकिन दिल्ली में दीवाली अब मेरे बचपन का ख़ुशनुमा त्यौहार नहीं रह गया है.

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पिछले कुछ सालों में यह एक भारी ख़रीदारी वाले त्यौहार में बदल गया है, जिसमें अंतहीन ट्रैफ़िक जाम और भारी शोर मचाने वाले पटाखे शहर का दम घोटने वाले धुएं को और गाढ़ा करते हैं.

इससे यहां सांस लेना एक ख़तरनाक काम बन जाता है. इस स्थिति से कुछ दिल्लीवासी चिंतित होने लगे हैं.

पिछले कुछ सालों में लोगों से पटाखे छोड़ देने के आग्रह भी किए जा रहे हैं, लेकिन साफ़ है कि ऐसी कोशिशें नाकाम रही हैं.

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि पटाखे 'विस्फ़ोटकों की तरह ही बुरे हैं' और तीन शिशुओं के माता-पिता ने उच्चतम न्यायालय में पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के लिए याचिका दायर की थी.

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अदालत ने याचिका ख़ारिज कर दी लेकिन न्यायाधीशों ने सरकार को निर्देश दिए कि वह 'पटाखे फोड़ने के दुष्प्रभावों और प्रदूषण के बारे में आम लोगों को जागरूक करने के लिए' अभियान चलाए और कहा कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक इन पर प्रतिबंध रहेगा.

लेकिन क्या सचमुच ऐसा होगा? मुझे इसमें संदेह है- और मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं कि दक्षिणी दिल्ली में मेरे पड़ोस में पटाखे कई दिन से फोड़े जा रहे हैं. और वह 10 बजे रात की समय सीमा के बाद भी फोड़े जाते हैं.

गुस्से में लिखी गई एक फ़ेसबुक पोस्ट में पूर्वी दिल्ली में रहने वाले एक दोस्त ने लिखा कि वह रात के 12.56 बजे पड़ोसियों के पटाखे फोड़ने से उठ गए थे.

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लेकिन दिल्ली में दीवाली का जो सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है- और जिससे मैं सबसे ज़्यादा नफ़रत करती हूं- वह ख़रीदारी की सनक है जो इस त्यौहार से हफ़्तों पहले ही सिर चढ़कर बोलने लगती है और इस पर उपहार देने का बेतुका चलन भी है.

दीवाली से कई हफ़्ते पहले तक अख़बार भारी होने लगते हैं, जिसकी वजह बहुत सी नई चमकदार चीज़ों के विज्ञापन वाले कई पन्ने होते हैं.

आपको उकसाया जाता है कि नया और बड़ा टीवी ख़रीद लें, पुरानी वॉशिंग मशीन बदल डालें- भले ही वह ठीक से काम कर रही हो, नए उपकरण ख़रीद लें चाहे उनका प्रयोग हो न हो, उनके लिए जगह हो न हो.

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और जब आप यह सब कर ही रहे हैं तो जाकर थोड़ा सोना और हीरे भी ख़रीद लो. और वो शानदार नई कार भी.

अरे हां, अब चूंकि आप दीवाली के आस-पास ख़रीद रहे हैं तो आपको सोने का एक सिक्का या नई गाड़ी के साथ म्यूज़िक सिस्टम भी मुफ़्त मिल सकता है.

अब क्योंकि दीवाली अपने साथियों के प्रति उदार होने का भी समय है तो अनावश्यक रूप से बड़ी सूखे मेवों, चॉकलेट की टोकरी या उपहार दोस्तों, रिश्तेदारों और व्यापारिक संपर्कों को देना न भूलें.

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हां, सेहत को नुक़सान पहुँचाने वाली मीठी भारतीय मिठाइयों के लाखों डिब्बे भी. इस बात से क्या फ़र्क पड़ता है कि भारत को दुनिया की 'मधुमेह और उच्च-रक्तचाप की राजधानी' क़रार दिया गया है.

फिर उन्हें लाखों गाड़ियों में लादकर उन जगहों तक पहुंचाओ जहां के लिए वो ली गई हैं. और फिर अंतहीन ट्रैफ़िक जामों में फंस जाओ, हॉर्न बजाते रहो, चिड़चिड़ाते रहो.

दीवाली के दौरान मेरी मां हमेशा कार्यक्रम की समाप्ति फ़र्श पर एक रास्ता बनाकर करती थीं- ताकि जब धन की देवी लक्ष्मी हमारे घर आएं तो उन्हें पता हो कि जाना कहां है.

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लेकिन आज मुझे संदेह है कि लक्ष्मी दिल्ली में आएंगी, जो शोर और प्रदूषण से भरी हुई है. लेकिन अगर वह आएं तो शायद वो भी ट्रैफ़िक जाम में फंस जाएं.

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