'जो मोदी ने हासिल किया, कोई ना कर पाया'

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न्यूयॉर्क में जब मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए पहली बार अमरीका के कोने-कोने से हज़ारों भारतीय जुटे, तो यही लगा जैसे वो एक जीत का जश्न हो, उस ज़मीन पर जहां उनके नेता को दस साल तक पांव रखने की इजाज़त नहीं थी.

लेकिन वो तो एक शुरुआत भर थी, न मोदी रुके हैं न उनके चाहने वाले. अब तक वो 27 से ज़्यादा देशों का दौरा कर चुके हैं और कई देशों में हज़ारों की भीड़ उन्हें सुनने को जुटी है.

वॉशिंगटन में रहने वाली अंजू प्रीत मोदी को सुनने न्यूयॉर्क गई थीं, फिर अगले साल सैन होज़े गईं और अब वेम्बली का टिकट लेकर तैयार हैं. वो कहती हैं कि जो मोदी ने हासिल किया है वो किसी ने नहीं.

उनका कहना है, "विदेशों में रहते हुए हम अब तक राजस्थानी या तेलुगू या केरल के होते थे. उन्होंने भारतीयों को एकजुट कर दिया है. अब हम सिर्फ़ भारतीय हैं.”

हावर्ड और जॉर्ज वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में पढ़ चुकीं अंजू प्रीत कैंसर के क्षेत्र में शोध कर रही हैं और काफ़ी कामयाब हैं. वो कहती हैं कि मोदी को सुनने के बाद अब वो भारत वापस लौटने की सोच रही हैं जिससे उनका हुनर देश के काम आ सके.

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पोप के अलावा शायद ही कोई शख़्सियत होगी जिसने विदेशी ज़मीन पर इतनी बड़ी रैलियां की हों. जिन मंचों पर रॉकस्टार्स की मेज़बानी होती है, उन्हीं मंचों पर मोदी एक नए भारत की कहानी सुना रहे हैं.

वॉशिंगटन के एक थिंक टैंक से जुड़े मिलन वैष्णव का कहना है कि इन रैलियों से मोदी एक तो दुनिया को ये बता रहे हैं कि भारत बदल रहा है, बिज़नेस के लिए खुला हुआ है और निवेश के लिए अच्छी जगह है.

कहते हैं, “वो ये भी देख रहे हैं कि विदेशों में रहने वाले भारतीय काफ़ी कामयाब हैं, पैसे वाले हैं, समाज में उनकी एक साख है और वो दुनिया के सामने भारत की कहानी काफ़ी कारगर तरीके से पेश कर सकते हैं.”

उनके चाहने वालों का जोश देखकर ये रैलियां कामयाब लगती हैं, निवेशक भी भारत के एक नए चेहरे की बात कर रहे हैं, लेकिन कामयाबी दिखती कैसी है अब उस पर सवाल भी उठने लगे हैं.

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मिलन वैष्णव का कहना है कि जैसे-जैसे उनका कार्यकाल बढ़ता जाएगा, लोग जानना चाहेंगे कि इन दौरों से क्या मिल रहा है, कितना निवेश आ रहा है, क्या नीतियां बदली जा रही हैं.

वो कहते हैं, "ये वो सवाल हैं जिन पर कहा जा रहा है कि जिस तरह के वादे किए जा रहे हैं विदेशी ज़मीन पर, वो ज़मीन पर लागू होते नहीं नज़र आ रहे.”

पिछले दिनों में भारत में विदेशी निवेश बढ़ा है लेकिन जानकार उसकी वजह चीनी अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ़्तार को भी बताते हैं. बढ़ते निवेश में इन रॉकस्टार रैलियों की क्या भूमिका है उसे कोई नहीं माप पाया है.

भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश पर पैनी नज़र रखने वाले रिचर्ड रोसो का कहना है कि इन रैलियों में वो अपने चाहने वालों में ख़ासा उत्साह पैदा करते हैं और इनमें से कई हैं जो बड़ी-बड़ी कंपनियां चला रहे हैं.

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वो कहते हैं, "आमतौर पर ये कंपनियां अपना नफ़ा नुकसान देखकर पैसे लगाती हैं लेकिन इस क्षेत्र में सेंटीमेंट्स या भावनाएं भी एक अहम किरदार अदा करती हैं."

उनके अनुसार व्यापार की पेचीदगियों को लेकर अक्सर दूसरे देशों के साथ तीखी कूटनीतिक बहस भी छिड़ती है और अगर उसमें ये लोग भारत का पक्ष कारगर तरीके से रख सकें तो ये दौरे सही मायने में कामयाब कहलाएंगे.

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