ब्रिटेन से खुश होकर घर लौटेंगे मोदी!

  • 12 नवंबर 2015
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Image caption पिछले साल नवंबर में जी 20 देशों के सम्मेलन में ब्रिटिश पीएम कैमरन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

मोदी का ब्रिटेन दौरा, ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के लिए एक निजी मामला भी है.

तैयारियों में शामिल शीर्ष ब्रितानी अधिकारी ज़ोर देकर कहते हैं कि इस यात्रा में मोदी को ये समझाने की कोशिश की जाएगी कि ब्रिटेन जैसा उनका कोई दोस्त नहीं है.

इसके अलावा दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच और गहरे संबंध बनाने की कोशिश भी होगी, जो फ़िलहाल मौजूद नहीं है.

समझौतों और क़रीब 15 अरब डॉलर के जिन व्यावसायिक सौदों पर रज़ामंदी हुई है उसके अलावा कोशिश ये होगी कि दोनों प्रधानमंत्री एक दूसरे से बेहतर तरीक़े से जुड़ पाएं.

कैमरन के पास इसके लिए काफ़ी मौक़ा होगा. मोदी उनके फ़ार्म हाउस - ‘चेकर्स’ में रात भर रुक रहे हैं.

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एक और अहम कोशिश होगी, भारतीय प्रधानमंत्री के अहंकार को तुष्ट करने की कोशिश, जिसे ब्रितानी विदेश मंत्रालय और ब्रिटिश फ़ॉरेन एंड कॉमनवेल्थ ऑफ़िस के लोग अच्छी तरह समझ गए हैं.

गुरुवार को जब मोदी कैमरन के साथ पहली मीटिंग के लिए जा रहे होंगे तो उनके साथ घुड़सवार रक्षक दल चलेगा और रॉयल एयर फ़ोर्स की एरोबैटिक टीम ‘रेड ऐरोज़’ उड़ान भरेगी.

लंदन आई - शहर का विशाल झूला, भारतीय तिरंगे के रंग में नहा उठेगा.

मोदी को गॉर्ड ऑफ़ ऑनर भी दिया जाएगा. यह सम्मान आम तौर पर सिर्फ़ किसी देश के मुखिया को ही दिया जाता है.

मोदी सरकारी मेहमान हैं. इससे भी अहम है 13 नवंबर को वेम्बली स्टेडियम में आयोजित विशाल कार्यक्रम, जिसमें मोदी फ़ुटबॉल के मैदान के बीचों बीच बने मंच से भाषण देंगे. ये तैयारियां कुछ इतने बड़े स्तर पर की गई है कि ख़ुद मोदी और कार्यक्रम को देख रहे भारतीय चकित रह जाएंगे.

स्टेडियम में लगभग 70,000 हज़ार लोगों के आने का अनुमान है. इनमें अधिकांश भारतीय मूल के लोग और पूरा ब्रितानी कैबिनेट होगा.

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दावा है कि इसके सामने अमरीका में मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हुई मोदी की सभा फीकी पड़ जाएगी.

अपवाद स्वरूप और शायद कैमरन के राजनीतिक जीवन में पहली बार ऐसा होगा कि वो मोदी का परिचिय कराएंगे और फिर स्टेडियम से चले जाएंगे.

मोदी भले ही ब्रिटेन में हों लेकिन ये उनका शो है.

इस आयोजन की टाइमिंग भी कोऊ ग़लती नहीं हुई है.

ये दिवाली के बाद का वक़्त है जब ब्रिटेन में रहने वाले क़रीब 15 लाख भारतीय प्रवासियों में से अधिकांश हफ़्ते की छुट्टियों पर होंगे.

कैमरन के लिए यह एक बढ़िया मौका है जब वो उन मतदाताओं तक अपनी पहुंच बना सकते हैं जो ब्रिटेन के चुनावों में बहुत कम अंतर वाली सीटों पर लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.

भारतीय नेशनल कॉंग्रेस के संस्थापक दादाभाई नौरोजी 1892 में हाउस ऑफ़ कामन्स में लिबरल पार्टी से सांसद चुने जाने वाले पहले भारतीय मूल के व्यक्ति थे.

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मौजूदा समय में ब्रितानी संसद में भारतीय मूल के दस सांसद हैं.

कैमरन समझते हैं कि भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्तों को बेहतर बनाने में भारतीय मूल के शहरी बहुत अहम भूमिका निभाएंगे.

ऐसा लगता है कि उनकी सरकार को भी ये बात समझ आ चुकी है कि इस दौरे की सबसे अहम बात समझौते और सौदे नहीं बल्कि वो तस्वीरें हैं जो भारतीय प्रधानमंत्री को याद दिलाएंगी कि ब्रिटेन ने क्या कुछ किया.

यही नहीं, इस सूची में ब्रिटिश संसद को संबोधन और महारानी के साथ लंच भी शामिल हैं.

हालांकि ब्रिटेन के उद्योग जगत की ओर से कैमरन पर इस बात दबाव होगा कि वो मोदी के सामने सुधार के एजेंडे को आगे बढ़ाएं.

लंदन में मोदी की नीतियों के समर्थकों का अनुमान है कि भारत अगले दशक तक औसतन आठ प्रतिशत की विकास दर को बनाए रखेगा.

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साथ ही साथ उनका अनुमान है कि चीन की अर्थव्यवस्था और धीमी होकर औसतन पांच प्रतिशत तक चली जाएगी.

हालांकि ये सब मोदी सरकार द्वारा सावधानी पूर्वक गढ़ी गई वादों की कहानी है, लेकिन ऐसा लगता है कि ब्रिटेन के निवेशकों के गले ये बात पूरी तरह नहीं उतरी है.

वादों से भरी उनकी कहानी में वो व्यावहारिक संभावनाओं को देखने के इच्छुक हैं, लेकिन उन्हें यह भी लगता है कि अगर अगले दशक में चीन की विकास दर आधी भी हो जाए तो भी उसकी अर्थव्यवस्था भारत के मुकाबले दो गुना बड़ी बनी रहेगी.

इसके अलावा मोदी टैक्स सिस्टम को सरल और स्थायी बनाने के वादे के साथ सत्ता में आए थे.

हालांकि उन्होंने भारत को ‘टैक्स टेररिज़्म’ से छुटकारा दिलाने का वादा किया था.

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लेकिन व्यवसाय जगत का तर्क है कि ये अभी तक ज़मीन पर नहीं उतरा. मोदी ने देश में एक समान टैक्स व्यवस्था लागू करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लाने का भी बीड़ा उठाया था.

लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि उनके खुद के द्वारा तय समय, अप्रैल 2016, तक भी यह अमल में आए पाएगा.

सबसे अहम बात ये है कि अब वित्तीय संगठनों को भी भारत सरकार के ख़तरा मोल लेने की क्षमता पर शक होने लगा है.

उनकी शिकायत है कि भरपूर बहुमत के बावजूद मोदी सरकार का सुरक्षात्मक रवैया जारी है और वो इससे बदलना नहीं चाहती.

हालांकि वादे और भावनाओं ने भारत में निवेश करने को लेकर ब्रितानी उद्योगों में एक उम्मीद बरकरार रखी, लेकिन इस उम्मीद की भी कोई सीमा है.

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चेकर्स में रात गुजारने और वेम्बली में शाम गुजारने के दरम्यानी समय में यही एक संदेश है जो कैमरन की ओर से मोदी को दिए जाने की उम्मीद की जानी चाहिए.

कुल मिलाकर यह दौरा भारतीय प्रधानमंत्री और भारतीय लोगों को भाव विभोर कर देने के लिए आयोजित किया गया है, ताकि ब्रिटेन को मोदी के राजनीतिक कल्पना के केंद्र में लाने का कैमरन को मौका मिल सके.

पाकिस्तान और कश्मीर से जुड़े तनाव पैदा करने वाले वो पुराने मुद्दे शायद हाशिये पर ही रहें.

यहां तक कि जलवायु परिवर्तन पर भारत के स्टैंड का मुद्दा भी फिलहाल ठंडे बस्ते में ही रहे, जिसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री कार्यालय ने कथित रूप से बाधा पैदा करने वाला बताया था.

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बात बहुत सीधी सी हैः मोदी के द्वारा उपलब्ध कराए गए मौके का दोनों पक्षों द्वारा बराबर फायदा उठाना.

भारत के पड़ोसी देशों और अंतररराष्ट्रीय समझौतों से संबंधित मामलों को फिलहाल दूर ही रखा जाएगा.

(लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर/इंडिया इंस्टीट्यूट से जुड़े हुए हैं.)

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