भागवत का बयान संघ के प्लान का हिस्सा था?

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बिहार में एनडीए की करारी हार के बाद समीक्षा ज़ोरों पर है. एक तबका मानता है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए बयान ने बिहार में एनडीए की लुटिया डुबोई.

हालांकि भारतीय जनता पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता मोहन भागवत के बचाव में उतर आए हैं. ये नेता हुकुमदेव नारायण यादव के उस बयान से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते जिसमें उन्होंने भागवत पर आरोप लगाया था कि उनके आरक्षण पर दिए बयान से पिछड़ी और दलित जातियों में गुस्सा पैदा हुआ जिसके फलस्वरूप उन्होंने पार्टी को वोट नहीं दिया.

भागवत ने अपने साक्षात्कार में कहा था कि देश के हित में एक कमिटी बनाई जानी चाहिए जो आरक्षण पर समीक्षा कर ये बताए कि कौन से क्षेत्र में और कितने समय के लिए आरक्षण दिए जाने की ज़रूरत है.

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आरएसएस मुखपत्र पांचजन्य में छपे भागवत के इंटरव्यू के तुरंत बाद आरएसएस ने आधिकारिक तौर पर इस पर सफाई दी थी.

ख़ास बात ये है कि आरएसएस ने भागवत के बयान पर नहीं, बल्कि बयान को मीडिया में पेश किए जाने के तरीके और बयान के जो मायने निकाले गए उस पर अपनी सफाई दी.

भागवत के बयान ने बीजेपी को बिहार में नुकसान ज़रूर पहुंचाया. लेकिन साथ ही आरक्षण के मुद्दे पर आरएसएस की सोच को भी जगज़ाहिर कर दिया.

आरक्षण पर आरएसएस का ऐतराज़ नया नहीं है. देश की आज़ादी के बाद से और फिर 1990 में मंडल आयोग के गठन के बाद से आरएसएस आरक्षण की आलोचना करता रहा है.

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पिछले चार दशकों से आरएसएस, जनसंघ और बीजेपी लगातार गैर-राजनीतिक संगठनों द्वारा आरक्षण की समीक्षा करने के पक्ष में हैं.

1980 में गुजरात सरकार के आरक्षण नीति का बीजेपी ने जमकर विरोध किया था. 1981 में आरक्षण के खिलाफ़ देश में फैले विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेरिट को भी तरजीह देने की बात कही थी. तब आरएसएस के गुट, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने गैर-राजनीतिक कमिटी बनाकर आरक्षण से उठ रही परेशानियों तथा पिछड़ी और जनजाति के उत्थान के लिए सकारात्मक कदम उठाने की मांग की थी.

अगर आप भागवत के ताज़ा इंटरव्यू को पढ़ें तो ये महज़ आरएसएस के उसी सोच को दोहराता है.

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आरएसएस ने ये भी सुझाव दिया था कि कमिटी आर्थिक रूप से कमज़ोर दूसरी जातियों के लिए भी ख़ास इंतज़ाम करे. आरएसएस इंदिरा गांधी की उस विचार से सहमत था कि आरक्षण समस्या का स्थाई हल नहीं हो सकता है.

उस वक्त बतौर बीजेपी अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इसी सुर में सुर मिलाया था. अप्रैल 1981 में कोच्ची में दिए अपने भाषण में वाजपेयी ने कहा था कि आरक्षण एक राष्ट्रीय मुद्दा है और इसका हल स्थाई होना चाहिए.

आरक्षण पर बीजेपी महज़ आरएसएस की सोच को दोहरा रही थी. 1985 में अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल की बैठक में भी आरक्षण का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा था.

लेकिन इसके बाद से अचानक बीजेपी आरक्षण का समर्थन करती नज़र आई. हालांकि आरएसएस की सोच में कोई बदलाव नहीं आया.

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आरएसएस ना केवल आरक्षण नीति के खिलाफ है, बल्कि वो समाज में फैली वर्ण व्यवस्था का भी पक्षधर है. आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर, जो तीन दशकों तक बतौर आरएसएस प्रमुख रहे, खुलकर आरक्षण का विरोध करते नज़र आए.

केवल यही नहीं, अपनी किताब में गोलवलकर ने महिलाओं के समानाधिकार की मांग पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि उच्च पदों पर जाति, धर्म, भाषा के अलावा अब लिंग के आधार पर भी आरक्षण दिया जाएगा.

गोलवलकर ने अपनी किताब में लिखा कि आजकल लोग समाज में बनी वर्ण व्यवस्था को जातिवाद से जोड़कर देखते हैं. सामाजिक व्यवस्था को सामाजिक भेदभाव के रूप में देखा जाने लगा है.

साफ़ है कि गोलवलकर वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे और वो हिन्दू समाज में समानता लाने के पक्ष में नहीं थे.

वर्ण व्यवस्था का पक्षधर होने का कारण ये भी था कि आरएसएस समाज में ऊंची जाति के दबदबे को कायम रहने देना चाहता था.

ख़ास ये है कि अबतक आरएसएस के 6 सरसंघचालकों में से 5 ब्राह्मण और 1 राजपूत हैं. मैंने सितंबर में लिखे अपने एक लेख में कहा था कि आरएसएस नेताओं की सोच दूसरे संगठनों के सदस्यों की सोच से बिल्कुल इतर है.

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वैसे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की मंशा बिहार में बीजेपी को हराना नहीं था. लेकिन ये साफ़ है कि वो गुजरात में पटेल आंदोलन से काफी चिंतित हैं.

दरअसल गुजरात को हिन्दुत्व का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है और अगर यहां जातिवाद अपने पैर पसारना शुरू कर देता है तो शायद कहना ग़लत नहीं होगा कि जातिगत आरक्षण की समीक्षा का वक्त आ गया है.

ऐसे वक्त पर जब पटेल आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा है, भागवत का आरक्षण के खिलाफ बयान सटीक समय पर आया है.

लेकिन भागवत के बयान से अगर राज्य में बीजेपी की स्थिति खराब होती है तो ये बीजेपी नेताओं की बदक़िस्मती होगी, ना कि आरएसएस नेताओं की जो किसी बड़ी मंशा के तहत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं.

जातिगत आरक्षण जहां हिंदू समाज को बांटने का काम कर रहा है, आरएसएस आरक्षण का मुद्दा उठाने का कोई मौका नहीं गंवाएगा.

( ये लेखक के निजी विचार हैं )

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