पिछले एक साल में बैंक फ्रॉड दोगुने हुए

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भारत के बैंकिंग क्षेत्र में वर्ष 2013-14 और 2014-15 के दौरान नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी से ये क्षेत्र मुश्किल में है.

लेकिन ये भी सच है कि जब से नरेंद्र मोदी की सरकार ने केंद्र में सत्ता संभाली है, बैंकों के फर्जीवाड़े में 100 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है.

मई 2015 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों में बढ़ रहे फर्ज़ीवाड़े पर निगरानी रखने के लिए एक केंद्रीय फ्रॉड रजिस्ट्री की स्थापना की थी.

इसके बाद, प्रधानमंत्री कार्यालय का फर्जीवाड़े का पता लगाने वाले सिस्टम की समीक्षा के लिए बैठक बुलाना साफ संकेत देता है कि सरकार इस मामले को लेकर चिंतित है.

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यह सिर्फ़ एक चेक बाउंस होने का मामला नहीं था. मीडिया में भी ख़बरें आई, लेकिन खबरों में इसकी वजह बैंक की गैर निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) में बढ़ोतरी और कर्ज़ डिफॉल्ट का ख़तरा बताया गया.

अब बैंगलुरू स्थित एक स्टार्टअप ऑनलाइनआरटीआई डॉटकॉम ने सूचना के अधिकार से मिली जानकारियों के मुताबिक कहा है कि बैंकों की ख़राब हालत के लिए सिर्फ़ एनपीए को ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है.

यही वजह है कि रिज़र्व बैंक को फ्रॉड रजिस्ट्री बनानी पड़ी और पीएमओ को इसकी समीक्षा के लिए बैठक करनी पड़ी.

मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद 2014-15 में बैंकों के फर्जीवाड़े 19,361 करोड़ रुपए हो गए, जबकि 2013-14 में फर्जीवाड़े का ये आंकड़ा 10,170 करोड़ रुपए का था.

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इस फर्जीवाड़े में चेकों में गड़बड़ी, जाली कर्ज़, डेबिट/क्रेडिट कार्ड से लेकर साइबर फ्रॉड तक शामिल हैं.

इस फर्जीवाड़े में बढ़ोतरी की मुख्य वजह महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में फर्जी मामलों में कई गुना बढ़ोतरी का होना है. कुल फर्जीवाड़े में इन दोनों राज्यों का हिस्सा आधे से अधिक है.

बैंक फर्जीवाड़े के मामले
राज्य वर्ष 2013-14 वर्ष 2014-15
महाराष्ट्र 2445 करोड़ रुपए 6115 करोड़ रुपए
पश्चिम बंगाल 773 करोड़ रुपए 5930 करोड़ रुपए

रिज़र्व बैंक हर साल फर्जीवाड़े के सिर्फ़ 30 फ़ीसदी मामलों को ही निपटा पाता है.

फर्जीवाड़े के मामले में सरकारी बैंक ही आगे हैं. पंजाब नेशनल बैंक इस दौरान 2310 करोड़ रुपए की रकम गंवाकर शीर्ष पर है, जबकि सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया की 2150 करोड़ रुपए की रकम डूब गई. दोनों बैंकों के फर्जीवाड़े में 200 फ़ीसदी से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

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विशेषज्ञ हैरान हैं कि बंगाल में बैंक फर्जीवाड़े के मामले क्यों बढ़ रहे हैं. कुछ का मानना है कि फ्रॉड के अधिक मामले उजागर हुए, जबकि कई अन्य का मानना है कि बैंक में अधिक लेन-देन इसके लिए जिम्मेदार है.

पूर्व बैंकर्स और ऑल बैंकिंग सॉल्यूशंस डॉटकॉम के संस्थापक राजेश गोयल कहते हैं, “पश्चिम बंगाल में बैंक फर्जीवाड़ों में यकायक बढ़ोतरी के मामलों की व्यापक जाँच होनी चाहिए.”

गोयल कहते हैं, “पंजाब नेशनल बैंक के आंकड़े असाधारण हैं और इसकी वजह आंकड़ों का गलत होना हो सकता है या फिर ये भी हो सकता है कि वास्तव में फर्जीवाड़ा पहले हो गया हो लेकिन ये अब जाकर उजागर हुए हों.”

वो कहते हैं, “सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक फर्जीवाड़े के इस तरह के मामलों की तह तक पहुंचने की ज़हमत ही नहीं उठाते. जैसे ही जाँच शुरू होती है, बैंक अधिकारी ये कहकर हाथ खड़े कर देते हैं कि इस मामले में आगे की दिशा नहीं मिल पा रही है.”

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के महासचिव विश्वास उतागी कहते हैं, “सरकार को ऐसे मामलों की जाँच में तेज़ी लानी चाहिए क्योंकि ये सीधे-सीधे धोखाधड़ी या लोगों के पैसे के साथ बेइमानी है.”

इसके उलट, आम धारणा ये है कि सरकारी बैंक फर्जीवाड़े के मामलों से निजी बैंकों के मुक़ाबले बेहतर तरीके से निपटे हैं.

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निजी बैंकों की बैंकिंग सेक्टर में लगभग 30 फ़ीसदी हिस्सेदारी है, लेकिन बैंकिंग फ्रॉड में इनका हिस्सा 40 फ़ीसदी के लगभग है. भारत में 20 निजी बैंक, 26 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और 30 विदेशी बैंक हैं.

जुलाई में जारी रिज़र्व बैंक के सर्कुलर के मुताबिक बैंकों फर्जीवाड़े का जैसे ही पता चले, उन्हें इसकी जानकारी केंद्रीय जाँच ब्यूरो, पुलिस या एसएफ़आईओ को देनी चाहिए.

ऐसे भी कई मामले हैं, जिनमें बैंक के ही कर्मचारी शामिल थे. संसद को सौंपी रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014-15 में ऐसे में 47 मामले सामने आए जिनमें फर्जीवाड़े की रकम 177 करोड़ रुपए थी.

उतागी आरोप लगाते हैं कि जब बैंक का कोई कर्मचारी ऐसे मामलों में शामिल होता है तो बैंक इसे दबाते हैं और इसे एनपीए की श्रेणी में डाल देते हैं.

(ये आंकड़े इंडिया स्पैंड की रिसर्च पर आधारित हैं)

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