#100Women इन्होंने तोड़ा पुरुषों का एकाधिकार (भाग-4)

  • 23 नवंबर 2015

#100Women में बीबीसी हिंदी ने चुनी हैं भारत की वो 100 दमदार औरतें, जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते खोले और मिसाल कायम कर दी, नहीं तो कम से कम समाज को झकझोरा तो है ही.

इस सिरीज़ में बात उन महिलाओं की जिन्होंने उन क्षेत्रों में अपना क़दम रखा जो अब तक केवल पुरुषों के लिए मान्य माने जाते थे.

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  • 100 Women: First

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  • अरुणिमा सिन्हा

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    अप्रैल 2011 को ट्रेन से लखनऊ से नई दिल्ली के सफ़र के दौरान राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा को अपराधियों ने लूटमार के बाद पद्मावती एक्सप्रेस से बरेली के पास नीचे फेंक दिया.

    इस हादसे में अरुणिमा को एक पांव गंवाना पड़ा. लेकिन उनके हौसले कम नहीं हुए.

    करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद मई 2013 में उन्होंने माउंट एवरेस्ट की चोटी फ़तह कर ली. एवरेस्ट की ऊंचाई तक पहुंचने वाली वह भारत की पहली विकलांग महिला एथलीट हैं.

    इसके अलावा उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, रूस और ऑस्ट्रेलिया की सबसे ऊंची चोटियों को भी फ़तह किया है.

    अरुणिमा की जीवटता और उनकी उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

  • बेनो ज़फीन

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    ‘मेरे पास दृष्टि नहीं थी, लेकिन सिविल सेवा में जाने की दृष्टि थी.’ ये कहना है बेनो ज़फीन एन.एल. का, जो 100 फ़ीसदी नेत्रहीनता के बावजूद विदेश सेवा की अधिकारी बनी हैं.

    69 साल के विदेश मंत्रालय के इतिहास में पहली बार 100 फ़ीसदी नेत्रहीन को अधिकारी पद की नियुक्ति मिली है.

    25 साल की ज़ेफीन इससे पहले भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी ऑफ़िसर के रूप में काम कर रही थीं. बेनो के मुताबिक महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं होतीं.

    बेनो 2008 में अमरीका में आयोजित ‘ग्लोबल यंग लीडर्स कांफ्रेंस’ में हिस्सा ले चुकी हैं और इसके बाद ही उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा.

    उन्हें ‘डेक्कन क्रानिकल’ की ओर से ‘वुमन ऑफ़ द ईयर’ का सम्मान मिल चुका है.

  • भारती सिंह

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    भारती सिंह भारत की पहली कामयाब महिला स्टैंडअप कॉमेडियन हैं. पंजाब के अमृतसर में जन्मीं भारती ने इतिहास में मास्टर्स की पढ़ाई की है.

    कॉलेज के दिनों में भारती पिस्टल शूटिंग की गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी रही हैं. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की तीरंदाज़ी प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया.

    पैसों की तंगी की वजह से खेल छोड़कर उन्होंने टीवी रियलिटी शो की दुनिया में क़दम रखा और देखते देखते अपनी पहचान बना ली.

    टीवी पर कामयाब होने के बाद भारती सिंह ने फ़िल्मों में काम करना शुरू किया. उन्हें टीम अभिनय के लिए कई अवार्ड मिल चुके हैं.

    भारती ने अपने सफ़र में मोटापे को भी आड़े नहीं आने दिया. वह कहतीं है कि जब आप ख़ुद पर हंसना सीख जाते हैं तो लोग क्या कहते हैं उससे फर्क नहीं पड़ता.

  • चारू खुराना

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    चारू खुराना एक स्वतंत्र मेक अप आर्टिस्ट हैं जिन्होंने फ़िल्म जगत में महिलाओं के साथ भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. लैंगिक समानता को लेकर शुरू की गई उनकी मुहिम को तब कामयाबी मिली जब सुप्रीम कोर्ट ने महिला मेकअप आर्टिस्ट्स को भी पुरुषों की तरह काम करने की इज़ाजत देने संबंधी फ़ैसला सुनाया.

    चारू की कोशिशों के चलते 50 साल के बाद महिला मेकअप आर्टिस्ट्स के लिए बॉलीवुड के दरवाजे खुले.

    सिनेमा मेकअप स्कूल, लॉस एंजलिस, अमरीका से मेकअप में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने वाली चारू ने एक दशक से भी ज़्यादा समय के दौरान चारू ने कमल हसन, अभिषेक बच्चन, करीना कपूर और विक्रम विजय जैसे कलाकारों के साथ काम किया.

    दो बच्चों की मां चारू अभी भी महिला अधिकार से जुड़े मामलों के लिए सक्रिय हैं.

  • हेतल दवे

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    27 साल की हेतल दवे भारत की पहली महिला सूमो पहलवान हैं. उन्होंने 2009 में ताइवान में आयोजित विश्व सूमो कुश्ती प्रतियोगिता में पांचवां स्थान हासिल किया था.

    सूमो कुश्ती को भारत में मान्यता प्राप्त खेल का दर्ज़ा हासिल नहीं है, इसके चलते हेतल कई प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाती हैं.

    इस वजह से इन्हें प्रायोजक भी नहीं मिलते. इन चुनौतियों के बावजूद हेतल 2008 में ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स’ में अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं.

    भारत में महिला सूमो खिलाड़ी नहीं होने की वजह से इन्हें पुरुष सूमो खिलाड़ियों के साथ प्रशिक्षण करना पड़ता है. हेतल अलग अलग स्कूलों में छात्रों को कुश्ती और जूडो का प्रशिक्षण भी देती हैं.

  • इरा सिंघल

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    इरा सिंघल 2014 की सिविल सर्विसेज़ परीक्षा की टॉपर हैं.

    32 साल की इरा ने स्कॉलोसिस की बीमारी को अपने राह की बाधा नहीं बनने दी और वह भारत की सबसे बड़ी सेवा की परीक्षा में टॉप करने वाली पहली विकलांग हैं.

    मज़बूत हौसलों वाली इरा ने दिल्ली से एम.बी.ए. की पढ़ाई की थी और कैडबरी कंपनी में नौकरी भी की. पर बचपन से देश की सेवा करने का सपना साकार करने के लिए उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा दी.

    2010 में भारतीय राजस्व सेवा में चयनित हुई थीं लेकिन उनकी विकलांगता को आधार बताते हुए उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई थी.

    इस फ़ैसले के विरोध में इरा ने ‘सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रायब्यूनल’ का दरवाज़ा खटखटाया. चार साल बाद आखिर इरा को जीत मिली और इसने दूसरे विकलांग लोगों के लिए भी रास्ता खोल दिया है.

  • पार्बती बरूआ

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    असम के गोलपाड़ा ज़िले की पार्बती, बरूआ राजघराने से संबंधित हैं. लेकिन इन्होंने ऐसे काम को चुना जिसे पुरुषों का काम समझा जाता रहा है. ये काम था हाथियों को संभालने का. पार्बती बरूआ महावत बनीं और उन्हें आज हाथियों की रानी भी कहा जाता है.

    पार्बती बरूआ का अधिकांश समय हाथियों को सिखाने और उनकी देखरेख में व्यतीत होता है. वह भारत की अकेली महिला महावत हैं.

    इन्हें 1989 में ‘यूनाइटेड नेशंस एनवायरमेंट प्रोग्राम’ में ‘ग्लोबल 500 रोल ऑफ़ ऑनर’ पुरस्कार मिला था.

    पार्बती पर ब्रिटिश पर्यावरणविद मार्क शैंड ने एक किताब लिखी जो बेहद चर्चित हुई और बीबीसी ने उनपर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है.

  • रासीला वढेर

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    रासीला वढेर 2007 में वन्य विभाग की महिलाओं के पहले सुरक्षा दस्ते में शामिल हुईं. एक परंपरागत परिवार में जन्मीं रासीला के जीवन का मतलब शादी करना और परिवार के लिए भोजन बनाना भर ही था.

    2007 में वन्य विभाग को गार्डों की तैनाती हो रही थी, रासीला अपने भाई को परीक्षा दिलाने ले गईं और वन्य विभाग ने रासीला को ही गार्ड के तौर पर चुन लिया.

    पहले तो उन्हें दफ़्तर के काम में लगाया गया लेकिन बाद में उनकी फ़ील्ड में तैनाती शुरू हुई.

    रासीला अब तक 900 जानवरों का जीवन बचा चुकी हैं, इनमें 200 से ज़्यादा शेर और 425 के करीब तेंदुए शामिल हैं.

    हाल ही में रासीला ने डिस्कवरी चैनल की चार भाग की सीरीज़ में अहम रोल अदा किया है.

  • शन्नो

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    दिल्ली की 20 साल की शन्नो बालकनामा अख़बार की सलाहकार हैं. बालकनामा अख़बार सड़क पर पलने वाले कामगार बच्चे ही लिखते और छापते हैं और फिर इसे अपने जैसे बच्चों तक पहुंचाते हैं.

    यह संभवत: दुनिया में अपने जैसा पहला अख़बार है. अख़बार में काम करनेवाले रिपोर्टर से लेकर संपादक सभी बच्चे हैं यानि 18 साल की उम्र पार होते ही उन्हें काम से हटा दिया जाता है. इसलिए शन्नो अब संपादक का काम छोड़ सलाहकतार बन गई हैं.

    इस अख़बार की शुरुआत 2003 में हिंदी में हुई थी. अब यह हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में महीने में दो बार छपता है और इसे क़रीब दस हज़ार बच्चे पढ़ते हैं.

    इसकी शुरुआत गैर सरकारी संगठन ‘बढ़ते क़दम’ की ओर से हुई थी.

  • सुषमा वर्मा

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    लखनऊ की सुषमा वर्मा ने गरीबी और अभाव को अपने पढ़ाई की राह में बाधा नहीं बनने दिया. सफाई कर्मचारी के बेटी सुषमा सबसे कम उम्र में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने वाली भारतीय छात्रा हैं.

    उन्होंने महज़ 15 साल की उम्र में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी, लखनऊ से माइक्रोबायॉलजी में एम.एस.सी. की डिग्री हासिल की.

    इससे पहले महज़ 13 साल की उम्र में सुषमा ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से स्नातक किया था. दस साल की उम्र में वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी कर चुकी थीं.

    2000 में सात साल की उम्र में मैट्रिक करने पर सुषमा का नाम सबसे कम उम्र में मैट्रिक करने के चलते ‘लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज किया गया.

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