जहाँ बादशाह भी फरियादी बनकर आते हैं..

हज़रात बख्तियार काकी की दरगाह

दिल्ली के महरौली में है सूफी संत हज़रात बख्तियार काकी की दरगाह सालाना त्यौहार फूल वालों की सैर के लिए सजी हुई है.

पास ही में एक दूसरा दरबार भी सजा हुआ है. यह है योगमाया मंदिर का.

साझा संस्कृति का मिसाल बने फूल वालों की सैर का यह त्यौहार हिन्दू और मुसलमान मिलकर मनाते हैं.

दरगाह के खादिम पीरज़ादा मंज़ूर उल हक़ अशरफी क़ुतुबी बताते हैं कि यह त्यौहार तब से शुरू हुआ जब उस वक़्त की मलिका-ए-हिन्दुस्तान बेगम मुमताज़ महल सूफी संत के दरबार में फरियादी बनकर पहुंची थीं.

उनकी मुराद पूरी हुई और फूल वालों की सैर का त्यौहार शुरू हुआ. हालांकि 1857 में अंग्रेजी हुकूमत ने इसे बंद करवा दिया था. भारत की आज़ादी के बाद 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस परम्परा को दोबारा शुरू किया था.

क्या हिन्दू क्या मुसलमान, इस दरबार में सब अपनी फ़रियाद लेकर पहुँचते हैं. इन्हीं में से एक हैं बर्फी देवी जो अपनी फ़रियाद लेकर सूफी संत की दरगाह पर पहुंची हैं.

कहते हैं कि रूहानी सुकून और मुरादों को लेकर पहुँचने वाले लोग यहाँ से मायूस होकर नहीं लौटते.

यहीं के रहने वाले क़ाज़ी जमीलुद्दीन कहते हैं, "यह सिर्फ सूफी संत के दरबार की बात नहीं है."

योगमाया मंदिर के कन्हैंयालाल शर्मा बताते हैं कि फूलवालों की सैर के त्यौहार के दौरान जहाँ दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाई जाती है वहीँ मंदिर और दरगाह पर एक साथ फूलों का पंखा चढ़ाया जाता है.

असहनशीलता पर चल रही राजनीतिक बहस के बीच योगमाया मंदिर की घंटियाँ और पास ही में हज़रात बख्तियार काकी के दरबार में गाए जाने वाली क़व्वाली की आवाज़ें इस बात का प्रतीक हैं कि कोई चाहे कुछ भी कह ले, जिस गंगा जमुनी तहज़ीब के लिए भारत को जाना जाता है उसे कोई छीन नहीं सकता.

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