'मेरी कहानी के राम तो मांस खाते थे'

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बेस्ट सेलर लेखक अमिष त्रिपाठी और अश्विन सांघी की किताबें धर्म या इतिहास पर आधारित होती हैं. उन्हें कभी किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है.

बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में इन दोनों ने अपने लेखन, लेखन से जुड़े विवादों और असहिष्णुता जैसे कई मुद्दों पर बात की.

अमिष की किताब ‘सायन ऑफ़ इक्ष्वाकु’ में राम की कहानी है. इस कहानी में मांस खाते हुए राम का चित्रण होने के बावजूद कोई विरोध नहीं हुआ.

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अमिष कहते हैं, “मेरी कहानी के राम सामान्य इंसान हैं. वो क्षत्रिय थे तो मांस खाते थे, ऐसा ही वाल्मीकि के रामायण में था, उन्हें रामचरितमानस में भगवान के रूप में दिखाया गया है.”

विरोध के बारे में उन्होंने कहा, “हमारा देश खुले विचारों वाला देश है, कुछ लेखक प्रचार के लिए ख़ुद विवाद खड़ा करते हैं. मुझे उसका सहारा नहीं लेना पड़ा, क्योंकि मैं अपने विषय और धर्म का सम्मान करता हूं.”

अश्विन अपनी किताब लिखने से पहले कम से कम दो साल रिसर्च करते हैं.

उन्होंने बताया, “ ऐतिहासिक बातों में एक से ज़्यादा दृष्टिकोण हो सकते हैं. इसलिए मेरी किताब के अंत में रिसर्च के संदर्भ की सूचि भी होती है. मैं हमेशा कहता हूं कि मेरी किताब, इतिहास या पौराणिक कथा नहीं है, बस कहानी है.”

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देश में बढ़ती असहिष्णुता के बारे में अमिष ने कहा, “अवॉर्ड लौटाने वाले लेखक देश के प्यार को ठुकरा रहें हैं. देश में संवेदनशील घटनाएं हुई हैं, लेकिन सिर्फ़ इसलिए सवा सौ करोड़ देशवासियों को असहिष्णु नहीं कहा जा सकता. जिन्होंने ग़लत किया है उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. धर्म या पंथ के नाम पर हमारे देश में कोई असहिष्णुता नहीं है."

तो अश्विन ने कहा, “असहिष्णुता किस देश में नहीं है? अमरीका में रंगभेदी हिंसा का प्रमाण आज भी मिलता है लेकिन हम उसे असहिष्णु या रंगभेदी देश नहीं कहते. हमारे देश में सती प्रथा भी थी लेकिन ऐसी कई चीज़ों को भूलकर हम कहें कि डेढ़ साल में अचानक से असहिष्णुता बढ़ गई है, तो वह ग़लत है. ऐसा कहकर हम अपने देश का सम्मान घटा रहे हैं.”

कुछ बेस्ट सेलर लेखक राजनीति में या फ़िल्म-टीवी में रुचि रखते हैं, लेकिन अमिष और अश्विन कभी इस ओर ध्यान नहीं देते हैं.

अमिष कहते हैं, “में धार्मिक किताबें लिखता हूं पर राजनीति पर कभी भी टिप्पणी नहीं करता. राजनीति को समझने वाले मुझसे बेहतर लोग हैं, जिन्हें हम रोज़ टीवी पर देखते हैं. मैं न तो किसी पक्ष का समर्थन करता हूं और न किसी का विरोधी हूं.”

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अश्विन बताते हैं, “मेरी किताबों में करंट एफ़ेयर्स की बात भी होती है, 'चाणक्याज़ चैंट' में राजनीति की पृष्ठभूमि पर कहानी है. मुझे जो कहना होता है, मैं अपनी किताबों के ज़रिए कह देता हूं. अपनी रचनात्मकता को मैं पब्लिसिटी या मीडिया में दिखाने के लिए ज़ाया नहीं करता.”

ऐसा करने वाले दूसरे लेखकों के बारे में पूछने पर अमिष और अश्विन एक स्वर में कहते हैं, “सब की सोच अलग होती है, जिनको जो करना है वो करें, यह तो आज़ाद देश हैं.”

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अमिष अपनी किताबों के बीच में होने वाले लंबे अंतराल के बारे में कहते हैं कि, “तैयारी करने में वक़्त लग जाता है. मेरी किताबें थोड़ी लंबी भी होती हैं, यह अंतराल पाठकों की उत्सुकता बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि मेरे लेखन कार्य की वजह से होता है.”

अश्विन की अगली किताब ‘सियालकोट सागा’ 2016 में प्रकाशित होगी. यह किताब उनकी बाक़ी किताबों से अलग है.

अश्विन का कहना है, “इसमें प्राचीन इतिहास का संदर्भ है लेकिन पृष्ठभूमि में 1947 के बाद का भारत है. यह एक फ़ास्ट पेस नॉवेल होगी.”

आसान अंग्रेज़ी में लिखने से लेखक जल्दी प्रसिद्ध होते रहें है, ऐसे आरोप के जवाब में अमिष बताते हैं, “अंग्रेज़ी बहुत लचीली भाषा है और उसे समझना आसान है. भारतीय भाषाओं के नियम ही उनकी सुंदरता भी हैं और कठिनाई भी, यहां जोड़-तोड़ मुश्किल है."

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क़िस्सागोई में माहिर अश्विन नए लेखकों के लिए कहते हैं, “अगर आप शब्दों के खेल में फसेंगे तो अच्छे लेखक नहीं बन पाएंगे. आप बस अच्छी कहानी लिखें, आपका काम हो जाएगा.”

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