तसलीमा को दिल्ली में भी घर मयस्सर नहीं

बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन का कहना है कि दिल्ली में भी उन्हें मकान किराए पर नहीं मिल पा रहा है.

बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में इसके बारे में उनका कहना था, ''मैं जिस अपार्टमेंट में रहती हूं, उसकी लीज़ ख़त्म हो रही है और मुझे वो अपार्टमेंट खाली करना है. पर अब मुझे कोई मकान मालिक अपना मकान किराए पर नहीं देना चाहता. एक तो, उन्हें पुलिस का रहना पसंद नहीं है, जो मेरे संरक्षण में लगातार आसपास रहती है. फिर सभी को ये डर लगता है कि अगर मुझ पर कोई आतंकवादी हमला हुआ तो उसके शिकार वो भी हो सकते हैं.''

तसलीमा ने कहा कि इस सिलसिले में वो केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी से मिली, लेकिन उन्हें लगता है अब ऱाजनाथ सिंह भी उनकी मदद नहीं करना चाहते हैं.

बीबीसी हिंदी ने अपनी ख़ास पेशकश #100Women सिरीज़ के लिए तसलीमा नसरीन को सोमवार को अतिथि संपादक के तौर पर आमंत्रित किया.

इसकी वजह मीडिया में दुनिया की आधी आबादी यानी महिलाओं की भूमिका पर चर्चा करना है.

वे आज दिन भर बीबीसी हिंदी का संपादकीय एजेंडा तय कर रही हैं, बीबीसी हिंदी वेबसाइट के लिए ख़बरें चुन रही हैं और साथ ही रेडियो कार्यक्रम दिनभर के लिए भी ख़बरों का चयन करेंगी.

इस मौक़े पर उन्होंने बीबीसी के सभी लोगों से मुलाक़ात की और कुछ सवालों के जवाब भी दिए. पेश है तसलीम नसरीन से बातचीत के कुछ अंश.

क्या आप दिल्ली में सुरक्षित महसूस करती हैं?

मुझे यहां रहना बहुत पसंद है लेकिन मैं सुरक्षित महसूस नहीं करती. मेरे पास यूरोप, स्वीडन और अमरीका का वीज़ा है लेकिन मुझे दिल्ली में रहना पसंद है. लेकिन मैं घर लौटना चाहूंगी. मैं किसी भी देश में रुढ़िवाद के ख़िलाफ़ हूं.

पिछले महीनों में भारत में जो असहनशीलता की घटनाएं हुई हैं, उस पर आपका क्या कहना है?

बेशक यहां असहनशीलता बढ़ रही है. बहुत से बुद्धिजीवियों और लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाए हैं, जो विरोध जताने का अच्छा तरीक़ा है. लेकिन मुझे ये सोच कर अजीब लगता है कि जब मुझे पश्चिम बंगाल से निकाला गया, कोलकाता टीवी के लिए मैंने जो मेगासीरियल लिखा था उसे बैन कर दिया गया, तो किसी बुद्धिजीवी ने इस तरह विरोध ज़ाहिर नहीं किया. भारत में मुझे लगता है कि लेखक और बुद्धिजीवी यहां मुस्लिम रूढ़िवाद की अपेक्षा हिंदू रूढ़िवाद के ख़िलाफ़ ज़्यादा हैं. शायद इसलिए कि उन्हें लगता है कि मुसलमान यहां अल्संख्यक हैं और उन्हें सुरक्षा की ज़्यादा ज़रूरत है.

भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए और नारीवाद के क्षेत्र में बहुत कुछ हो रहा है. इसके बारे में आपका क्या कहना है?

मुझे नहीं लगता कि भारत में नारीवाद बहुत मज़बूत है. ये एक बहुत सख़्त पुरुषवादी समाज है. पुरुष और स्त्री दोनों यहां महिला द्वेषी है. यहां बहुत ज़रूरी है कि नारीवादी आंदोलन ज़ोर पकड़े, क्योंकि यहां महिलाओं काफ़ी उत्पीड़ित हैं.

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क्या भारत की नई मोदी सरकार से आपको कोई खास उम्मीद थी?

मेरे लिए हरेक सरकार एक जैसी ही है. 2005 में यूपीए सरकार के तहत मुझे आवास परमिट दिया गया. लेकिन 2008 में उसी सरकार को ये परमिट देने में समस्या हुई. पिछले दो साल में मेरे साथ अजीब वाकए हुए. मुझे सिर्फ दो महीनों का आवास परमिट मिला. मैं इस सिलसिले में राजनाथ सिंह से मिली. उन्होंने कहा कि मैं आपको पचास साल का आवास परमिट दे देता हूं. मैंने कहा मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए, बस, भारत में आवास परमिट मिलता रहे. उन्होंने एक साल के परमिट को मंज़ूरी दे दी. एक बार फिर मुझे परमिट के लिए दो महीने इंतज़ार करना पड़ा. मुझे खुशी होगी अगर भारत सरकार मुझे आवास परमिट देती रहे.

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