'नाजन्म क्रांति विश्वव्यापी आत्महत्या की पैरवी'

महिला विमर्श इन दिनों एक चुस्त और पॉलिटिकली करेक्ट चीज़ बनती जा रही है.

तस्लीमा नसरीन का लेख इसका गवाह है कि सचमुच महिलाओं के जीवन से उपजे जटिल सवालों को धीरज के साथ गुन कर उनका विवेकी हल खोजने के बजाय नारीवाद के कई समर्थक लगातार आतिशबाज़ी सी फुरहरी पैदा करने वाली क्रांतियों के लिए पलीता लिए फिर रहे हैं, भले ही तर्क की ज़मीन पर उतरते ही उनके अंगारे उगलते अनार और हवाई बाण फुस्स क्यों न हो रहें.

एक नारी विरोधी समाज में लगातार अपमानित प्रताड़ित महिलाओं को अजन्म, यानी बच्चे जनने से कतई परहेज़ रूपी महान क्रांति शुरू कर देनी चाहिए, का क्रूरता की हद तक अवयस्क विचार इसी श्रेणी का है.

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बेशक हमारे समाज में महिला विरोधी हिंसा बढ़ी है. हर कहीं फैलती कन्या भ्रूण हत्या उसी का चरम रूप है.

लेकिन क्या महिलाओं के जीवन में बदलाव नहीं आया? ऐसा भी नहीं है.

दरअसल कई बुनियादी बदलाव हमारे जैसे समाजों में बिना शोर-शराबे के मंथर गति से लगातार होते रहे हैं.

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मसलन क्या आप उस क्षण पर उंगली रख सकते हैं जब हमारी करोड़ों महिलाओं के लिए बिना धर्मगुरुओं से विमर्श किए मैरिज ब्यूरो या अख़बारी विज्ञापनों से अंतर्जातीय रिश्ते तय करना, सेलफ़ोन की मार्फ़त बेझिझक बात करना, होटल का खाना खाना या पढाई के लिए अकेले दूसरे शहर या विदेश जाना संभव ही नहीं, बल्कि सहज काम्य बन गया?

कब गाँव-क़स्बे की स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों ने बिना शर्मसार हुए सैनिटरी नैपकिन ख़रीदना, रिक्शे के बग़ल में साइकिल सवार पुरुष रिश्तेदार के बिना ख़ुद अपनी साइकिल या स्कूटी चलाकर शिक्षण संस्थानों तक आना-जाना शुरू किया और छह गज़ी साड़ी पहनकर बस या रेल से सफ़र करना ख़ुद-ब-ख़ुद ग़ायब हो गया?

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आधी आबादी की सहज मानवीय गरिमा और अधिकारों की बहाली की प्रक्रिया में जो कई अप्रिय द्वंद और अंतर्द्वंद्व हम महिलाओं और शेष समाज के बीच जी और देख रहे हैं, वह कहीं हज़ारों साल पुराने राज समाज के इतिहास की मंथर गति से आ रही तब्दीलियों का एक अनिवार्य हिस्सा भी है. उससे बचना संभव नहीं.

ज़रूरत समझदारी की है, धीरज और संयम की है, जो इन कठिन क्षणों में राह से भटकने से रोकें.

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हमारा हज़ारों साल पुरानी लैंगिक विषमता से धीमे-धीमे उबरता इतिहास जितना महिलाओं को खींच रहा है, उतना ही पुरुषों को भी. और बदलाव की यह लड़ाई जितनी बाहरी समाज में लड़ी जा रही है, उतनी ही (हर आय और आयुवर्ग के) स्त्री-पुरुषों के निजी अंतर्मनों को भी दिन-रात मथ रही है.

यह एक मानव केंद्रित प्रक्रिया है, और मानव मन की तरह इसमें पेंच ही पेंच हैं. इन विषम क्षणों में यह कहना कि औरतें बच्चे पैदा करना बंद कर महिला अवमानना के दोषी समाज को सबक सिखाएं, ग़ैर ज़िम्मेदाराना है.

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समाज तो फिर भी एक किस्म की निरंकुशता पर ही जीता रहेगा. नारी प्रताड़ना किसी व्यक्ति या संस्था विशेष नहीं, कई-कई अमूर्त पूर्वाग्रहों की भी उपज है.

इसलिए तमाम तरह के अमूर्तनों के ख़िलाफ़ महिलाओं को ऐसा क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने को कहना, जो उनकी नैसर्गिक और दुर्लभ प्रजनन क्षमता को नष्ट किए बिना नहीं लड़ा जा सकता, विश्वव्यापी आत्महत्या की पैरवी करना है.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं)

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