जब 'अंकल' हो जज तो फिर..

कहते हैं क़ानून अंधा होता है लेकिन शायद तब नहीं, जब जज मुक़दमे की पैरवी कर रहे वकील के रिश्तेदार या परिचित हों. इस चलन को 'अंकल जज' कहा जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों न्यायपालिका में सुधार के लिए सुझाव मांगे थे. इसके बाद गुजरात बार काउंसिल ने 'अंकल जजों' के ख़िलाफ़ तत्काल कार्रवाई का सुझाव दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने आम लोगों से ऐसे सुझाव मांगे हैं जिनसे न्यायपालिका में जजों की मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया बेहतर बनाई जा सके.

कॉलेजियन प्रणाली के नाम से जानी जाने वाली इस प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के लिए जज चुनते हैं.

अंकल जज कौन हैं?

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

भारतीय विधि आयोग ने 2012 में सौंपी अपनी 230वीं रिपोर्ट में हाईकोर्टों में 'अंकल जजों' की नियुक्ति का ज़िक्र किया था.

रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर किसी जज का कोई रिश्तेदार या परिचित उस अदालत में बतौर वकील प्रैक्टिस कर रहा हो तो ऐसे जज को उस अदालत में नियुक्त न किया जाए.

संविधान के अनुच्छेद 217 के मुताबिक़ अगर कोई व्यक्ति 10 साल तक हाईकोर्ट या फिर लगातार दो या उससे ज़्यादा ऐसी अदालतों में वकील रहा है तो हाईकोर्ट में बतौर जज नियुक्ति के लिए उसके नाम पर विचार किया जा सकता है.

हालांकि मौजूदा नियमों के तहत ऐसी कोई बंदिश नहीं कि जज के परिवार का कोई सदस्य या फिर नज़दीकी रिश्तेदार उसकी अदालत में प्रैक्टिस नहीं कर सकता.

सिफारिश क्या है?

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में सुधारों के लिए सुझाव मांगे हैं

गुजरात बार काउंसिल ने सुप्रीम कोर्ट को छह सिफ़ारिशें भेजी हैं जिनमें 'अंकल जजों' की नियुक्ति का विरोध भी शामिल है.

गुजरात बार काउंसिल से जुड़े वकील दिपेन दवे कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट के जज और क़ानून मंत्री न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा बार-बार उठाते रहे हैं. न्यायपालिका में आम आदमी का भरोसा वापस क़ायम करने के लिए सुधार बहुत ज़रूरी हैं. हमने जो सिफ़ारिशें भेजी हैं, उनमें 'अंकल जजों' को हटाना और अदालत की समूची कार्यवाही को रिकॉर्ड करना भी शामिल है.''

हालांकि ये पहला मौक़ा नहीं जब किसी राज्य की बार काउंसिल ने 'अंकल जजों' का मुद्दा उठाया है. इससे पहले राजस्थान और इलाहाबाद बार काउंसिल भी ये कहते हुए इस मुद्दे को उठा चुकी हैं कि उनकी अदालतों में ऐसे दर्जन भर 'अंकल जज' मौजूद हैं.

जस्टिस एआर लक्ष्मणन ने 2009 की अपनी विधि आयोग की रिपोर्ट में सभी 'अंकल जजों' के तबादले की सख़्त सिफ़ारिश की थी.

गुजरात बार काउंसिल ने वेतन बढ़ाने की सिफ़ारिश भी की है.

क्या नुक़सान होगा?

Image caption पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री शांति भूषण मानते हैं कि अंकल जजों से अदालत की साख प्रभावित होती है.

पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री और जाने-माने वकील शांतिभूषण 'अंकल जजों' के चलन को देश की न्यायपालिका के लिए गंभीर ख़तरा बताते हैं.

उनका कहना है, ''ये बहस ईमानदार जजों को लेकर नहीं हो रही है. लेकिन भ्रष्ट जज उसी अदालत में पैरवी कर रहे अपने परिवार के सदस्यों का पक्ष लेते हैं. जब जजों के बहुत से बेटे या फिर रिश्तेदार उसकी अदालत में प्रैक्टिस कर रहे होते हैं तो जज एक दूसरे के रिश्तेदारों के पक्ष में फ़ैसले देकर एक दूसरे की मदद करते हैं.''

भूषण कहते हैं कि किसी वकील को उस अदालत में प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जहां उनके परिवार का कोई सदस्य या रिश्तेदार जज हों.

भूषण यह भी कहते हैं कि अभी ऐसा कोई विभाग नहीं है जो जजों के पूरे रिकॉर्ड या उनकी पृष्ठभूमि का हिसाब रखता हो.

उनके मुताबिक़, ''बहुत से योग्य वकील और जूनियर जज हैं, जिन्हें तलाशने और प्रमोशन देने की ज़रूरत है, लेकिन इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं है. सुप्रीम कोर्ट को एक ऐसा स्थायी सचिवालय बनाना चाहिए जिसके पास जजों से जुड़ी हर जानकारी हो. इसमें उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और अन्य आरोपों का ब्यौरा भी शामिल होना चाहिए.''

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार