#100Women समाज-सेवा से बदले जीवन (भाग-8)

#100Women में बीबीसी हिंदी ने चुनी हैं भारत की वो 100 दमदार औरतें, जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते खोले और मिसाल कायम कर दी, नहीं तो कम से कम समाज को झकझोरा तो है ही.

इस सिरीज़ में बात उन महिलाओं जो समाज-सेवा के ज़रिए लोगों के जीवन में बदलाव ला रही हैं.

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  • 100Women: Social Workers

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  • गीतांजली बब्बर

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    साढ़े तीन साल पहले गीतांजली बब्बर दिल्ली के यौनकर्मियों की बस्ती जी.बी. रोड में बदलाव की बयार लेकर आईं. उन्होंने यौनकर्मियों को पढ़ने लिखने के फायदे बताए और खुद उन्हें पढ़ाने लगी.

    कुछ समय बाद रितुमोनी दास भी उनकी इस मुहिम में जुड़ गईं. गीतांजली और रितुमोनी के प्रयास से सबसे बड़ा बदलाव यौनकर्मियों के बच्चों की ज़िंदगी में हुआ है.

    इनकी संस्था ‘कट-कथा’ ना केवल इन बच्चों को तालीम दे रही है बल्कि उनके रचनात्मक गुणों को उभार भी रही है.

    ‘कट-कथा’ के काम से अब जीबी रोड की यौनकर्मियों में एक चेतना भी विकसित हुई है और उनमें विश्वास जगा है कि वे भी अपनी पसंद और आकांक्षाओं के मुताबिक अपना जीवन जी सकती हैं.

  • ज्ञारसी बाई

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    राजस्थान के बारन ज़िले में ज्ञारसी बाई बीते दो दशक से सहारिया आदिवासी समुदाय के बंधुआ मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं.

    ज्ञारसी ख़ुद कभी स्कूल नहीं गईं और उनके पिता एवं पति भी दिहाड़ी मज़दूर हैं. लेकिन इससे ज्ञारसी बाई की हौसले में कोई कमी नहीं आई.

    दो दशक के सफ़र में ज्ञारसी बाई ने महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ हमेशा आवाज़ उठाई है. उन्होंने अपने समुदाय की महिलाओं में जागरूकता के स्तर को बढ़ाया है.

    ज्ञारसी बाई ने सहारिया आदिवासी समुदाय की लड़कियों को पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित किया. उनकी संस्था ‘जागृत महिला संगठन’ का आदिवासी महिलाओं को सशक्त करने में अहम योगदान रहा है.

  • जाह्नवी गोस्वामी

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    असम की जाह्नवी 17 साल की उम्र में एचआईवी से संक्रमित हो गईं थी. यह संक्रमण उनतक उनके पति से पहुंचा था और डॉक्टरों के मुताबिक वे महज़ तीन महीने की मेहमान थीं.

    आज जाह्नवी 36 साल की हैं और एड्स के ख़िलाफ़ मुहिम चला रही हैं. उनके पति और दो साल की बच्ची की तो मौत हो गई, लेकिन जाह्नवी ने दुनिया को एपने एचआईवी पॉजिटिव होने के बारे में बताया और दूसरे लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बन गईं.

    उन्होंने 2002 में ‘असम नेटवर्क ऑफ़ पॉजिटिव पीपल’ नामक संस्था शुरू की. यह संस्था एड्स पीड़ितों के लिए मुफ़्त में काउंसलिंग का काम करती हैं. इस नेटवर्क के 50 सक्रिय सदस्य हैं जो एचआईवी और एड्स पीड़ितों की देखभाल का काम देखती है.

  • कृति भारती

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    जोधपुर की 28 वर्षीय कृति भारती बाल विवाह मुक्त राजस्थान के लिए काम कर रही हैं.

    देश में पहली बार किसी बाल विवाह को कानूनन निरस्त करवाने की उनकी उपलब्धि 2013 में ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स’ और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी दर्ज की गई है.

    बाल विवाह रुकवाने और और कानूनन निरस्त करवाने की मुहिम में उनपर कई बार हमले भी हुए हैं, लेकिन उनके हौसले कायम हैं.

    कृति ने 2011 में ‘सारथी ट्रस्ट’ की स्थापना की और बाल संरक्षण और सुरक्षा पर पीएचडी भी कर रही हैं.

    कृति को मारवाड़ रत्न, महाराणा मेवाड़, वीर दुर्गादास राठौड़ सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं.

    कृति अपनी माँ के साथ रहती हैं जिन्होंने उन्हें अकेले पाल-पोस कर बड़ा किया.

  • मार्था डोडराय

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    स्वास्थ्य कार्यकर्ता मार्था डोडराय बिहार के दरभंगा ज़िले के कुशेश्वरस्थान प्रखंड प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एएनएम के रूप में तैनात हैं.

    45 साल की मार्था जिस इलाके में काम करती हैं वहां नदियों और जल जमाव के कारण पक्की सड़कें नहीं हैं लेकिन बीते दस सालों के दौरान मार्था ने मीलों पैदल चलकर, नाव चलाकर, कच्ची पक्की सड़कों पर सफर करते हुए पोलियो उन्मूलन में अहम भूमिका निभाई है.

    2013 में दुनिया भर में पोलियो उन्मूलन के काम में जुटी 22 लाख से अधिक फ्रंटलाइन पोलियो वर्कर्स में से मार्था को ‘ग्लोबल लीडरशिप अवार्ड’ के लिए चुना गया.

    मार्था को उनके काम की बदौलत भारत सरकार और बिहार सरकार से भी सम्मान मिल चुके हैं.

  • मीरा बडवे

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    मीरा बडवे बीते दो दशकों से नेत्रहीन बच्चों के भविष्य को संवारने के काम में जुटी हैं.

    पुणे के पास विद्यानगर में मीरा ने अपने घर में ही ‘निवांत अंध मुक्त विकासालय’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य नेत्रहीन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है.

    इस केंद्र से निकले बच्चे नृत्य, संगीत से लेकर सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग तक में अपना करियर बना रहे हैं, बेकरी चला रहे हैं, लाइब्रेरी संभाल रहे हैं.

    कई बच्चे बैंकिंग और इंश्योरेंस सेक्टर में काम कर रहे हैं. यहां से निकले बच्चे चॉकलेट की फैक्टरी और सॉफ्टवेयर फर्म भी चला रहे हैं.

    मीरा बडवे ने ब्रेल लिपि की 3,000 किताबों की लाइब्रेरी भी बनाई है. उनकी कोशिशों को 40 से ज़्यादा सम्मान मिल चुके हैं.

  • नलिनी शेखर

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    कर्नाटक के बेंगलुरु में कूड़ा बीनने वालों की जीवन को नलिनी शेखर ने बदल डाला है. आज कूड़ा बीनने वालों के पास उनका परिचय पत्र है.

    इस पर बृहत बेंगलुरु नगर पालिका के कमिश्नर के हस्ताक्षर हैं और पुलिस इन्हें परेशान भी नहीं करती है. ये कूड़ा बीनने वाले ‘ग्रीन पार्टी’ के सदस्य हैं, इनके बीने हुए कूड़ों से रिसाइक्लिंग उद्योग भी चलता है.

    ग्रीन पार्टी की स्थापना नलिनी शेखर ने 2010 में की. नलिनी ने अमरीका से लौटकर कूड़ा बीनने वालों के साथ काम करने का फ़ैसला लिया.

    नलिनी ने पाया कि कूड़ा बीनने वालों से रिसाइक्लिंग इंडस्ट्री में दूसरे लोगों को 22 तरह की नौकरियां मिल सकती हैं. इससे बेंगलुरु की नगरपालिका को करोड़ों रुपये की बचत होती है.

  • राजकुमारी देवी

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    बिहार के मुज़फ्फरपुर की 60 साल की राजकुमारी देवी पूरे बिहार में किसान चाची के तौर पर मशहूर हैं.

    1996 में उन्होंने अपने ढाई बीघे खेत में सब्ज़ी और फलों की खेती शुरू की. खेती किसानी से जुड़े लघु उद्योगों को उन्होंने महिला सशक्तिकरण का ज़रिया बनाया.

    30 किलोमीटर के दायरे में महिलाओं को खेती-किसानी के गुर बताने के लिए राजकुमारी देवी साइकिल से चलती हैं.

    300 से ज़्यादा महिलाओं को प्रेरित कर राजकुमारी देवी ने स्वयंसेवी समूह बनाया है.

    यह तरह-तरह के अचार तैयार करता है और 10 क्विंटल अचार सालाना देश भर के मेलों में बेचता है. 2007 में राजकुमारी देवी को बिहार सरकार ने ‘किसान श्री’ का सम्मान दिया.

  • शुभाशिनी मिस्त्री

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    Sania Mirza

    1971 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले के हंसपुकुर गांव में दिहाड़ी मज़दूर सधान मिस्त्री की डायरिया से मौत हो गई. पत्नी शुभाषिनी पर चार छोटे-छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गई और पास में थे महज़ 75 पैसे.

    लेकिन शुभाषिनी ने उसी दिन सोच लिया कि ग़रीब आदमी की इलाज ना मिलने की वजह से मौत नहीं होनी चाहिए.

    उन्होंने दिहाड़ी मज़दूरी कर अपने बेटे को डॉक्टर बनाया और बेटे के साथ मिलकर गांव के ग़रीब लोगों के लिए हंसपुकुर गांव में 1993 में ह्युमैनिटी अस्पताल बनाया.

    एक अस्पताल पर ज़्यादा दबाव पड़ने लगा तो आम लोगों की मदद से शांतिगाछी में दूसरा अस्पताल बनाया गया.

    शुभाषिनी 70 साल को पार कर चुकी हैं लेकिन हर ग़रीब तक इलाज़ पहुंचाने के मिशन में अब भी जुटी हैं.

  • उमा चैटर्जी

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    कोलकाता की उमा चैटर्जी ने तीन साल पहले बहला फुसलाकर कर देह व्यापार में धकेले जाने वाली और उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की मदद के लिए ‘संजोग’ की शुरुआत की.

    उनकी संस्था पीड़ितों को इस सदमे से उबरने में मदद करती है, ढाढ़स बंधाती है और उनकी ज़िंदगी को पटरी पर लाने का हर संभव प्रयास करती है.

    उमा पीड़िताओं की आवाज़ सरकारी मंचों तक पहुंचाने की कोशिश भी करती हैं ताकि सरकार उनकी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कानूनी प्रावधान बनाए.

    बांग्लादेश से भारत लाई जाने वाली युवतियों और महिलाओं के लिए भी उमा की संस्था काम करती रही है.

    उमा खुद मनोचिकित्सक भी रही हैं, लिहाजा वह महिलाओं के साथ हुए उत्पीड़न को बखूबी समझती हैं.

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