#100Women निडर सोच, ख़ूबसूरत कला (भाग-9)

  • 30 नवंबर 2015

#100Women में बीबीसी हिंदी ने चुनी हैं भारत की वो 100 दमदार औरतें, जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते खोले और मिसाल क़ायम कर दी और समाज को झकझोरा है.

इस सीरीज़ में बात उन महिलाओं की जिन्होंने कला के क्षेत्र में ऊंचाई छूई और अपने काम के ज़रिए समाज में नए विचार और बहस शुरू की.

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  • 100 Women: Artists

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  • अनविता दत्त

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    14 सालों तक विज्ञापन की दुनिया में काम करने और फ़िल्मों में काम करने के ख़्वाब देखने के बाद अनविता दत्त को 2006 में बॉलीवुड में ब्रेक मिला. पिछले दशक के करियर में अनविता ने लोकप्रिय गीतों से लेकर दमदार डॉयलाग तक लिखे हैं.

    अनविता आदित्य चोपड़ा, करण जौहर और विक्रमादित्य मोटवाने सहित प्रमुख निर्माताओं के साथ काम कर चुकी हैं. उनका काम पॉपुलर भी हुआ है और सराहा भी गया है.

    बॉलीवुड में बतौर लेखक, महिलाएं कम ही हैं. लेकिन अनविता के मुताबिक इसका कतई ये मतलब नहीं कि इस काम में कोई लिंगभेद है या वहां पुरुषों का वर्चस्व है. उनका कहना है, 'फ़िल्मों में ना कोई पुरुष लेखक होता है, ना महिला लेखक, बस लेखक होते हैं.'

    वह अपने काम को जेंडर के चश्मे से देखा जाना पसंद नहीं करतीं. वह कहती हैं, 'बॉलीवुड ऐसी इंडस्ट्री है, जहां आपको क्षमता की बदौलत काम मिलता है, जेंडर की बदौलत नहीं.'

  • बेबी हल्दर

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    भारत प्रशासित कश्मीर में पैदा हुईं बेबी हल्दर, शायद पहली ऐसी महिला हैं जिन्होंने एक घरेलू कामगार होने के बावजूद अपनी आत्मकथा लिखी.

    एक ग़रीब परिवार में पली-बढ़ीं बेबी ने सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की. मां के गुज़रने के बाद पढ़ाई छूट गई. 13 साल की उम्र में पश्चिम बंगाल में शादी हुई. 14 साल में वो मां बन गईं और घर का खर्च चलाने के लिए दूसरों के यहां काम करना पड़ा.

    पति के बुरे बर्ताव की वजह से उन्होंने घर छोड़ दिया और दिल्ली आ गईं. दिल्ली में ऐसे शख़्स के घर काम मिला जिन्होंने बेबी को उनकी ज़िंदगी के बारे में लिखने को प्रेरित किया. यही संस्मरण ‘आलो अंधारी’, के तौर पर प्रकाशित हुई.

    अब तक उनकी आत्मकथा 26 भाषाओं में छप चुकी है. इसके बाद वो दो और किताबें लिख चुकी हैं. अब बेबी एक सामाजिक सरोकार से जुड़ी संस्था में काम कर रही हैं.

  • कुट्टी रेवती

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    तमिल साहित्य जगत और विश्व साहित्य के बीच कविताओं और राजनीति की दुनिया में कुट्टी रेवती ने अपनी नई पहचान बनाई है.

    वे महिलाओं के शरीर और उस पर होने वाली राजनीति, जिसपर तमिल साहित्य जगत मौन ही रहा है, पर काफी मुखरता से अपनी बात कहती हैं.

    महिलाओं, दबे- पिछड़ों के अलावा कुट्टी दलितों के हितों के लिए भी आवाज़ उठाती रही हैं.

    महिलाओं के लेखन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने तमिल साहित्य में औरतों के लेखन का त्रैमासिक, ‘पानीकुडम’ शुरू किया.

    इस पत्रिका में महिलाएं परिवार, राजनीति और कारोबार के मुद्दे पर लिखती हैं.

    कुट्टी अब तक आठ कविता संकलन और छह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बना चुकी हैं. वे एआर रहमान के लिए भी गीत लिख चुकी हैं.

    कुट्टी रेवती पेशे से सिद्ध चिकित्सिका भी हैं और तमिल फ़िल्मों के लिए स्क्रिप्ट और गीत भी लिख रही हैं.

  • माहबानो मोदी

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    महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर ईव इंसलर के बहुचर्चित नाटक ‘द वेजाइना मोनोलॉग्स’ को भारत में पहले पहल लाने का साहस किया था माहबानो मोदी ने.

    वेजाइना (योनि) के माध्यम से स्टेज पर यौनिकता, यौन हिंसा और औरतों के शरीर पर खुली चर्चा साल 2003 में भारतीय समाज के लिए क्रांतिकारी कदम था.

    लेकिन माहबानो अपने बेटे डॉ. कैज़ाद कोतवाल के साथ ना केवल इस नाटक को भारत में लेकर आईं बल्कि इसे अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी मंचित करने का साहस दिखाया.

    बीते 12 सालों से माहबानो इस नाटक की निर्माता, निर्देशक और अभिनेत्री की भूमिका निभा रही हैं.

    माइक्रोबॉयलॉजी-केमेस्ट्री और जियोलॉजी-केमेस्ट्री में उच्च शिक्षा प्राप्त कर माहबानो अमरीका में अपने सफल करियर को छोड़कर महाराष्ट्र में महिलाओं को जागरूक बनाने और प्रताड़ना की पीड़ित महिलाओं के लिए पैसा इकट्ठा करने के काम में जुटी हैं.

    उन्होंने ‘ब्लैक’, ‘बुड्ढा मर गया’, ‘शिरीन फरहाद’ समेत भारत और विदेश की कई फ़िल्मों में काम किया है.

  • मीना कंडसामी

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    मीना कंडसामी कवियत्री हैं, लेखिका हैं और आंदोलनकारी भी. वह जाति उन्मूलन, भाषाई पहचान और महिलाओं के मसले पर साहस और मुखरता के साथ अपनी बात रखती हैं.

    उनके दो कविता संग्रह 'टच' और 'मिस मिलिटेंसी' और एक उपन्यास 'द जिप्सी गॉडेस' प्रकाशित हो चुके हैं.

    मीना केंट यूनिवर्सिटी में ‘ब्रिटिश काउंसिल-चार्ल्स वॉलेस इंडिया ट्रस्ट फेलो’ रह चुकी हैं.

    इतना ही नहीं आयोवा यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम, 2009 की सबसे कम उम्र की ‘राइटर-इन-रेज़ीडेंस’ रहीं थीं.

    मीना पीटसबर्ग के ‘सिटी ऑफ़ असायलम जैज़ पोएट्री कंसर्ट’ और 14वें ‘पोएट्री अफ़्रीका इंटरनेशनल फेस्टिवल’ में भी कविता पढ़ चुकी हैं.

    मीना केरल के दलित क्रांतिकारी अयंकली की आत्मकथा की सह-लेखिका हैं और इससे पहले द्विमासिक अंग्रेज़ी पत्रिका, ‘द दलित’ की संपादक रही हैं.

  • मिठू सेन

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    मिठू सेन शांति निकेतन और ग्लासगो स्कूल ऑफ़ आर्ट से पढ़ी हुई कलाकार हैं.

    मिठू के काम का दायरा विशाल है, जो चित्रकला, वीडियो, स्थापत्य, इंस्टॉलेशन, कविता, साउंड और परफॉर्मेंस तक फ़ैला हुआ है.

    वे अपनी कला के ज़रिए यौनिकता, राजनीतिक, क्षेत्रीय, भावनात्मक और भाषाई पहचान से जुड़े मसलों पर समाज द्वारा थोपे जा रहे रवैये पर सवाल उठाती हैं.

    उनकी कई कलाकृतियों में कामुकता मुखर हो कर उभरती है. इस बहाने मिठू लोगों को जटिल मुद्दों पर सोचने पर विवश करती हैं.

    मिठू के कला की प्रदर्शनी दुनिया भर की प्रमुख आर्ट गैलरियों में लग चुकी है.

    इसके अलावा उन्हें समकालीन एशियाई कला के लिए 2015 का ‘प्रूडेंशियल आई अवॉर्ड’ और 2010 में समकालीन भारतीय कला का ‘स्कोडा अवॉर्ड’ मिल चुका है.

  • निशा पाहूजा

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    ‘एम्मी’ सम्मान के लिए नामांकित निशा पाहूजा, दिल्ली में जन्मी और टोरंटो में पली बढ़ी हैं. उन्होंने डॉक्यूमेंट्री रिसर्चर के तौर पर शुरुआत की, लेकिन जल्दी ही वह फ़िल्ममेकर बन गईं.

    उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्में ‘बॉलीवुड बाउंड’ जेमिनी सम्मान के लिए नामांकित हुई और हीरे के कारोबार पर बनी फिल्म 'डायमंड रोड' ने ये सम्मान हासिल किया.

    लेकिन उनकी तीसरी फिल्म 'द वर्ल्ड बिफ़ोर हर' सबसे असरदार रही. ये फ़िल्म दो लड़कियों की कहानी है, जिसमें एक मिस इंडिया का ख़िताब जीतना चाहती हैं और दूसरी हिंदू राष्ट्रीय संगठन दुर्गा वाहिनी कैंप से जुड़ी हैं.

    इन दोनों कहानियों पर बनी ये फ़िल्म दुनिया भर के 130 फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी है. ‘ट्रिबेका फ़िल्म समारोह’, 2012 में इसे ‘बेस्ट डॉक्यूमेंट्री’ का पुरस्कार भी मिला.

    निशा पाहूजा अब इस फिल्म को भारत में दिखाने के अलावा पुरुषत्व के मुद्दे पर अपनी अगली फिल्म, 'सेंड अस यॉर ब्रदर' पर काम कर रही हैं.

  • पारो आनंद

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    भारत की शीर्ष लेखिकाओं में एक हैं पारो आनंद, जो मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे किशोरों पर विस्तार से लिखती रही हैं.

    पारो आनंद रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए 'लिट्रेचर इन एक्शन' नाम से कार्यक्रम चलाती हैं.

    उनका उपन्यास ‘नो गन्स ऐट माय सन्स फ्यूनरल’, हिंसा के बीच बढ़ते हुए एक किशोर की कहानी है. इसे ‘आईबीबीवाय ऑनर लिस्ट’, 2006 में शामिल किया गया था.

    इस उपन्यास पर फ़िल्म बन रही है और इसका जर्मन और स्पैनिश भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है.

    पारो ‘राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र’ की प्रमुख भी रह चुकी हैं. उन्होंने 3,000 बच्चों की मदद कर दुनिया का सबसे लंबा समाचार पत्र भी तैयार करवाया है, जो एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है.

    बच्चों के लिए साहित्य में पारो के योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका है.

  • प्रकृति करगेती

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    प्रकृति करगेती मौजूदा दौर की उभरती हुई कवियत्री हैं. दसवीं के बाद कविता लिखने का उनका दौर शुरू हुआ जो दिल्ली में कई पोएट्री क्लब से जुड़ने के बाद बढ़ता ही गया.

    उनकी कविताएं ‘हंस’, ‘आलोचना’ और ‘पब्लिक एजेंडा’ जैसी हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. हंस में प्रकाशित उनकी पहली ही कविता ‘उग्रवाद’ ने लोगों का ध्यान खींचा था.

    ‘उग्रवाद’ का विषय था माहवारी चक्र, लेकिन प्रकृति ने इसे ख़ूबसूरती से उग्रवाद की क्रांति के साथ जोड़ दिया.

    पेशे से टीवी पत्रकार, प्रकृति कविताओं के माध्यम से जो बात नहीं कह पातीं, उसे लघु कथाओं के ज़रिए भी कह रही हैं.

    हंस के जनवरी, 2015 अंक में छपी उनकी कहानी को ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ मिला है.

  • उर्मिला पवार

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    महाराष्ट्र के कोंकण में एक दलित परिवार की उर्मिला पवार अपने विद्रोही लेखन के लिए जानी जाती हैं.

    उनकी आत्मकथा 'आयदान' को मराठी साहित्य में बेहद अहम माना जाता है और यह 2009 से ये अमरीका के कोलंबिया विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम का हिस्सा है. इसका अंग्रेज़ी और स्वीडिश भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है.

    उनकी इस आत्मकथा को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. इतना ही नहीं उर्मिला ‘महाराष्ट्र साहित्य परिषद’ पर वर्णवाद का आरोप लगाते हुए उनके 'लक्ष्मीबाई तिलक पुरस्कार' को नकार चुकी हैं.

    आंबेडकरवादी आंदोलन में महिलाओं के सहभाग पर मीनाक्षी मून के साथ लिखा उनका ग्रंथ 'हमने भी इतिहास रचा' मील का पत्थर माना जाता है. उसके बाद उनकी कई एकांकिकाएं, समीक्षा और कथालेखन प्रकाशित हो चुके है.

    पिछले साल उनकी आत्मकथा पर उसी नाम से एक नाटक भी मंचित किया गया है.

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