आईएस क्या जाने किस क़ाबिल हैं भारतीय लड़ाके

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कुछ दिन पहले मैंने एक ख़बर देखी और मैं हैरान रह गया.

इसमें कहा गया कि इस्लामी चरमपंथी संगठन आईएस भारत सहित दक्षिण एशियाई मुसलमानों को सीरिया और इराक़ जैसे संकटग्रस्त क्षेत्रों में लड़ने के क़ाबिल नहीं समझता और अरब लड़ाकों के मुक़ाबले उन्हें कमतर आंकता है.

रिपोर्ट में बताया गया था कि इसी वजह से दक्षिण एशियाई मुसलमान लड़ाकों को छोटे समूह में रखा जाता है और अरब लड़ाकों के मुक़ाबले उन्हें कम वेतन मिलता है. यही नहीं, उन्हें अच्छे हथियार भी नहीं दिए जाते हैं.

यह बात एक विदेशी एजेंसी की ओर से तैयार की गई ख़ुफ़िया रिपोर्ट में सामने आई है, जिसे भारतीय एजेंसियों के साथ भी साझा किया गया है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के साथ-साथ नाइजीरिया और सूडान जैसे देशों के लड़ाकों को अरब लड़ाकों के मुक़ाबले कमतर समझा जाता है.

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मैं नाइजीरिया और सूडान में हुए संघर्षों के बारे में तो ज़्यादा नहीं जानता हूं, लेकिन मैं अरबों को यह ज़रूर बताना चाहता हूं कि लड़ने के मामले में भारतीय उपमहाद्वीपीय के लोगों का इतिहास उनसे कहीं बेहतर रहा है.

एक तरह से तो यह अच्छा ही है कि अरब इन लोगों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य ही ग़लत है. लेकिन दूसरी ओर, पाठकों के लिए इतिहास जानना दिलचस्प हो सकता है ताकि बात साफ़ रहे.

इतिहास में पेशेवर भारतीय लड़ाकों का ज़िक्र सबसे पहले 479 ईसा पूर्व में ग्रीस में आता है जब प्लातिया का युद्ध ईरानियों और ग्रीक सिटी स्टेट के बीच लड़ा गया था.

इतिहासकार हेरोडोटस हमें दोनों पक्षों की विभिन्न संरचनाओं के बारे में बताते हैं. वो ये भी बताते हैं कि फ़ारसी राजा ज़रक्सिज़ ने भारतीय लड़ाकों को भाड़े पर लिया था.

मैंने बहुत दिन पहले एक किताब पढ़ी थी लेकिन मुझे याद नहीं आता कि किसी और देश से लड़ाकों को भाड़े पर लिया गया हो. केवल भारतीय लड़ाके भाड़े पर लिए गए.

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हालांकि फ़ारसी युद्ध हार गए लेकिन भारतीय लड़ाकों का हमेशा वर्णन होता है.

एक सदी बाद इतिहासकार एरियन ने पंजाब में सिकंदर महान के आक्रमण के समय की घटना का ज़िक्र किया.

सिकंदर को जो सबसे बड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ा वह था वो भारतीय पेशेवर लड़ाकों की तरफ़ से था, जिन्हें गांव वालों ने मैसोडोनियाई सेना से अपनी बस्तियों की रक्षा के लिए भाड़े पर लिया था.

किराए के भारतीय लड़ाके लड़ाई में अच्छे माने जाते थे.

हम यह बात इसलिए जानते हैं क्योंकि सिकंदर ने उनके साथ संघर्ष विराम किया, फिर धोखा देकर उनका नरसंहार करवा दिया.

यह उन कुछ घटनाओं में से एक है जिसे, सामान्यतः सिकंदर के चापलूस रहे, उनके जीवनी लेखकों एरियन और क्विंटस कोअर्टिसोअस रुफस ने नैतिक रूप से निंदनीय माना. इसलिए हम भी यह मानते हैं कि ऐसा हुआ होगा.

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भारतीय लड़ाकों ने इतिहास की कुछ भयंकर लड़ाइयों में अपना और दूसरों का ख़ूब ख़ून बहाया है.

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1915 में गैलिपोली की जिस जंग से तुर्की के मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क मशहूर हुए थे, उसमें भी भारतीय लड़ाकों ने हिस्सा लिया था.

लेकिन बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि जिस ख़ंदक युद्धनीति ने युद्ध को दिशा दी, वह भारतीयों की खोज थी.

प्रथम विश्व युद्ध पर लिखी गई अपनी किताब में सैन्य इतिहासकार जॉन किगन कहते हैं, "पहला ख़ंदक हमला 1914 में 9/10 नवंबर की रात भारतीय सेना के 39वें गढ़वाल राईफ़ल्स ने किया. अंधेरे की आड़ में दुश्मनों पर भयंकर आक्रमण करना भारतीय सैनिकों की एक पारंपरिक ख़ासियत थी और हो सकता है कि इस प्राणघाती कार्रवाई ने आदिवासी सैन्य अभ्यास का परिचय पश्चिमी सैनिकों से कराया हो."

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भारतीय सैनिकों में साहस और क़ाबिलियत की कोई कमी नहीं रही है.

इतिहासकार मैक्स हेस्टिंग्स ने 'कैटेस्ट्रॉफ़े: यूरोप गोज़ टू वार 1914' नामक अपनी किताब में लिखा है कि भारतीय सैनिकों ने ब्रितानी सैनिकों को गश्त करने की कला सिखाई.

फ्रांस की ख़ंदकों में इतने सारे भारतीय सैनिक थे कि ब्रितानी विदेश विभाग से उनकी खाने पीने की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हर महीने दस हज़ार ज़िंदा बकरे भेजने के लिए कहा गया.

मुग़ल साम्राज्य के पतन पर इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने चार कड़ियों वाली अपनी किताब में तीन प्रमुख राजपूत कुलों (सिसोदिया, कछवाहा और राठौर) की लड़ाई की शैली का ज़िक्र किया है.

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यहां तक कि जब वे हार रहे होते थे, तो भी राठौड़ अपने घोड़ों को दुश्मन की तोपों के इर्दगिर्द दौड़ा कर उन पर हमला कर रहे होते थे. यदुनाथ लिखते हैं कि वह ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वह इतनी बड़ी संख्या में नहीं मारे गए हैं कि युद्ध के मैदान से सम्मान के साथ लौट सकें.

यक़ीनन राजपूतों की समस्या यह थी कि वह आपस में ही लड़ते रहते थे. एक लड़ाई के बारे में पढ़ कर मैं हैरान रह गया, कि कुछ दर्जन राठौड़ों ने अपने एक लाख प्रतिद्वंदी राठौड़ लड़ाकों को छितरा दिया था.

यह ऐसे राष्ट्र के लड़ाकों की विरासत या संकेत नहीं है जो अरब लड़ाकों से कमतर हों.

क़रीब 15 साल पहले एक अख़बार में मैंने एक घटना के बारे में पढ़ा था. एक बार में दो ब्रितानी यूनिटों के बीच तब लड़ाई शुरू हो गई जब एक समूह ने बहुत अधिक शराब पी ली और वे आक्रामक हो गए.

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ये उनका दुर्भाग्य था कि दूसरा समूह गोरखाओं का था जो ब्रितानी सैनिकों की तुलना में आकार में बहुत छोटे थे लेकिन ब्रितानियों से बेहतर लड़ाके थे. मुझे याद है कि उनके बारे में क्या लाइन लिखी गई थी- 'उन्होंने विरोधियों का सफ़ाया कर दिया.'

भारतीय सैनिकों को हमेशा एक अच्छे नेतृत्व की ज़रूरत होती है. मुझे संदेह है कि आईएस के अरब उन्हें ऐसा नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं, और ऊपर वाले का शुक्र है कि वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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