'असहिष्णुता' पर मोदी की आलोचना कितनी सही?

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पिछले कुछ समय से भारत में कलाकारों, लेखकों, शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों ने कथित रूप से बढ़ रही असहनशीलता पर चिंता जताई है.

लेखकों से शुरू हुआ पुरस्कार वापसी का आंदोलन वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और फ़िल्म कलाकारों तक फैल गया.

भारत और विदेशों में शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े तक़रीबन 200 शिक्षाविदों ने बढ़ती 'असहिष्णुता और कट्टरपन' के ख़िलाफ़ एक संयुक्त बयान जारी किया था.

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संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में भी असहिष्णुता पर बहस जारी है.

इसी मुद्दे पर अमरीका और फ्रांस में पढ़ा रहे भारत के प्रमुख इतिहासकारों और जीवनीकारों में से एक संजय सुब्रमण्यम से बात की बीबीसी न्यूज़ ऑनलाइन के सौतिक बिस्वास ने.

क्या भारत प्रधानमंत्री मोदी के राज में असहिष्णु हो गया है?

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भारत में असहिष्णुता कोई नई चीज़ नहीं है. तो फिर हम पिछले साल भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद जो कुछ हुआ है, उसे लेकर अचानक इतने मुखर और चिंतित क्यों हैं?

मैंने भारत को पिछले लगभग एक साल से नहीं देखा है, इसलिए मैंने दूर से देखकर अपनी धारणा बनाई है. फिर भी, ऐसा लगता है कि चिंता इस तथ्य से उभरी है कि भाजपा को संसद में प्रचंड बहुमत मिला है, यह भाजपा के लिए अपने एजेंडे को लागू करने का एक मौक़ा है जो उसके पास पिछली बार नहीं था. अगर भाजपा अल्पमत में होती और गठबंधन सरकार बनाती तो लोग बहुत परवाह नहीं करते.

इसके अलावा, मौजूदा सरकार लगातार दो तरह की बातें करती है. एक आवाज़ वो है जो वाजिब, सहिष्णु और आश्वस्त करने वाली है, जबकि दूसरी बहुत आक्रामक और कठोर है.

इस सोचे-समझे दोहरेपन में ही उनकी रणनीति छिपी है. ऐसे में, स्वाभाविक तौर पर चिंतित होने वाली बात है कि इस सरकार के अगले पाँच साल तक काम करने का ढर्रा क्या यही होगा?

क्या आपको लगता है कि भारत वास्तव में अधिक असहिष्णु हो गया है? क्या ये इस वजह से नहीं है कि कांग्रेस और दूसरे ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों में उदारवादी मूल्यों पर पर खड़े होने का दम नहीं है?

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ये 'भारत' का सवाल नहीं है, बल्कि ये राजनीतिक दलों के रवैये से जुड़ा हुआ है. ये सही है कि स्वतंत्र भारत में आज़ाद ख़्यालों की डोर हमेशा से नाज़ुक रही है. इन पर हमला करने वालों में भाजपा अकेली नहीं है, कुछ ही राजनीतिक दलों ने वास्तव में राजनीतिक उदारवाद को अपनाया है. लेकिन क्या इससे भाजपा को क्लीन चिट मिल जाती है?

एक नहीं, दो जेबकतरे मेरी जेब काट रहे हैं, क्या ये मेरे लिए तसल्ली की बात होनी चाहिए? अगर मौजूदा माहौल की आलोचना सिर्फ़ राजनीतिक कारणों से होती और ये आलोचना सिर्फ़ सियासी दल कर रहे होते तो इतनी बड़ी बात नहीं थी क्योंकि कांग्रेस का दामन इस मामले में ख़ुद दाग़दार है.

लेकिन ये आलोचना समाज के कई हिस्सों से हो रही है, जिन्हें असुरक्षा महसूस होती है और जब वे अहिंसक तरीक़े से प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें बेरहमी से देश छोड़ने को कह दिया जाता है. ये बहुमत की बदतमीज़ी है. कई संस्थानों में इसे महसूस किया गया. विश्वविद्यालयों में मेरे दोस्त ऐसा महसूस कर रहे हैं.

क्या अकारण ज़रूरत से ज़्यादा घबराहट है?

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निश्चित तौर पर चिंता करने की वजहें भी हैं, जब कुछ लोग अपनी भाषा में इतने कठोर और बेरहम शब्दों का इस्तेमाल करने लगें. ऐसा करने वालों में सिर्फ़ भाजपा ही नहीं है.

अगर मैं पाकिस्तान में रहता तो मेरी चिंता सुन्नी कट्टरपन से जुड़ी होती, अगर मैं फ्रांस में रहता और बहुमत वाले ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते कि 'या तो मेरी शर्तों पर फ्रांसीसी बनो, वरना नतीजे भुगतो.' तो मैं चिंता करता. इस तरह की बातों का विरोध करने की आवश्यकता है.

जैसा कि 1975 में आपातकाल के दौरान हुआ या नंदीग्राम नरसंहार के वक़्त हुआ था. भाजपा के डराने-धमकाने को हमें अपवाद क्यों मानना चाहिए?

सभ्यता के रूप में भारत कितना सहिष्णु रहा है?

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इतिहास की बात करें तो भारत भी दुनिया के किसी दूसरे हिस्से की तरह कम या ज़्यादा भला नहीं रहा है. हमें ये दावा करने की आवश्यकता क्यों है कि हम दूसरों से ज़्यादा अच्छे रहे हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि निश्चित तौर पर हम वैसे नहीं रहे हैं. हमें अपने वर्तमान और अतीत को आलोचनात्मक दृष्टि से परखने की ज़रूरत है.

भारतीय इतिहास के छात्र भारत के अतीत में हिंसा की कोई कमी नहीं पाते हैं, चाहे ये धर्म आधारित हो, जाति, वर्ण या राजनीतिक प्रतिशोध के कारण.

कई लोग दावा करते हैं लेकिन भारत में कभी भी 'स्वर्णयुग' नहीं रहा. हाँ, सहनशीलता या महानगरीय सहअस्तित्व के कुछ दौर ज़रूर रहे हैं. लेकिन ये वास्तव में दिलचस्प अपवाद थे, कोई नियम नहीं.

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