'लड़कियां सुरक्षित ही नहीं, साइकिल का क्या करूं?'

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"अखबारों और टीवी चैनलों पर रोजाना कहीं न कहीं लड़कियों पर हमले और अत्याचार की ख़बरें पढ़ती-देखती रहती हूं. राज्य में जब लड़कियां सुरक्षित ही नहीं हैं तो साइकिल लेकर मैं क्या करूंगी?"

कूचबिहार ज़िले के मरीचबाड़ी गांव की 12वीं की छात्रा नवनीता कारजी ने इसी दलील के साथ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की महात्वाकांक्षी सबूज साथी योजना के तहत साइकिल लेने से इंकार कर दिया है.

गरीब परिवार की नवनीता के पिता उसे साइकिल खरीद कर नहीं दे सकते. बावजूद इसके उसने साइकिल लेने से मना कर दिया.

हाल में अलीपुरदुआर में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री से साइकिल पाने वालों की सूची में नवनीता का भी नाम था.

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लेकिन उसने स्कूल में साफ कह दिया कि वह साइकिल नहीं लेगी. मुफ्त की साइकिल छोड़ रोजाना स्कूल जाने के लिए पैदल ढाई किलोमीटर का सफर करने वाली नवनीता को अपने इस फैसले पर कोई अफसोस नहीं है.

वो कहती हैं, "मैं जानती हूँ कि इससे हालात में कोई खास बदलाव नहीं आएगा. फिर भी मुझे लगा कि विरोध की एक आवाज़ तो उठनी ही चाहिए."

बीते साल नवनीता की सहेली की दीदी पर कुछ असामाजिक तत्वों ने एसिड फेंक दिया था. लेकिन अपराधी अब तक खुले घूम रहे हैं. नवनीता की तमाम सहेलियों ने साइकिलें लीं, लेकिन नवनीता उस दिन स्कूल ही नहीं गई.

राज्य के बहुचर्चित कामदुनी बलात्कार कांड के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली टुम्पा कयाल भी नवनीता के समर्थन में सामने आई हैं.

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वो कहती हैं, "मुख्यमंत्री को पहले युवतियों और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए." उनका सवाल है कि साइकिल लेकर बाहर निकलने पर लड़कियां अगर किसी मुसीबत में फंसती हैं तो उनकी सहायता कौन करेगा?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तर्ज पर अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी साइकिल की सवारी के जरिए अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता में वापसी का सपना देख रही हैं.

उन्होंने इस साल स्वाधीनता दिवस के मौके पर अपने भाषण में 40 लाख छात्रों को मुफ्त साइकिल बांटने का एलान किया था. अब इस योजना को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. 25 लाख साइकिलें जनवरी तक ही बांटी जानी है.

तृणमूल कांग्रेस को उम्मीद है कि ये साइकिलें अगले साल विधानसभा चुनावों में सत्ता तक उसका सफर आसान कर देंगी.

राज्य की ताज़ा मतदाता सूची में 11.14 लाख ऐसे युवा वोटर हैं जो अगले साल पहली बार वोट डालेंगे. पार्टी को उम्मीद है कि इनमें से ज्यादातर वोट उसी की झोली में पड़ेंगे.

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वैसे ममता बनर्जी सरकार पिछले साल से ही माओवाद-प्रभावित पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया जिलों में नौवीं और दसवीं कक्षा की आदिवासी छात्राओं को मुफ्त साइकिल बांटती रही हैं.

लेकिन अब पूरे राज्य के छात्र-छात्राओं को इस योजना के दायरे में शामिल कर लिया गया है.

विपक्षी राजनीतिक दलों ने सरकार के इस फैसले को चुनावी कवायद करार दिया है.

सीपीएम नेता सूर्यकांत मिश्र सवाल करते हैं, "मुख्यमंत्री बार-बार धन की कमी का रोना रोती हैं. ऐसे में इन साइकिलों के लिए पैसे कहां से आएगा ?"

कांग्रेस ने भी यही आरोप लगाया है. लेकिन ममता बनर्जी को इन आलोचनाओं की परवाह नहीं है. इसके लिए अख़बारों में पूरे पेज का विज्ञापन देकर रोजाना कहीं न कहीं साइकिलें बांटी जा रही हैं.

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