फिर हुआ क्या वाड्रा के मामले का

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अक्टूबर 2012 में अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट वकील प्रशांत भूषण ने एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ़ को फ़ायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था.

केजरीवाल के मुताबिक दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में ज़मीन के लेनदेन में भारी घोटाले हुए हैं और रॉबर्ट वाड्रा इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.

रॉबर्ट वाड्रा: क्या केवल चुनावी मुद्दा ही हैं?

रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ़ सभी आरोपों से इनकार करते रहे हैं, लेकिन भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार बताते हुए बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया.

केजरीवाल और प्रशांत भूषण के आरोप:

2012 में केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि डीएलएफ़ ने रॉबर्ट वाड्रा की कथित फ़र्ज़ी कंपनियों को बिना ब्याज लिए कथित तौर पर 65 करोड़ रुपए का असुरक्षित लोन दिया और उसी पैसे से वाड्रा की कंपनियों ने डीएलएफ़ की ही 300 करोड़ रुपए की संपत्तियां खरीद लीं.

भाजपा के आरोप:

भाजपा के जारी दस्तावेज़ ‘दामाद श्री’ के अनुसार रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट ने फ़रवरी 2008 में गुड़गांव सेक्टर 83 के गांव शिकोहपुर में 3.53 एकड़ कृषि ज़मीन साढ़े सात करोड़ रुपए में झूठे चेक की मदद से ख़रीदी और ये पैसे ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज़ को दिए गए, साथ ही 45 लाख रुपए स्टैंप ड्यूटी के तौर पर भी दिए गए.

आरोप लगाए गए कि स्टैंप ड्यूटी के पैसे डीएलएफ़ से लेकर दिए गए.

पार्टी के आरोपों के अनुसार 2.70 एकड़ ज़मीन पर कॉमर्शियल कॉलोनी बनाने की अनुमति सरकार से मिली थी, राज्य सरकार ने ज़मीन को कॉमर्शियल लाइसेंस देने में बहुत जल्दी दिखाई जिससे ज़मीन की कीमतों में ज़बरदस्त वृद्धि हुई.

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और फिर ज़मीन को भारी फ़ायदे के साथ डीएलएफ़ को 58 करोड़ रुपए में बेच दिया गया.

कहा गया कि जब ज़मीन को डीएलएफ़ को बेची गई तो फ़ायदा वाड्रा को पहुंचा.

पार्टी द्वारा जारी दस्तावेज़ों के अनुसार कॉमर्शियल कॉलोनी लाइसेंस के लिए 18 नवंबर 2008 को आवेदन दिया गया और 15 दिसंबर को लाइसेंस दे दिया गया.

पार्टी ने रॉबर्ट वाड्रा पर हरियाणा लैंड सीलिंग एक्ट के उल्लंघन का भी आरोप लगाया. आरोपों के अनुसार रॉबर्ट वाड्रा ने 9 सितंबर 2005 में ज़मीन खरीदनी शुरू की और सात दिसंबर 2009 तक उनके, उनकी पत्नी और कंपनियों के नाम 147 एकड़ से भी ज़्यादा ज़मीन थी, जबकि ज़मीन की सीमा 54 एकड़ है.

डीएलएफ़ की सफाई:

डीएलएफ़ ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है कि उसने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को फ़ायदा लेने के लिए असुरक्षित कर्ज़ दिया.

कंपनी का कहना है कि उसने वाड्रा के साथ जो कारोबार किया वो पूरी तरह पारदर्शी है और उन्हें ये कर्ज़ सामान्य उद्यमी के तौर पर दिया गया था.

कंपनी ने कहा है कि 2008-09 में स्काईलाइट ने गुड़गाँव के शिकोहपुर गाँव में लगभग 3.5 एकड़ के एक ज़मीन के टुकड़े को बेचने के लिए डीएलएफ़ से संपर्क किया था.

डीएलएफ़ के मुताबिक उस ज़मीन को वो 58 करोड़ रुपए में ख़रीदने के लिए तैयार हो गई जिसके लिए स्काईलाइट को 50 करोड़ रुपए की अग्रिम राशि दी गई.

डीएलएफ़ ने कहा कि फरीदाबाद स्थित एक और ज़मीन के लिए उसने स्काईलाइट को 15 करोड़ रुपए दिए थे लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण सौदा पूरा नहीं हो पाया और स्काईलाइट ने उसे 15 करोड़ रुपए वापस कर दिए.

कंपनी के मुताबिक उसने किसी भी स्तर पर स्काईलाइट ग्रुप को ब्याजमुक्त ऋण नहीं दिया था.

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डीएलएफ़ ने अपने वक्तव्य में कहा है कि सितंबर 2008 में उसने रॉबर्ट वाड्रा को अपने इस्तेमाल के लिए अरालिया प्रोजेक्ट में एक अपार्टमेंट 12,000 रुपए प्रति वर्ग फीट के बाज़ार दाम पर बेचा था, और ये दर सबसे ज़्यादा दरों में से थी.

कंपनी के मुताबकि ये कहना बिल्कुल बेबुनियाद है कि उसने इस फ्लैट को कम दामों में वाड्रा को बेचा था.

केजरीवाल और प्रशांत भूषण के आरोप:

केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने आरोप लगाए थे कि ये डीएलएफ़ ने वाड्रा को कई फ्लैट्स बेहद कम दामों में बेचे.

डीएलएफ़ की सफाई:

लेकिन डीएलएफ़ ने अपने वक्तव्य में कहा, "वाड्रा या उनकी किसी कंपनी को कौड़ियों के दाम संपत्ति बेचने का कोई सवाल ही नहीं उठता है. ये आरोप भी बिल्कुल ग़लत हैं कि मैग्नोलियाज़ में सात अपार्टमेंट सिर्फ 5.2 करोड़ रुपए में बेचे गए थे."

डीएलएफ़ ने इस बात से भी इनकार किया कि उसे हरियाणा सरकार की ओर से फायदा पहुँचाया गया. कंपनी ने कहा कि वो हरियाणा में पिछले 40 सालों से सक्रिय है और सफलतापूर्वक उसने कई परियोजनाओं को पूरा किया है.

कार्रवाई

जस्टिस एसएन ढींगरा की अध्यक्षता में गठित एक सदस्यीय जांच टीम आरोपों की जांच कर रही है.

इस साल जनवरी में ख़बर आई कि राजस्थान की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने करीब 374 एकड़ ज़मीन को अपने कब्ज़े में ले लिया और इसमें ज़मीन का एक हिस्सा भी शामिल है जो कथित तौर पर वाड्रा का है.

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ये ज़मीन बीकानेर के कोलायत इलाके में थी.

विपक्ष का आरोप था कि वाड्रा ने 'स्काईलाइट रिएल्टी प्राइवेट लिमिटेड', 'रिएल अर्थ इस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड' जैसी कंपनियों की मदद से वर्ष 2009 और 2011 के बीच बीकानेर में 1600 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन खरीदी.

आरोप लगे कि ये ज़मीनें हाइवे या ग्रिड स्टेशनों के नज़दीक थीं और ये ज़मीन ऐसी जगहों पर थीं जहां सूरज की सबसे ज़्यादा रोशनी आती है. ऐसा करके राजस्थान सरकार ने रॉबर्ट वाड्रा को फायदा पहुंचाया क्योंकि राज्य की सोलर नीति के अनुसार सोलर पावर कंपनियों को बुलाया गया .

रॉबर्ट वाड्रा की कंपनियों ने सोलर पावर कंपनियों को ज़मीन बेचकर खासा मुनाफ़ा कमाने का आरोप लगा.

विपक्ष ने रॉबर्ट वाड्रा पर राज्य की लैंड सीलिंग क़ानून का भी उल्लंघन करने का आरोप लगाया.

ज़मीन विवाद ने इसलिए ज़ोर पकड़ा क्योंकि भूमि पर आबंटन में महाजन फील्ड फायरिंग रेंज के विस्थापितों के नाम पर धोखाधड़ी की बात सामने आई थी.

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