वाड्रा पर नरमी क्यों बरत रही है भाजपा?

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क्या नरेंद्र मोदी सरकार का रुख़ रॉबर्ट वॉड्रा पर बेहद लचीला है?

आरोप लग रहे हैं कि मई 2014 की चुनावी जीत से पहले 'माँ-बेटे' की सरकार पर लगातार ताना मारने वाले नरेंद्र मोदी क्या प्रधानमंत्री बनने के बाद रॉबर्ट वॉड्रा मुद्दे पर नर्म हो गए हैं?

ये आरोप नरेंद्र मोदी के विरोधी ही नहीं, बल्कि उनके समर्थक भी लगा रहे हैं.

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बीकानेर से भाजपा सांसद अर्जुन राम मेघवाल भी मानते हैं, "कार्रवाई थोड़ी जल्दी हो तो लोगों को संदेश जाता है, ये बात सही है. लेकिन सोनिया गांधी के दामाद होने के नाते ख़ाली इसी केस में आगे कार्रवाई करें तो उनको लगेगा कि ये बदला ले रहे हैं."

सवाल उठ रहे हैं कि क्या भाजपा रॉबर्ट वॉड्रा मामले को कांग्रेस की कमज़ोर नस मानती है जिसे जब चाहा दबाया जा सकता है?

मोदी सरकार के सत्ता में आने के क़रीब डेढ़ साल बाद यानि सितंबर, 2015 में ही ख़बर आई थी कि भारत सरकार के नगर विमानन मंत्रालय ने राबर्ट वाड्रा का नाम वीवीआईपी (अति विशिष्ट अतिथि) सूची से हटा दिया.

क्या इससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सत्तारुढ़ दल और विपक्ष के बीच कोई सांठगांठ है?

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एक वक़्त आम आदमी पार्टी का हिस्सा रहे योगेंद्र यादव के अनुसार कहने को तो हरियाणा सरकार ने एक औपचारिक जांच शुरू करवा दी है. राजस्थान में भी किसी क़िस्म का केस शुरू हो गया है. लेकिन वो तत्परता, वो गंभीरता और वो संजीदगी जो ऐसे किसी मामले में होनी चाहिए थी, वो दिखाई नहीं देती.

योगेंद्र यादव कहते हैं, ''रॉबर्ट वॉड्रा का मामला केवल एक बड़े ख़ानदान के नेता द्वारा किया गया कथित मामला नहीं था. दरअसल ऐसा भ्रष्टाचार राजनेता धड़ल्ले से करते हैं. भूमि का लैंड यूज़ बदलवाना, उसका दुरुपयोग करके नेता जो पैसा कमाते हैं वो भ्रष्टाचार नहीं रुका है. मेरे लिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि जिस दरवाज़े से रॉबर्ट वॉड्रा ने कथित तौर पर भ्रष्टाचार किया, वो दरवाज़ा बंद हुआ है या नहीं.''

यादव आरोप लगाते हैं कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए न तो कांग्रेस ने कोशिश की और न भाजपा ने.

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वो कहते हैं, ''सब सरकारें भ्रष्टाचार का यंत्र अपने हाथ में रखना चाहती हैं. राजनीतिक भ्रष्टाचार की जड़ में ये जो यंत्र है, इसे छोड़ने के लिए भाजपा तैयार नहीं है. और ये मुझे संस्थागत भ्रष्टाचार की जड़ लगती है.''

योगेंद्र यादव कहते हैं, ''भाजपा की इन सब मामलों पर जो चुप्पी है वो केवल संजीदगी और राजनीतिक समझदारी का मामला नहीं है. ये बड़े दलों की सेटिंग का मामला है. यदि भाजपा सत्ता में आते ही ये कह देती कि हम सीएलयू नाम के इस भ्रष्टाचारी यंत्र को समाप्त करेंगे, हम इसका ग़लत इस्तेमाल नहीं होने देंगे. अगर वो ऐसा करते तो उनकी कोई आलोचना नहीं होती. कोई उन पर प्रतिशोधी होने का आरोप न लगाता. ये क़दम अभी तक सरकार ने क्यों नहीं उठाया, इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला है.''

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि ये पूरा मामला भाजपा के उन वायदों से जुड़ा है जिसमें पार्टी ने भ्रष्टाचार ख़त्म करने की बात की थी.

वो कहते हैं, ''जो बात हम भी कह रहे थे और एसआईटी ने भी कही कि पार्टिसिपेटरी नोट्स और टैक्स हेवेंस से जो निवेश होता है, भारत में वो काला धन ही है, उसे रोकने के लिए भी सरकार ने कुछ नहीं किया. लोकपाल का क़ानून बने दो साल हो गए. लेकिन लोकपाल नहीं बनाया गया. सीवीसी में एक साल पोस्ट ख़ाली रखी गई पर दो ऐसे लोगों की नियुक्ति की गई जिनके ऊपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे. सेंट्रल इन्फ़ॉर्मेशन कमिश्नर नहीं बनाए जा रहे जिसकी वजह से बहुत सारे मामले लंबित हैं."

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प्रशांत भूषण कहते हैं कि पिछले कुछ महीनों में भाजपा की छवि कमज़ोर हुई है और कांग्रेस-भाजपा एक दूसरे के नज़दीक नज़र आते हैं.

योगेंद्र यादव के अनुसार, ''ये मामला संजीव चतुर्वेदी का भी है. ये मामला अशोक खेमका जैसे इमानदार अफ़सरों के साथ क्या किया गया, ये उसका भी है. इससे संदेश जाता है कि जब भ्रष्टाचार की बात आती है तो कांग्रेस और भाजपा में कोई फ़र्क़ नहीं है.''

भाजपा सांसद अर्जुन राम मेघवाल भरोसा दिलाते हुए कहते हैं, ''जांच में वक़्त लगा लेकिन कार्रवाइयां की गई हैं.''

भाजपा समर्थकों में फैल रहे असंतोष पर वो कहते हैं, ''फ़र्जी रजिस्टरियां करवाने के आरोप में कुछ लोग जेल भी गए हैं. रजिस्ट्रॉर ऑफ़ कंपनी से कुछ जानकारियां मांगी गई हैं. राजस्थान सरकार ने भी अपनी जांच कर रिपोर्ट ईडी को भेज दी हैं. ईडी कंपनियों के बारे में पूरी जानकारी जमा कर रही है. क़ानून के हाथ लंबे होते हैं. ये बच तो नहीं पाएंगे.''

मेघवाल कहते है कि अगर वॉड्रा पर तुरंत कार्रवाई हुई होती तो ऐसा लगता कि सरकार उनसे बदला ले रही है. लेकिन उनका यह तर्क भाजपा समर्थकों और उसे वोट देने वालों के गले आसानी से नहीं उतरेगा.

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