#100Women कामयाबी के शिखर पर (भाग-10)

#100Women में बीबीसी हिंदी ने चुनीं हैं भारत की वो 100 दमदार औरतें, जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते खोले और मिसाल क़ायम कर दी, नहीं तो कम से कम समाज को झकझोरा तो है ही.

हमारी सीरीज़ की आख़िरी कड़ी में में पढ़ें उन 10 औरतों के बारे में जो कामयाबी के शिखर पर हैं.

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  • 100 Women: Achievers

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  • आरती देवी

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    एमबीए करने के बाद आरती देवी ओडिशा के बरहामपुर में आईडीबीआई बैंक की शाखा में अच्छी खासी नौकरी कर रही थीं.

    साल 2012 में जब उनके गांव में सरपंच की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की गई, तो उन्हें समाजसेवा के अपने सपने को साकार करने का मौका दिखा.

    गांव के बुज़ुर्गों ने भी शिक्षित उम्मीदवार की चाह दिखाई और महज़ 27 साल की उम्र में आरती अपने गांव गंजाम ज़िले के धूंकापड़ा से पंचायत चुनाव जीतकर देश की सबसे कम उम्र की महिला सरपंच बनीं.

    कुछ ही महीनों में आरती देवी के काम को देखते हुए अमरीकी सरकार ने उन्हें 2014 में अपने ‘इंटरनेशनल विज़िटर्स डेवलपमेंट प्रोग्राम’ के लिए चुना.

    वे तीन हफ़्ते के लिए अमरीका के दौरे पर गईं और राष्ट्रपति ओबामा से मिलीं.

    आरती देवी ने अपने इलाके में सरकारी राशि का समुचित उपयोग कर विकास से जुड़े विभिन्न काम किए हैं.

  • अरूंधति भट्टाचार्या

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    अरूंधति भट्टाचार्या भारत के सबसे बड़े बैंक 'भारतीय स्टेट बैंक' की पहली महिला चेयरपर्सन हैं. इससे पहले अरूंधति इस बैंक की मैनेजिंग डायरेक्टर बनने वाली पहली महिला थीं.

    पश्चिम बंगाल के जाधवपुर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद अरूंधति 1977 में भारतीय स्टेट बैंक में अधिकारी बनीं. इसके बाद अरूंधति ने भारतीय स्टेट बैंक के लिए विभिन्न ज़िम्मेदारियों का निभाया है.

    अरूंधति भारतीय स्टेट बैंक के इंवेस्टमेंट बैंकिंग विभाग, ‘एसबीआई कैपिटल मार्केट्स’ की सीईओ रह चुकी हैं.

    फोर्ब्स एशिया ने उन्हें एशिया की 50 सबसे शक्तिशाली महिला उद्यमी की सूची में शामिल किया है, वहीं इसी सूची के भारतीय अंक में वे शीर्ष पर सबसे शक्तिशाली महिला आंकी गई हैं. फोर्ब्स ने ही उन्हें 2015 में सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बेहतरीन सीईओ आंका है.

    अरूंधति की दिलचस्पी पढ़ने और यात्रा करने में भी है और वे विकलांग लोगों के कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं.

  • डॉ. जिनी श्रीवास्तव

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    कनाडा में पली-बढ़ीं जिनी ने भारत के ओम श्रीवास्तव से 1970 में शादी करने के बाद राजस्थान का रुख किया. यहां पहले एक गैर सरकारी संगठन के साथ औऱ बाद में ग्रामीण और आदिवासी समुदाय की महिलाओं के साथ काम किया.

    1998 में उन्होंने अकेली महिलाओं- विधवा, तलाकशुदा, पति द्वारा छोड़ दी गई और परिवार से निकाल दी गई महिलाओं के मुद्दों पर संघर्ष करने के ‘एकल नारी शक्ति’ संगठन बनाया.

    यह संगठन आज राजस्थान के 33 ज़िलों में सक्रिय है और इसके 49,400 सदस्य हैं. उन्होंने 2009 में ‘नेशनल फोरम फॉर सिंगल वुमेंस राइट्स’ का गठन किया . ‘सिंगल’ पर अकेली नहीं.

    जिनी की एक संस्था आस्था संस्थान को राष्ट्रपति द्वारा स्त्री शक्ति सम्मान मिल चुका है. उन्हें 2005 में नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया जा चुका है.

  • जे. मंजुला

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    जे. मंजुला उन गिनी चुनी महिला वैज्ञानिकों में शामिल हैं जिन्होंने भारतीय सेना को आधुनिकतम इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से लैस करने के काम को चुना.

    वे बीते 27 सालों कई अत्याधुनिक सिस्टम विकसित कर चुकी हैं जिनसे भारतीय सेना की दक्षता बढ़ती है.

    इन सिस्टम्स की पड़ताल के लिए उन्हें अपनी टीमों को रेगिस्तान, पहाड़, जंगल और समुद्री पानी में ले जाकर इनपर अभ्यास करवाना होता है.

    मंजुला ने इलेक्ट्रानिक्स और कम्यूनिकेशन इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है.

    मौजूदा वक्त में मंजुला 'डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइज़ेशन' (डीआरडीओ) की 'इलेक्ट्रानिक्स एंड कम्यूनिकेशन सिस्टम' की महानिदेशक हैं.

    उनकी ज़िम्मेदारियों में भारतीय सेना के लिए बेहतर रेडार, आत्मसुरक्षित जैमर, इल्केट्रो-ऑप्टिकल यूनिट, एलएएसईआर सोर्स इत्यादि विकसित करना शामिल है.

  • नोरती देवी

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    67 साल की नोरती देवी राजस्थान में 1980 से ही जन अधिकारों की लड़ाई लड़ती रही हैं. अत्याधिक गरीब परिवार की नोरती देवी अनुसूचित जाति की हैं. वह कभी स्कूल नहीं गईं लेकिन प्रौढ़ शिक्षा की कक्षाओं में पढ़ना-लिखना सीखा.

    हैंडपंप मिस्त्री का काम सीखा और साइकिल से गांव गांव जाकर हैंडपंप सुधारने का काम भी किया. बाद में नोरती ने कंप्यूटर चलाना भी सीखा. सूचना के अधिकार के आंदोलन को भी आगे बढ़ाया.

    अपनी सक्रियता के चलते ही वह अजमेर की हरमाड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच चुनी गईं हालांकि औपचारिक शिक्षा को योग्यता बनाए जाने के बाद वे 2015 में चुनाव नहीं लड़ सकीं.

    महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर बोलने के लिए वह चीन, जर्मनी जैसे देशों का दौरा कर चुकी हैं.

  • रोहिणी गोडबोले

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    रोहिणी गोडबोले भारत की सैद्धांतिक कण भौतिक विज्ञानी यानि ‘थ्योरिटिकल पार्टिकल फिज़िसिसिट’ हैं. इस विषय पर उनका योगदान महत्वपूर्ण है.

    लार्ज हैडरन कोलाइडर (एलएजसी) में टॉप क्वार्क और हिग्स बोसोन जैसे कणों की खोज के मौलिक रास्ते ढूंढने और फिर उनकी प्रॉपर्टीज़ समझने में रोहिणी की अहम् भूमिका रही है.

    उनके काम के केंद्र में भौतिक अध्ययन के नए रास्ते, प्रस्ताव और दृष्टिकोण ढूंढना है.

    विभिन साइंस अकादमियों की चयनित फेलो रोहिणी गोडबोले को ‘नेशनल साइंस अवॉर्ड’ भी दिया गया है.

    वे देश-विदेश की कई अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भाषण दे चुकी हैं. रोहीणी विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी कार्यरत हैं.

  • रोहिणी सालियान

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    मुंबई की मशहूर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर रोहिणी सालियान अपनी सख़्त छवि के लिए जानी जाती हैं. 68 साल की उम्र में भी वह अपराध जगत के हाई प्रोफाइल मामलों के दोषियों को सज़ा दिलाने के अपने मिशन में जुटी हैं.

    1992 में जेजे गोलीकांड और 2003 के बोरीवली दोहरा हत्याकांड जैसे मामलों की पैरवी उन्होंने की है. 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामला जिसमें छह लोग मारे गए थे, जबकि 100 लोग घायल हुए थे की पब्लिक प्रॉसिक्यूटर भी रोहिणी सालियान ही थी.

    हाल ही में उन्होंने इस केस में आरोपियों की तरफ़ नरम रुख अपनाने के लिए राष्ट्रीय जांच एजंसी की तरफ़ से दबाव डाले जाने का आरोप लगाया था.बम धमाकों के अन्य मामलों के अलावा रोहिणी भारत में नकली नोट प्रसारित करने वालों के ख़िलाफ़ केस लड़ रही हैं.

    2013 में मुंबई के एक अनाथ आश्रम में 19 लड़कियों के साथ उसी संस्था के उच्चाधिकारियों ने बलात्कार किया था. ये लड़कियां ना बोल सकती थीं और ना ही सुन सकती हैं. इस मामले में रोहिणी सालियान ने एक को फांसी की सज़ा दिलाई और बाकी को जेल पहुंचाया.

    68 वर्षीय रोहिणी एक अच्छी वकील होने के अलावा एक अच्छी पेंटर भी हैं.

  • संघमित्रा देसाई गाडेकर

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    दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा के ख़तरे और लागत की वजह से उसकी ख़पत कम की जा रही है पर भारत में इसे काफी बल दिया जा रहा है.

    डॉ. संघमित्रा देसाई गाडेकर अपनी चिकित्सीय ट्रेनिंग की मदद से इस ऊर्जा के आम लोगों की सेहत पर होने वाले दुष्प्रभाव पर शोध किया है.

    उन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों वाले इलाके, राजस्थान के रावटभाटा, गुजरात के काकरापार और झारखंड के जादूगोड़ा, में घर-घर जाकर सर्वे किए हैं.

    इन सर्वे और उस पर आधारित अध्ययन को वह आम लोगों की भाषा में लोगों को बताती हैं. वह अपने अध्ययन को महाराष्ट्र के जैतापुर और केरल के पेरिंगोम जैसे इलाकों तक लेकर गई हैं.

    उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर अणुमुक्ति नामक पत्रिका भी निकाली. इसके अलावा खादी को प्राकृतिक रंगों से रंगने को भी वह बढ़ावा देती रही हैं.

  • सुनीता नारायण

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    लेखक और पर्यावरणविद सुनीता नारायण 1982 से पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही संस्था 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' से जुड़ी रही हैं. मौजूदा वक्त वह इस संस्था की महानिदेशक हैं.

    इसके अलावा वह 'डाउन टू अर्थ' पत्रिका की संपादक और प्रकाशक हैं.

    2005 में वे प्रधानमंत्री की पहल से 'टाइगर टास्क फोर्स' की चेयरपर्सन रहीं. इस टास्क फोर्स ने सरिस्का में बाघों के संरक्षण के लिए एक्शन प्लान तैयार किया था.

    2012 में उन्होंने 'स्टेट ऑफ़ इंडिया एनवायरमेंट रिपोर्ट' लिखी जिसमें भारत के शहरी इलाकों में पानी और प्रदूषण से जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण किया गया था.

    सुनीता प्रधानमंत्री की 'जलवायु परिवर्तन काउंसिल' की सदस्य और 'राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण' की सदस्य भी रही हैं.

    2005 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया. उन्हें बरसाती जल के संरक्षण के लिए 'वर्ल्ड वाटर प्राइज़' भी मिल चुका है.

  • विजयलक्ष्मी रवींद्रनाथ

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    भारत की मशहूर न्यूरो-साइंटिस्ट, विजयलक्ष्मी रवींद्रनाथ के लिए वैज्ञानिक होना महज़ पेशा नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है.

    वे विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय के तहत नेशनल इंस्टीच्यूट की प्रमुख बनने वाली पहली महिला रही हैं.

    'नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर' की संस्थापक-निदेशक विजयलक्ष्मी ने मस्तिष्क से जुड़ी जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए विज्ञान के अलग-अलग क्षेत्र से लोगों को साथ लाने की सोच बनाई और देश में काम कर रही 42 संस्थाओं को इसमें जोड़ा.

    वे देश की तीनों साइंस अकादमी में फेलो चुने जाने के अलावा 'नेशनल अकादमी ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़', 'इंडियन अकादमी ऑफ़ न्यूरो साइंसेज़' और 'थर्ड वर्ल्ड अकादमी ऑफ़ साइंसेज़' की फेलो भी हैं.

    उन्हें 'शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार', 'ओमप्रकाश भसीन पुरस्कार' और 'जेसी बोस नेशनल फेलोशिप' मिल चुकी है. इसके अलावा उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया जा चुका है.

    विजयलक्ष्मी की चाह है कि वो सशक्त वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी विकसित करें, जिन्हें 'महिला वैज्ञानिकों' के तौर पर नहीं, बल्कि 'वैज्ञानिकों' के तौर पर जाना जाए जो महिला भी हैं.

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