हर 3 घंटे में एक बच्चे का यौन शोषण

  • 9 दिसंबर 2015
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दुनिया में यौन शोषण के शिकार हुए बच्चों की सबसे बड़ी संख्या भारत में है लेकिन फिर भी यहां इस बारे में बात करने में हिचक दिखती है.

अब एक सांसद, राजीव चंद्रशेखर, इस मानसिकता को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

राजीव चंद्रशेखर ने इस समस्या को एक 'महामारी' बताते हुए दिल्ली में एक 'ओपन हाउस' का आयोजन किया जिसका उद्देश्य था "ताकि हम बाल यौन शोषण के बारे में बात करना शुरू करें और अपने बच्चों को बचाएं."

वह कहते हैं, "बाल यौन शोषण भारत में महामारी बन चुका है. इस समस्या को गोपनीयता और इनकार की संस्कृति ने ढक रखा है और सरकारी उदासीनता से यह बढ़ी है."

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"ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि बाल यौन शोषण उतने बड़े पैमाने पर नहीं है जितना मैं कह रहा हूं, लेकिन आंकड़े मेरी बात की गवाही देते हैं."

वह सही कह रहे हैं. साल 2007 में महिला और बाल विकास मंत्रालय के द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ जिन बच्चों का सर्वेक्षण किया गया उनमें से 53 प्रतिशत ने कहा कि वह किसी न किसी क़िस्म के यौन शोषण के शिकार हुए हैं.

इस अध्ययन के मुताबिक़ आम धारणा है कि मात्र लड़कियों का ही यौन शोषण होता है. लेकिन इसके विपरीत लड़कों पर भी बराबर ख़तरा रहता है.

इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि बड़ी संख्या में शोषणकर्ता 'भरोसे के और देख-रेख करने वाले लोग' होते हैं जिनमें अभिभावक, रिश्तेदार और स्कूल शिक्षक शामिल हैं.

सांसद चंद्रशेखर ने जनवरी 2014 में बाल यौन शोषण के बारे में बोलना तब शुरू किया जब एक तीन साल की बच्ची की मां ने उनसे संपर्क किया. बच्ची के साथ स्कूल में बलात्कार की घटना हुई थी.

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वह कहते हैं, "उन्होंने मेरी मदद इसलिए मांगी क्योंकि पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कर रही थी. मैं डर गया था. जब मैंने राज्य सरकार के एक मंत्री को फ़ोन किया तो उसने कहा, 'यह हमारी ग़लती नहीं है, यह अभिभावकों की ग़लती है. किसने उन्हें कहा था कि उस स्कूल में जाएं?' ".

उसके बाद से बैंगलुरु, दिल्ली और भारत भर में बच्चों के यौन शोषण के कई हाई-प्रोफ़ाइल मामले सामने आए हैं- यह आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि देश में हर तीन घंटे में एक बच्चे का यौन शोषण होता है.

इस मुद्दे पर ख़ामोशी तोड़ने के लिए चंद्रशेखर ने चेंज.ओआरजी पर सितंबर में एक याचिका शुरू की जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से "बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता बनाने और बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए रूपरेखा बनाने के प्रति प्रतिबद्धता" का आग्रह किया गया था.

वह महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से भी मिले और उन्हें वह याचिका सौंपी जिस पर 1,82,000 से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं.

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इन हैरान कर देने वाले आंकड़ों के बावजूद बाल यौन शोषण पर बात करने की चंद्रशेखर की कोशिशें परवान नहीं चढ़ी हैं. ट्विटर पर महीनों तक उन पर 'भारत को बदनाम करने के पश्चिमी षड्यंत्र का हिस्सा' होने का आपोह लगाया जाता रहा.

उनका कहना है कि यही बाल यौन शोषण और इंसेस्ट (परिवार के अंदर व्याभिचार) को रोकने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है.

राही (रिकवरिंग एंड हीलिंग फ़्रॉम इंसेस्ट) फ़ाउंडेशन- इंसेस्ट और बाल यौन शोषण से लड़ने वाला भारत का पहला संगठन है. इसकी प्रमुख अनुजा गुप्ता कहती हैं अभिभावक सामान्यतः यौन शोषण की बात स्वीकार करने में हिचकते हैं और परिवार के सदस्यों की यौन हिंसा की बमुश्किल कभी शिकायत की जाती है.

अनुजा कहती हैं कि 'ख़ामोशी के इस षड्यंत्र' के पीड़ितों, उनके परिवारों और संपूर्ण समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं.

"ये पूरी तरह असहायता और सदमा पीड़ित को कमज़ोर कर देते हैं. एक बच्चे के लिए आगे आकर यह कहना बहुत मुश्किल होता है कि उसका शोषण किया गया और किसी ने कुछ नहीं किया. यह उनके लिए बहुत हानिकारक होता है."

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साल 2012 में भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने वाला क़ानून (पॉस्को) बनाया गया ताकि बाल यौन शोषण के मामलों से निपटा जा सके लेकिन इसके तहत पहला मामला दर्ज होने में दो साल लग गए.

साल 2014 में नए क़ानून के तहत 8904 मामले दर्ज किए गए लेकिन उसके अलावा इसी साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले; बच्ची पर उसका शीलभंग करने के इरादे से हमला करने के 11,335 मामले; यौन शोषण के 4,593 मामले; बच्ची को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले; घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए गए.

ये आंकड़े बताते हैं कि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पॉस्को लगाया ही नहीं गया.

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क़ानून बहुत अच्छा बना है लेकिन इसके अमल और सज़ा दिलाने की दर में भारी अंतर है. इस पर केवल 2.4 प्रतिशत मामलों में ही अमल हुआ है.

क़ानूनी विशेषज्ञ स्वाग राहा कहते हैं कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अक्सर पीड़ितों के अभियुक्त- जो हमेशा ही बच्चे को जानते हैं या उनके रिश्तेदार होते हैं- उन पर मुकर जाने का दबाव डालते हैं, इसलिए यह मामले अंजाम तक नहीं पहुंच पाते.

चंद्रशेखर कहते हैं, "हमारी संस्थाएं बच्चों के लिए क़तई दोस्ताना नहीं हैं. पुलिस के पास बच्चों से बात करने की संवेदनशीलता नहीं है, इसके लिए विशेष वकील नहीं हैं और अदालतों पर काम का बोझ बढ़ाते हैं. यह कुल मिलाकर ऐसा माहौल बना देते हैं जो बच्चे के लिए डराने वाला और शत्रुतापूर्ण होता है."

"अपने बच्चों के प्रति यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि उन्हें एक सुरक्षित बचपन दें. यह सब रुकना ही चाहिए."

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