'बस एक और दिन, जिसके साथ हमें आगे बढ़ना है'

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मेरे 22 साल के बेटे अभिमन्यु को ऑटिज़्म है. हम भारत की राजधानी दिल्ली में रहते हैं.

वो उन दसियों लाख लोगों में शामिल है जिनसे आंकड़े बनते हैं, संख्या बनती है जिसे दुनिया भर के 'समझदार' लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हुए बताते हैं.

अपनी बातों में वे चेतावनी की बात करेंगे, तुरंत क़दम उठाने पर ज़ोर देंगे. क्या किया जाना चाहिए वे उस बारे में बात करेंगे. किस तरह की नीतियां बनाई या बदली जानी चाहिए या ऐसे क़ानून बनाए या बदलने चाहिए, वे इस बारे में बात करेंगे.

यक़ीनन ख़ुशी से मैं 'इन सब बातों' को 'उन' पर छोड़ने के लिए तैयार हूं.

और आज सिर्फ़ 'हम लोगों' के बारे में बात करेंगे. एक अभिभावक की नज़र से देखें तो कैसा महसूस होता है?

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क्या हमारे लिए सब कुछ ठीक है. क्या आज की दुनिया अधिक बेहतर और सौम्य है, क्या विकलांगता को लेकर रवैये में कोई बदलाव आया है- ख़ास कर उस दुनिया के मुक़ाबले जब दो दशक पहले अभिमन्यु को ऑटिज़्म होने की पुष्टि हुई थी.

मैं कोशिश करूंगा कि सभी बिंदुओं की एक चेकलिस्ट बनाऊं, लेकिन ईमानदारी से कहूं तो मेरे विचार पहले से ही निर्धारित हैं.

पहले के मुक़ाबले हममें से कुछ लोगों के लिए चीज़ें थोड़ी बेहतर हुई हैं. लेकिन ये और भी बेहतर हो सकती थी. ये व्यवस्था या सरकार पर कटाक्ष नहीं है बल्कि ये आपके, मेरे, हमारे और दुनियाभर के लोगों के बारे में है कि हम क्या कर सकते हैं. उन लोगों को आगे बढ़ने में मदद कर सकें जो किसी भी रूप में 'कम सौभाग्यशाली' हैं.

चेकलिस्ट

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निदान और परामर्श आपके सरकारी अस्पताल से लेकर चमकदार और महंगे निजी अस्पतालों तक की बात करें तो विकलांगता को लेकर नज़रिया एक जैसा ही है- भ्रम की स्थिति. घबराहट. भावनात्मक सहानुभूति की कमी. उचित परामर्श की कमी.

बात यहीं से शुरू होती है. कहा जाए तो, ठीक है, अमुक बच्चे को ये बीमारी है, यहां जाइये और ये कीजिए. आप इसके विपरीत उदाहरण देशभर से लाइये, और मैं शायद... मैं नहीं जानता कि मैं क्या करूंगा.

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विकलांगता प्रमाण पत्र मैंने पिछले कई सालों से अभिमन्यु के विकलांगता प्रमाण पत्र को दोबारा नहीं बनवाया है. इस प्रमाण पत्र से मुझे टैक्स में छूट मिलती है. सालाना 80 हज़ार रुपए की टैक्स छूट (जो अभिमन्यु के इलाज और दूसरी ज़रूरतों पर ख़र्च होने वाले लाखों रुपए की तुलना में मज़ाक़ ही लगती है, वो भी तब जब हमारे पास ख़र्च करने के लिए लाखों रुपए हों) रेल और हवाई यात्रा में छूट मिलती है.

मैं अभिमन्यु के प्रमाणपत्र दोबारा बनाने की हिम्मत इसलिए भी नहीं जुटा पाता हूं क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझे इसके लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे जहां बार-बार कहा जाएगा कि यहां जाइये, वहां जाइये.

स्कूल और संस्थान

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अपने चारों ओर देखिए और बताइये कि क्या विकलांग बच्चे भी उन्हीं चमकदार स्कूलों में पढ़ रहे हैं जहां बाक़ी बच्चे पढ़ते हैं. क्या आपने कभी विकलांग बच्चों के समूह को किसी सामान्य बच्चों के स्कूल में पढ़ते हुए देखा है. नहीं ना?

और यहां मैं सिर्फ़ बड़े शहरों की बात कर रहा हूँ. अगर हमारे बड़े शहरों का ये हाल है तो सोचिए हमारे गांवों का हाल क्या होगा. लेकिन इसके लिए मैं केवल सरकार को ज़िम्मेदार नहीं मानना चाहूंगा क्योंकि इसकी बड़ी वजह हम लोगों का, समाज का नज़रिया है.

क़ानून

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अभिमन्यु की पढ़ाई, उसका इलाज और उसके भविष्य को लेकर उसके बारे में योजनाओं के साथ-साथ, मुझे समूचे ऑटिस्टिक समुदाय और विकलांग समुदाय के साथ भी खड़ा होना है. मुझे उस क़ानूनी ढांचे की निहित ख़ामियों के ख़िलाफ़ लड़ना है जो ज़रूरी तौर पर कल्याणकारी सुविधाएं प्रदान करने के लिए है, जैसे कि स्वास्थ्य और इंश्यूरेंस कवर से लेकर रेल और हवाई यात्राओं में छूट और सामान्य उपलब्धता के लिए होते हैं.

यहां पर उपलब्धता का मतलब सिर्फ़ व्हीलचेयर के लिए रैंप से नहीं है बल्कि व्यापक तौर पर शारीरिक विकलांग और मानसिक रुप से विकलांग लोगों के लिए सुविधाओं से है. (अक्सर नेता और बाबू व्हीलचेयर बांटकर या नए रैंप का उद्घाटन कर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं जबकि विशेष रूप से अधिकतर लोगों के लिए जो अक्षम हैं, उनके लिए उपलब्धता का मतलब है उचित शिक्षा व्यवस्था, व्यवसायिक प्रशिक्षण और रहने लायक़ घर).

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मैं मानता हूँ कि इस विषय पर मेरा होमवर्क पूरा नहीं है और न ही विस्तृत है. विकलांग लोगों के जीवन के कई ऐसे पहलू होते हैं जिनका विश्व विकलांग दिवस पर गहन विश्लेषण होना चाहिए.

आज मैं इन बातों को यहीं छोड़ते हुए 'हमारे अपने' समुदाय के लिए जो बड़ा संदेश है उस पर आना चाहता हूँ.

ऑटिज़्म एक रूपक (अंग्रेज़ी में कहा जाए तो मेटाफ़र) है, विकलांगता एक व्यापक विषय है जिसकी आज हम यहां बात कर रहे हैं. विकलांगों के लिए इस्तेमाल होने वाले नाम अब बदल गए हैं. अब 'विशेष रूप से सक्षम', 'विशेष ज़रूरतों वाले' या 'अलग ज़रूरतों वाले' लोग कहना ज़्यादा उचित समझा जाता है.

लेकिन क्या नाम बदलने या संदर्भ शब्द बदलने मात्र से हमारा नज़रिया भी बदला है?

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आंकड़ों की बात करें तो लोगों में विकलांगता को लेकर जागरूकता और समस्या की पहचान बढ़ने से ऑटिस्टिक, या विशेष रूप से सक्षम लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ी है.

लेकिन बढ़ती संख्या और राज्य/केंद्र सरकार की ओर से दी जाने वाली सेवाओं के बीच का फ़ासला और बढ़ गया है.

सवाल ये है कि क्या मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बस इससे ही संबधित है? कुछ हद तक हां लेकिन भगवान का शुक्र है कि पूरी तरह नहीं.

हर दिन हमारे लिए एक नई शुरुआत जैसा होता है. हम उस नए विचार, नई प्रेरणा को तलाशते हैं जो हमारे बच्चे को जीवन में थोड़ा और आगे बढ़ने में मदद कर सके.

मेरी ज़िंदगी उस भावनात्मक शक्ति की तलाश करती है जो अभिमन्यु को बुनियादी जीवन कौशल सिखाने संबंधी विभिन्न पहलुओं से पूरी तरह जोड़ सके. मुझे उसके लिए ढ़ूंढनी है वह ताक़त जो उसे हर सुबह उठने और जीने के लिए प्रेरित कर सके- टहलने से लेकर सुबह के नित्यकर्मों तक, नहाने से लेकर कपड़े पहनने तक और स्कूल से लेकर रोज़गार तक (जीवन के किसी मुक़ाम पर).

ये उस भावनात्मक ऊर्जा को खोजने के बारे में है जब मैं काम से लौटकर उसे पड़ोस में टहलाने के लिए ले जा सकूं, राशन की दुकान तक, सब्ज़ीवाले या फलवाले की दुकान पर ले जा सकूं, रिक्शा, ऑटो, बस, मेट्रो में ले जा सकूं. या मैं उसे व्यस्त मेट्रो स्टेशन पार करा सकूं, भीड़-भाड़ भरे नज़दीकी अस्पताल ले जा सकूं ताकि वो भीड़ और लोगों को समझने के कुछ गुर सीख सके और जान सके कि उनसे कैसे बात करनी है.

हम कुछ ऐसा कर सकें कि भविष्य में वो ज़्यादा से ज़्यादा आत्मनिर्भर हो सके.

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मुझे उसे सहयोग देने वालों के बारे में भी सोचना है. उसके इतने दोस्त हों, परिवार हो और ऐसे संस्थान बनें जो भविष्य में उसके साथ रहें जब हम लोग उसके लिए नहीं रहेंगे.

आपको लग रहा है मैं अपने विचारों में उलझ गया हूँ. हाँ, मेरे विचार उलझे हैं और यही मेरी मन:स्थिति है. मैं अपनी नैकरी के साथ अपने बेटे के वर्तमान और भविष्य के बारे में भी सोच रहा हूँ.

और विश्व विकलांगता दिवस के बारे में सोच रहा हूँ जो मेरे लिए स्क्रीन पर एक निशान के जैसा है.

आज का दिन सत्ता में बैठे लोगों के लिए इस बारे में जायज़ा लेने का दिन ज़रूर है लेकिन हम अभिभावकों के लिए यह बस एक और दिन है, जिसके साथ हमें आगे बढ़ना है.

(लेखक ने एक अतिथि स्तंभकार की हैसियत से अपने निजी विचार रखे हैं)

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