'उन्हें पता था-बाबरी विवाद का अंत नहीं'

  • अपूर्वानंद
  • लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

6 दिसंबर को भारत में दो कारणों से याद करते हैं. एक तो आज के दिन भारतीय संविधान निर्माता डॉ. अांबेडकर की मौत हुई थी.

मगर पिछले 23 साल से 6 दिसंबर दूसरे कारण से याद किया जाता है. और वह है अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का गिराया जाना.

बाबरी मस्जिद का गिराया जाना भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नेतृत्व में चले एक लंबे आंदोलन का परिणाम था. ऐसा दिन-दहाड़े खुलेआम पूरी गोलबंदी के बाद किया गया.

मस्जिद को ध्वस्त करने में जो नेता शामिल थे, उन्हें आज तक इस अपराध की सज़ा नहीं हुई. बल्कि उनमें से एक प्रधानमंत्री हुए और दूसरे उप प्रधानमंत्री हुए और तीसरे अब प्रधानमंत्री हैं.

इससे पता चलता है कि भारत की मूल धर्मनिरपेक्ष सरंचना बहुत कमज़ोर हो गई है. एक बहुत बड़े आपराधिक अभियान के जो एक प्रकार से मुजरिम हैं, न केवल उनको किसी तरह की सज़ा नहीं हो सकी बल्कि उनके हाथों में देश की बागडोर सौंप दी गई.

उनमें एक लालकृष्ण आडवाणी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि राम जन्मभूमि अभियान कोई धर्म अभियान नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक अभियान था.

तो यह बात बहुत साफ़ थी कि राम मंदिर निर्माण के पीछे इरादा कोई हिंदू धर्महित का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सेवकसंघ के लिए एक बड़ी राजनीतिक गोलबंदी का था. और दूसरा इसका ज़रिया यह था कि आप सामान्य हिन्दुओं में से राजनीतिक हिंदू पैदा कर सकें.

राजनीतिक हिंदू बनाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया. यह अभियान 1992 से पहले से चल रहा था और 1992 में समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसके बाद भी लगातार चल रहा है.

इस अभियान की परिणति 2014 में देखी गई जब देश की केंद्रीय सत्ता पर भाजपा अपने बलबूते पर काबिज़ हुई.

इसलिए यह कोई उग्र हिंदुत्व को नरम करने का मामला नहीं, बल्कि उग्र हिंदुत्व को सामान्य और स्वीकार्य बनाने का एक अभियान है, जिसमें भाजपा और आरएसएस सफल रहे हैं.

अांबेडकर के प्रतीक का इस्तेमाल क्या इसी अभियान का हिस्सा है?

बिलकुल. क्योंकि आरएसएस के पास अपना ऐसा कोई प्रतीक नहीं जिनका वे इस्तेमाल कर सकें. इसलिए वे राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीक चुन रहे हैं. इनमें उनका मुख्य उद्देश्य है गांधी और नेहरू को उनकी मुख्य स्थिति से अपदस्थ कर देना.

ऐसा इसलिए कि गांधी और नेहरु दोनों जिस शब्द के साथ जुड़े हैं, वह शब्द है 'धर्मनिरपेक्षता'. वे इसकी केंद्रीयता को समाप्त करने के लिए जिनको भी सामने लाना पड़े, उनको ला रहे हैं.

सबसे पहले वे सरदार पटेल को लाए और सरदार पटेल को लाने के बाद उन्हें दिखाई दिया कि पिछले 30 सालों में भारत के सामाजिक वर्गों में जो वर्ग राजनीतिक रूप से सबसे ज़्यादा सक्रिय हुए हैं, वे हैं पिछड़े और दलित वर्ग.

पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्गों को आप राजनीतिक हिंदू कैसे बना सकते हैं, यह उनकी रणनीति का बड़ा हिस्सा रहा है. इसके पहले ध्यान से देखें तो संघ अपनी गतिविधि आदिवासी इलाकों में विश्व हिंदू परिषद के माध्यम से सबसे ज़्यादा चलाते हैं.

पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और आदिवासी चार तबक़े हैं. इनके राजनीतिक हिंदूकरण की प्रक्रिया कई साल से चल रही है और अब ये काफ़ी तेज़ हो गई है. उनके नायक आंबेडकर को हड़पने की कोशिश उसी प्रक्रिया का हिस्सा है ताकि उनके माध्यम से वो दलित जातियों, पिछड़े और अति पिछड़े के बीच ख़ुद को स्वीकार्य बना सकें.

अांबेडकर के प्रति आजकल उनकी इतनी श्रद्धा जो उमड़ पड़ी है, वो कोई अांबेडकर की राजनीतिक विचारधारा को स्वीकार करने के कारण नहीं है. बल्कि ऐसा अांबेडकर को पूरी तरह विकृत करके हिंदू राष्ट्र की परियोजना के अंग के रूप में पेश करने की है.

भाजपा अयोध्या विवाद को किस दिशा में ले जाना चाहती है?

आरएसएस और भाजपा ने जब इस विवाद को शुरू किया था, तब भी उन्हें पता था कि इसका कभी कोई अंत नहीं होने वाला. और यही लाभकारी स्थिति है कि इसका कोई अंत नहीं हो सकता. क्योंकि भारत की एक न्यायिक प्रक्रिया है और इतनी आसानी से उसे विकृत करना संभव नहीं होगा.

यह बात उन्हें पता थी. चूंकि अभी भी उच्चतम न्यायालय के पास ये मामला है यदि मस्जिद को ध्वस्त भी कर देंगे तो भी मामला बना ही रहेगा. ये बात उन्हें पता थी. इसका कोई अंतिम बिंदु उनके सामने नहीं था और न है.

हिंदू जनता के सामने राम जन्मभूमि निर्माण को एक छलावे की तरह रखा गया कि हम ऐसा करने जा रहे हैं. लेकिन ये बात उन्हें भी अच्छी तरह पता है कि वे ऐसा नहीं कर सकते.

यह ऐसा मुद्दा था जिसे वे निरंतर जीवित ऱखना चाहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर इसके इर्द-गिर्द गोलबंदी कब हो सकती है इसकी संभावना को जिंदा ऱखना ही उनका उद्देश्य है.

पिछले 23 साल, बल्कि 25 में देख लीजिए कि रामजन्म भूमि का मसला अलग-अलग समय पर अलग-अलग ढंग से पेश आया है.

कुछ दिन पहले मोहन भागवत ने इस मसले को बंगाल में उठाया. उसके पहले इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. उसकी जगह 'लव जिहाद' का मामला उठाया गया. फिर धर्म परिवर्तन का मामला उठाया गया. राम जन्मभूमि का मामला पीछे चला गया.

ऐसा इसलिए किया गया कि राम जन्मभूमि से जितनी गोलबंदी की जानी थी, जितना लाभ लिया जा सकता था वह एक समय तक लिया जा चुका था और अब दूसरे मसलों से लाभ लिया जाएगा.

लेकिन इसमें अभी राजनीतिक लाभ की संभावनाएं हैं. और ये ज़िंदा है, इसे फिर उठाया जा सकता है. आरएसएस और भाजपा गणना करेंगे कि इस मामले को कब उठाया जाए ताकि इसका लाभ मिले. तो इसका कोई समाधान नहीं है. भाजपा इसे कहीं नहीं ले जाना चाहती. वो इसे ज़िंदा रखना चाहती है.

यानी यह मामला जितनी देर तक अदालत में रहेगा उतना ही ये फायदेमंद साबित होगा. ऐसा इसलिए कि बाक़ी जितने राजनीतिक दल हैं वे उन पर लगातार दबाव बनाए रखेंगे.

उन्होंने वहां बाबरी मस्जिद गिरा दी है, वहां एक अस्थायी ढांचा बना दिया है. और अब उनका कहना है कि यहां मंदिर तो है ही.

दूसरे राजनीतिक दलों में इतना साहस नहीं कि कह सकें कि ये ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से बना है इसलिए स्वीकार्य नहीं. यहां जो मस्जिद थी, कायदे से उसे पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए. यह कहने का साहस हमारे राजनीतिक दलों में नहीं रह गया है. इसका लाभ भी भाजपा उठा रही है. और उसने भारत की पूरी भारतीय राजनीति पर एक ज़बर्दस्त हिंदू दबाव बना दिया है.

इस हिंदू दबाव से हमारे राजनीतिक दल नहीं लड़ पाएंगे, ये एक बड़ी चुनौती है.

बाबरी मस्जिद मामला भारत के ताने-बाने पर कितना असर डालेगा?

जब हमने बाबरी मस्जिद को गिरने दिया था तभी भारत का भविष्य तय हो गया था. यह भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर सबसे बड़ा आघात था. इससे यह साबित हो गया कि भारत की जो धर्मनिरपेक्ष राजनीति है वह अपनी रक्षा करने में गंभीर नहीं है, और सक्षम भी नहीं है.

इसने भारतीय मानस के मन में बहुत बड़ी फांक पैदा कर दी है. इस बात को भुलाया नहीं जा सकता कि यह अभियान खुलेआम चलाया गया. यह अभियान मुसलमानों के ख़िलाफ़ था. यह किसी एक मस्जिद के ख़िलाफ़ नहीं था. मस्जिद प्रतीक थी मुसलमानों की. मुसलमानों को सरेआम अपमानित करने के लिए ये अभियान चलाया गया. और इसमें अभियान चलाने वालों को सफलता मिली.

इस बात को भारतीय मुसलमान भुला नहीं सकते और इसे हमें भी नहीं भुलाना चाहिए.

भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर इस घटना ने बहुत बड़ा असर डाला है.

अब मेरी समझ ये है कि इससे हम कुछ सीख ले सकते हैं. और वह यह कि हम एक प्रकार से अस्वीकार्यता की नीति अपनाएं. उस राजनीति के प्रति, जो हिंदू गोलबंदी के आधार पर चलने की राजनीति है, हम पूरी तरह से असहनशीलता की नीति अपनाएं.

तभी हम भारत के अल्पसंख्यक समुदाय, जो मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय है, को विश्वास दिला सकते हैं कि यह मुल्क उनका है और यहां उनकी बराबरी से इज़्ज़त है और उनको बेइज़्ज़त करने वालों की यहां कोई इज़्ज़त नहीं.

(बीबीसी संवाददाता अजय शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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