बैंकॉक बैठक: 'भारत की कथनी-करनी का अंतर'

  • 7 दिसंबर 2015
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुलाकात इमेज कॉपीरइट MEA India

ज़मीनी हक़ीक़त को देखें तो बैंकॉक में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुलाक़ात का कोई मतलब नहीं है. न ही इससे कुछ बड़ा होने जा रहा है.

पाकिस्तान से जो संकेत मिल रहे हैं उससे पता चलता है कि न तो उसकी नीयत बदली है और न नीति. इसलिए मुलाक़ात के इस दौर से कुछ निकलकर आएगा, यह मुश्किल लगता है.

पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार की नीति में लगातार बदलाव होने से मामले की संजीदगी कम होती है.

इससे दुनिया के सामने ये संदेश गया है कि भारत जो बोलता है और जो करता है, उसमें बहुत बड़ा अंतर है.

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अगस्त से लेकर अब तक परिस्थितियों में कुछ ख़ास बदलाव नहीं हुआ है. इसलिए भारत की नीति में अचानक आए बदलाव का कारण समझ से परे है.

अगस्त में भारत-पाकिस्तान वार्ता रद्द हुई थी क्योंकि उफा घोषणापत्र के तहत 'आतंकवाद' के मुद्दे पर पहले बातचीत होनी थी.

लेकिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज़ अज़ीज़ ने कहा था उनके साथ पाकिस्तान के विदेश सचिव भी आएंगे जो भारत के विदेश सचिव से बातचीत करेंगे.

लेकिन अब अगर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश सचिव बैंकॉक में जाकर पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश सचिव से मिलेंगे और बातचीत करेंगे तो इसे भारत की तरफ़ से एक प्रकार का समझौता ही समझा जाएगा.

जम्मू-कश्मीर का ज़िक्र होना भी भारत की नीति में आए बदलाव का संकेत है. अगस्त में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साफ़ किया था कि अभी केवल 'आतंकवाद' पर बातचीत होगी. लेकिन भारत सरकार इस वादे से भी हटी है.

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पाकिस्तान ने कोई लचक दिखाई हो, ऐसा लग नहीं रहा है. भारत सरकार को ये बताना पड़ेगा कि लगातार नीति में बदलाव से निकलकर क्या आएगा. भारत की नीति समझ में नहीं आती है.

हाल में ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से वार्ता के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भारत के साथ बिना शर्त बातचीत करने की बात कही थी.

लेकिन इस बयान को संदर्भ से अलग करके देखा गया. पाकिस्तानी अधिकारी कई महीनों से इसी बात को दोहराते रहे हैं.

एक तरफ वो बिना शर्त बातचीत की बात कहते हैं. लेकिन इस बात पर भी वो अड़े हैं कि जम्मू-कश्मीर का मुद्दा बातचीत में उठे. ऐसे में बातचीत को बिना शर्त कैसे कही जा सकती है.

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जो बात रूस के उफ़ा में तय हुई थी वो सिर्फ दहशतगर्दी को लेकर हुई थी. उससे भारत पीछे हटा है.

भारत पर कई देशों का दवाब है कि वो पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू करे और पाकिस्तान के ऊपर भी शायद ऐसे ही दबाव है.

पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो वो पिछले 13-14 साल में एक तरफ तालिबान की हिमायत करता है, वहीं अमरीकी सैनिकों को मरवाता रहा है.

वो अमरीका का दबाव भी झेलता है और वो उसके ख़िलाफ़ भी काम करता है.

लेकिन अंतराराष्ट्रीय दबाव के आगे भारत जल्दी घुटने टेक देता है जबकि पाकिस्तान साफ़ बचने में हर बार कामयाब रहता है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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